चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

मुश्किल है अपना मेल प्रिये जून 2, 2009

डॉ. सुनील जोगी की एक बड़ी लोकप्रिय हास्य- कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ.

आनंद लीजिये………..

मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये
तुम एम.ए. फर्स्‍ट डिवीजन हो
मैं हुआ मैट्रिक फेल प्रिये

तुम फौजी अफसर की बेटी
मैं तो किसान का बेटा हूं
तुम रबडी खीर मलाई हो
मैं तो सत्‍तू सपरेटा हूं
तुम ए.सी. घर में रहती हो
मैं पेड. के नीचे लेटा हूं
तुम नई मारूति लगती हो
मैं स्‍कूटर लम्‍ब्रेटा हूं
इस तरह अगर हम छुप छुप कर
आपस में प्‍यार बढाएंगे
तो एक रोज तेरे डैडी
अमरीश पुरी बन जाएंगे
सब हड्डी पसली तोड. मुझे
भिजवा देंगे वो जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

तुम अरब देश की घोडी हो
मैं हूं गदहे की नाल प्रिये
तुम दीवाली का बोनस हो
मैं भूखों की हड.ताल प्रिये
तुम हीरे जडी तस्‍तरी हो
मैं एल्‍युमिनियम का थाल प्रिये
तुम चिकेन, सूप, बिरयानी हो
मैं कंकड. वाली दाल प्रिये
तुम हिरन चौकडी भरती हो
मैं हूं कछुए की चाल प्रिये
तुम चन्‍दन वन की लकडी हो
मैं हूं बबूल की छाल प्रिये
मैं पके आम सा लटका हूं
मत मारो मुझे गुलेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

मैं शनिदेव जैसा कुरूप
तुम कोमल कंचन काया हो
मैं तन से, मन से कांशी हूं
तुम महाचंचला माया हो
तुम निर्मल पावन गंगा हो
मैं जलता हुआ पतंगा हूं
तुम राजघाट का शांति मार्च
मैं हिन्‍दू-मुस्लिम दंगा हूं
तुम हो पूनम का ताजमहल
मैं काली गुफा अजन्‍ता की
तुम हो वरदान विधाता का
मैं गलती हूं भगवन्‍ता की
तुम जेट विमान की शोभा हो
मैं बस की ठेलमपेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

तुम नई विदेशी मिक्‍सी हो
मैं पत्‍थर का सिलबट्टा हूं
तुम ए.के. सैंतालिस जैसी
मैं तो इक देसी कट्टा हूं
तुम चतुर राबडी देवी सी
मैं भोला-भाला लालू हूं
तुम मुक्‍त शेरनी जंगल की
मैं चिडि.याघर का भालू हूं
तुम व्‍यस्‍त सोनिया गांधी सी
मैं वी.पी. सिंह सा खाली हूं
तुम हंसी माधुरी दीक्षित की
मैं पुलिस मैन की गाली हूं
गर जेल मुझे हो जाए तो
दिलवा देना तुम बेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

मैं ढाबे के ढांचे जैसा
तुम पांच सितारा होटल हो
मैं महुए का देसी ठर्रा
तुम चित्रहार का मधुर गीत
मैं कृषि दर्शन की झाडी हूं
मैं विश्‍व सुंदरी सी महान
मैं ठेलिया छाप कबाडी हूं
तुम सोनी का मोबाइल हूं
मैं टेलीफोन वाला चोंगा
तुम मछली मानसरोवर की
मैं सागर तट का हूं घोंघा
दस मंजिल से गिर जाउंगा
मत आगे मुझे ढकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

तुम जयप्रदा की साडी हो
मैं शेखर वाली दाढी हूं
तुम सुषमा जैसी विदुषी हो
मैं लल्‍लू लाल अनाडी हूं
तुम जया जेटली सी कोमल
मैं सिंह मुलायम सा कठोर
मैं हेमा मालिनी सी सुंदर
मैं बंगारू की तरह बोर
तुम सत्‍ता की महारानी हो
मैं विपक्ष की लाचारी हूं
तुम हो ममता जयललिता सी
मैं क्‍वारा अटल बिहारी हूं
तुम संसद की सुंदरता हो
मैं हूं तिहाड. की जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये

………………………

डॉ. सुनील जोगी

 

कोरियन सीखें 4 – शब्दों को पढ़ना शुरू करें मई 30, 2009

हिन्दी माध्यम में उपलब्ध इस नए पाठ के लिए यहाँ जाएँ :-
http://koreanacademy.blogspot.com/

आज के पाठ में हम कोरियन शब्दों को पढ़ना सीखेंगे और उनका अर्थ भी समझेंगे।

 

इन्दु जी क्या हुआ आपको अप्रैल 11, 2009

यह कविता बाबा नागार्जुन ने इंदिरा गांधी की हिटलरी नीतियों के विरोध में लिखी थी. 

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?

सत्ता की मस्ती में

भूल गई बाप को?

इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?


आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग

हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग

सच-सच बताओ भी

क्या हुआ आपको

यों भला भूल गईं बाप को!


छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको

काले चिकने माल का मस्का लगा आपको

किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको

अन्ट-शन्ट बक रही जनून में

शासन का नशा घुला ख़ून में

फूल से भी हल्का

समझ लिया आपने हत्या के पाप को

इन्दु जी, क्या हुआ आपको

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!


बचपन में गांधी के पास रहीं

तरुणाई में टैगोर के पास रहीं

अब क्यों उलट दिया ‘संगत’ की छाप को?

क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको

बेटे को याद रखा, भूल गई बाप को

इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी…


रानी महारानी आप

नवाबों की नानी आप

नफ़ाख़ोर सेठों की अपनी सगी माई आप

काले बाज़ार की कीचड़ आप, काई आप


सुन रहीं गिन रहीं

गिन रहीं सुन रहीं

सुन रहीं सुन रहीं

गिन रहीं गिन रहीं


हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को

एक-एक टाप को, एक-एक टाप को


सुन रहीं गिन रहीं

एक-एक टाप को

हिटलर के घोड़े की, हिटलर के घोड़े की

एक-एक टाप को…

छात्रों के ख़ून का नशा चढ़ा आपको

यही हुआ आपको यही हुआ आपको

(१९७४ में रचित,’खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ नामक संग्रह से )

बाबा नागार्जुन के काव्य संसार का आनंद लेने के लिए जेएनयू पर चलें.

 

आओ, बेटी, आ जाओ, पास बैठो अप्रैल 10, 2009

विज्ञापन सुंदरी

रमा लो मांग में सिन्दूरी छलना…

फिर बेटी विज्ञापन लेने निकलना…

तुम्हारी चाची को यह गुर कहाँ था मालूम!


हाथ न हुए पीले

विधि विहित पत्नी किसी की हो न सकीं

चौरंगी के पीछे वो जो होटल है

और उस होटल का

वो जो मुच्छड़ रौबीला बैरा है

ले गया सपने में बार-बार यादवपुर

कैरियर पे लाद के कि आख़िर शादी तो होगी ही

नहीं? मैं झूठ कहता हूँ?

ओ, हे युग नन्दिनी विज्ञापन सुन्दरी,

गलाती है तुम्हारी मुस्कान की मृदु मद्धिम आँच

धन-कुलिश हिय-हम कुबेर के छौनों को

क्या ख़ूब!

क्या ख़ूब

कर लाई सिक्योर विज्ञापन के आर्डर!

क्या कहा?

डेढ़ हज़ार?

अजी, वाह, सत्रह सौ!

सत्रह सौ के विज्ञापन?

आओ, बेटी, आ जाओ, पास बैठो

तफसील में बताओ…

कहाँ-कहाँ जाना पड़ा? कै-कै बार?

क्लाइव रोड?

डलहौजी?

चौरंगी?

ब्रेबोर्न रोड?

बर्बाद हुए तीन रोज़ : पाँच शामें ?

कोई बात नहीं…

कोई बात नहीं…

आओ, आओ, तफ़सील में बतलाओ!

रचनाकार: नागार्जुन

 

क्या इनका कोई अर्थ नहीं – धर्मवीर भारती फ़रवरी 8, 2009


ये शामें, सब की शामें…
जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया
जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में

ये शामें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

वे लमहें
वे सूनेपन के लमहें
जब मैंने अपनी परछाई से बातें की
दुख से वे सारी वीणाएँ फेकीं
जिनमें अब कोई भी स्वर न रहे

वे लमहें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

वे घड़ियाँ, वे बेहद भारी-भारी घड़ियाँ
जब मुझको फिर एहसास हुआ
अर्पित होने के अतिरिक्त कोई राह नहीं
जब मैंने झुककर फिर माथे से पंथ छुआ
फिर बीनी गत-पाग-नूपुर की मणियाँ

वे घड़ियाँ
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

ये घड़ियाँ, ये शामें, ये लमहें
जो मन पर कोहरे से जमे रहे
निर्मित होने के क्रम में

क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

जाने क्यों कोई मुझसे कहता
मन में कुछ ऐसा भी रहता
जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा
जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं

अर्पित है पूजा के फूलों-सा जिसका मन
अनजाने दुख कर जाता उसका परिमार्जन
अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को
नत-मस्तक होकर वह कर लेता सहज ग्रहण

वे सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियाँ
यह पीड़ा, यह कुण्ठा, ये शामें, ये घड़ियाँ

इनमें से क्या है
जिनका कोई अर्थ नहीं!

कुछ भी तो व्यर्थ नहीं!

