चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

सन् ४७ को याद करते हुए – केदारनाथ सिंह जनवरी 31, 2009

Filed under: केदारनाथ सिंह — Satish Chandra Satyarthi @ 5:29 अपराह्न
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तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदाननाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियाँ
ठिगने नूर मियाँ
रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियाँ
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियाँ?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदाननाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

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मेरे बारे में अक्टूबर 25, 2008

Filed under: मैं — Satish Chandra Satyarthi @ 9:22 पूर्वाह्न
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मेरा नाम सतीश चन्द्र सत्यार्थी है। बिहार के नालंदा जिले का रहने वाला हूं। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा अपने गृह जिले से पूरी की है और अभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कोरियन भाषा केंद्र में बी.. अंतिम वर्ष का छात्र हूं। मेरी रूचियां हैंसाहित्य पढना और नई नई भाषाएं सीखना। हालांकि अभी तक मुझे हिन्दी, अंग्रेजी, कोरियन, जापानी और तुर्की के अलावा और कोइ भाषा नहीं सीख पाया हूं पर मेरा प्रयास है कि जे.एन.यू. मे अपने अध्ययनकाल के दौरान कुछ और भाषाओं जैसेग्रीक, हीब्रू और जर्मन आदि की कम से कम बेसिक जानकारी प्राप्त करूं तथा संस्कृत और उर्दू का गहन अध्ययन करूं। देखते हैं हो पाता है या नहीं। खाली समय मे मैं संगीत सुनना पसंद करता हूं; खसकर पुराने हिंदी फिल्मी गीत और गज़लें। गुलाम अली और मेंहदी हसन मेरे पसंदीदा गज़ल गायक हैं। मेरी सबसे बडी कमज़ोरी यह है कि मैं बहुत बडा आलसी हूं। हर काम को कल और परसों पर डालने कि कोशिश करता हूं। और क्या बताऊं अपने बारे में …………………………………………………………..कुछ जानना हो तो लिखियेगा

 

मेरे अध्ययन की भाषा – कोरियन

Filed under: मेरे अध्ययन की भाषा - कोरियन — Satish Chandra Satyarthi @ 9:18 पूर्वाह्न
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जैसा कि अबतक आप जान गये होंगे कि मैं जे.एन.यू के कोरियन सेंटर से कोरियन भाषा में बी.. कर रहा हूं। इस लेख में मैं आपको इस भाषा के बारे में थोडी और जानकारी देना चाहता हूं।

कोरियन दक्षिण और उत्तरी कोरिया दोनों देशों की राजभाषा है। यह दुनिया में लगभग करोड लोगों के द्वारा बोली जाती है तथा विश्व मे सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं मे १३वें स्थान पर आती है। इसके वर्गीकरण को लेकर लैंग्युएज साइंटिस्ट्स में विवाद है। कुछ लोग इसे अल्टाइक फैमिली मे रख्ते हैं तो कुछ इसे लैंगुएज आइसोलेट मानते हैं। इसकी वाक्यसंरचना हिन्दी की तरह कर्ता+कर्म+क्रिया है। इस भाषा कि लिपिहंगलहै जिसका आविष्कार १४४९ . में किंग सेजोंग के द्वारा किया गया था। इसके पहले कोरिया मे चीनी भाषा बोली जाती थी। हंगल की खोज ने कोरिया मे साक्षरता को बढाने मे बहुत योगदान दिया है क्योंकि यह चीनी भाषा कि तुलना मे अत्यंत सरल है। इसे दुनिया कि सबसे साइंटिफिक लेखन पद्धतियों मे से एक माना जाता है। हंगल में कुल २४ अक्षर है जिनमें से १० स्वर और १४ व्यंजन है.

कोरियन वर्णमाला (ध्यान रखें की इसमें कम्पाउंड  लेटर्स �ी शामिल हैं.)

कोरियन वर्णमाला (ध्यान रखें की इसमें कम्पाउंड लेटर्स भी शामिल हैं.)

कोरियन पर आज भी चीनी भाषा का प्रभाव साफ़ दिखाई पडता है। कोरियन के तकरीबन ६०% शब्द चीनी उत्पत्ति के हैं जिन्हे कोरिया मेहान्जाकहा जाता है। खासकर पारंपरिक लेखन में आज भी मुख्यतः चाइनीज़ कैरेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है। अखबारों तथा साहित्यिक रचनाओं में भीहान्जाका प्रयोग प्रचलित है। अतः कुछ महत्वपूर्ण चाइनीज़ कैरेक्टर्स को जाने बिना कोरियन भाषा मे दक्षता हासिल नहीं की जा सकती।

 

आलम खुर्शीद की पाँच ग़ज़लें

Filed under: नए अशआर — Satish Chandra Satyarthi @ 9:09 पूर्वाह्न
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जब खुली आँखें तो इन आँखों को रोना आ गया
मैंने समझा वाकई मौसम सलोना आ गया

डर रहा हूँ बेनियाज़ी अब कहाँ ले जाएगी
चलते-फिरते भी मेरी आँखों को सोना आ गया

एक चुल्लू आब लेकर फिर रहा है इस तरह
जैसे गागर में उसे सागर समोना आ गया

देखकर अंजाम फूलों का मैं घबराया बहुत
खुशगुमानी थी कि धागों में पिरोना आ गया

क्यों शिकायत है भला दरिया की वुसअत से हमें
चंद कतरों ही से जब लब को भिगोना आ गया

तख़्त पर बैठा हुआ यों खेलता हूँ ताज से
जैसे इक बच्चे के हाथों में खिलौना आ गया

कोई भी ‘आलम’ लबे दरिया अभी पहुँचा नहीं
नाखुदाओं को मगर कश्ती डुबोना आ गया।

दो

मानूस कुछ ज़रूर है इस जलतरंग में
एक लहर झूमती है मेरे अंग-अंग में

खामोश बह रहा था ये दरिया अभी-अभी
देखा मुझे तो आ गई मौजे तरंग में

वुसअत में आसमान भी लगता था कम मुझे
पर ज़िंदगी गुज़र गई इक शहरे-तंग में

किरदार क्या है मेरा- यही सोचता हूँ मैं
मर्ज़ी नहीं है, फिर भी मैं शामिल हूँ जंग में

शीशा मिज़ाज हूँ मैं, मगर ये भी खूब है
अपना सुराग ढूँढ़ता रहता हूँ संग में

इक-दूसरे से टूट के मिलते तो हैं मगर
मसरूफ़ सारे लोग हैं इक सर्द जंग में

क्या फ़र्क है ये अहले-नज़र ही बताएँगे
कुछ फ़र्क तो ज़रूर है फूलों के रंग में।

तीन

सियाहियों को निगलता हुआ नज़र आया
कोई चिराग तो जलता हुआ नज़र आया

दुखों ने राब्ते मज़बूत कर दिए अपने
तमाम शहर बदलता हुआ नज़र आया

ये प्यास मुझको जमीं पर गिराने वाली थी
कि एक चश्मा उबलता हुआ नज़र आया

वो मेरे साथ भला कितनी दूर जाएगा
जो हर कदम पे सँभलता हुआ नज़र आया

नई हवा से बचूँ कैसे मैं कि शहर मेरा
नए मिज़ाज में ढलता हुआ नज़र आया

तवकआत ही उठने लगीं ज़माने से
जो एक शख़्स बदलता हुआ नज़र आया

शिकस्त दे के मुझे खुश तो था बहुत ‘आलम’
मगर वो हाथ भी मलता हुआ नज़र आया।

चार

उठाए संग खड़े हैं सभी समर के लिए
दुआएँ खैर भी माँगे कोई शज़र के लिए

हमेशा घर का अंधेरा डराने लगता है
मैं जब चिराग जलाता हूँ रहगुज़र के लिए

ख़याल आता है मंज़िल के पास आते ही
कि कूच करना है इक दूसरे सफ़र के लिए

कतार बाँधे हुए, टकटकी लगाए हुए
खड़े हैं आज भी कुछ लोग इक नज़र के लिए

वहाँ भी अहले-हुनर सर झुकाए बैठे हैं
जहाँ पे कद्र नहीं इक ज़रा हुनर के लिए

तमाम रात कहाँ यों भी नींद आती है
मुझे तो सोना है इक ख़्वाबे-मुख्तसर के लिए

हम अपने आगे पशीमान तो नहीं ‘आलम’
हमें कुबूल है रुसवाई उम्र भर के लिए।

पाँच

याद करते हो मुझे क्या दिन निकल जाने के बाद
इक सितारे ने ये पूछा रात ढल जाने के बाद

मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यों देखता हूँ आसमान
यह ख़याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बाद

एक ही मंज़िल पे जाते हैं यहाँ रस्ते तमाम
भेद यह मुझ पर खुला रस्ता बदल जाने के बाद

दोस्तों के साथ चलने में भी हैं खतरे हज़ार
भूल जाता हूँ हमेशा मैं सँभल जाने के बाद

फासला भी कुछ ज़रूरी है चिरागां करते वक्त
तजुर्बा यह हाथ आया हाथ जल जाने के बाद

वहशते-दिल को बियाबाँ से है इक निस्बत अजीब
कोई घर लौटा नहीं घर से निकल जाने के बाद

आग ही ने हम पे नाज़िल कर दिया कैसा अजाब
कोई भी हैरां नहीं मंज़र बदल जाने के बाद

अब हवा ने हुक्म जारी कर दिया बादल के नाम
खूब बरसेगी घटाएँ शहर जल जाने के बाद

तोड़ दो ‘आलम’ कमाँ या तुम कलम कर लो ये हाथ
लौटकर आते नहीं हैं तीर चल जाने के बाद।