१४ जुलाई २००८

 

सांध्य सुंदरी – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” फ़रवरी 1, 2009

दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह सांध्य सुंदरी परी-सी-
धीरे धीरे धीरे।
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास
मधुर मधुर हैं दोनों उसके अधर-
किन्तु ज़रा गंभीर – नहीं है उनमें हास विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से,
हृदयराज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की सी लता
किंतु कोमलता की वह कली
सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
छाँह सी अंबर-पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा
नहीं होता कोई अनुराग राग आलाप
नूपुरों में भी रूनझुन रूनझुन नहीं
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप, चुप, चुप”
है गूँज रहा सब कहीं-
व्योम मंडल में – जगती तल में –
सोती शांत सरोवर पर उस अमल कमलिनी दल में
सौन्दर्य गर्विता सरिता के अतिविस्तृत वक्षस्थल में
धीर वीर गंभीर शिखर पर हिमगिरि अटल अचल में
उत्ताल तरंगाघात प्रलय घन गर्जन जलधि प्रबल में
क्षिति में जल में नभ में अनिल अनल में
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप, चुप, चुप”
है गूँज रहा सब कहीं-
और क्या है? कुछ नहीं।
मदिरा की वह नदी बहाती आती
थके हुए जीवों को वह सस्नेह
प्याला एक पिलाती
सुलाती उन्हें अंक पर अपने
दिखलाती फिर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने
अर्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती जब लीन
कवि का बढ़ जाता अनुराग
विरहाकुल कमनीय कंठ से
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।

 

सन् ४७ को याद करते हुए – केदारनाथ सिंह जनवरी 31, 2009

Filed under: केदारनाथ सिंह — Satish Chandra Satyarthi @ 5:29 अपराह्न
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तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदाननाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियाँ
ठिगने नूर मियाँ
रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियाँ
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियाँ?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदाननाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

 

जे एन यू में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू जनवरी 30, 2009

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू  हो गयी है | आवेदन पत्र प्राप्त करने की अन्तिम तिथि १६ मार्च है | डाक द्वारा आवेदन पत्र मार्च तक प्राप्त किए जा सकते हैं | आवेदन पत्र जमा करने की अन्तिम तिथि भी १६ मार्च, २००९ हैविभिन्न कोर्सेज के लिए प्रवेश परीक्षा देश भर में १५ मई से १८ मई तक आयोजित की जायेगी।  विशेष जानकारी के लिए जे एन यू की आधिकारिक वेबसाईट देखें

जे एन यू की परीक्षा अथवा प्रवेश प्रवेश प्रकिया के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप निसंकोच मुझे लिख सकते हैंमुझे आपकी मदद करने में खुशी होगीविशेष रूप से School of Language, Literature and Culture Studies में BA (Foreign Language), फर्स्ट या सेकंड ईयर के लिए आवेदन करने वाले छात्र किसी भी समस्या के लिए लिखेंउनकी मैं विशेष मदद कर पाऊँगा क्योंकि मैं इसी केन्द्र का छात्र हूँ

 

जे एन यू में चाट परम्परा नवम्बर 15, 2008

Filed under: जे एन यू में चाट परम्परा — Satish Chandra Satyarthi @ 11:24 पूर्वाह्न
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सबसे पहले चाटशब्द पर थोड़ा प्रकाश डालना या यूं कहें कि इसका स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है। वर्ना कुछ लोग इसे अंग्रेजी वाले चैटका हिन्दी रुपन्तरण अथवा चाटपकौड़े वाली चाट समझने की भूल भी कर सकते हैं। अब हर किसी को अपने जितना अकलमंद तो नहीं समझ सकते ! हां तो, यहां चाट शब्द चाटनाक्रिया से बना है; लेकिन वो लिकवाला चाटना नहीं। इसका सीधा मतलब है किसी को जबर्दस्ती भाषण (बकवास) पिला पिला कर बोर करना। यह चाट प्रजाति हर जगह पाई जाती है; चाहे गलीमुहल्ला हो, ऑफ़िस हो या फ़िर स्कूल कॉलेज। इन्हें यह भ्रम होता है कि ये अरस्तू और सुकरात से भी बड़े विचारक और विवेकानन्द से भी बड़े वक्ता हैं। ये दुनिया के अज्ञानियों को ज्ञान बांटना अपना कर्तव्य या यों कहें कि अधिकार समझते हैं। इन्हें लगता है कि इनके वचनामृत सुनकर लोग लोग धन्य हो जाएंगे।

हमारे जे एन यू में चाटों की एक दीर्घकालीन परंपरा रही है। यहां पाये जाने वाले चाटों की मुख्य किस्में इस प्रकार हैं:-

हल्का चाट :- ये आमतौर पर नये या फ़िर चाट विद्या में मंदबुद्धि चाट होते हैं। ये चाटते कम हैं और बदनाम ज्यादा होते हैं। ये अगर रास्ते में मिल जायें तो आठदस फ़ालतू के सवाल चेंप देंगे। सवालों की प्रकृति बड़ी निर्दोष किस्म की होगी; जैसे हॉस्टल से रहे हैं क्या?” (और क्या किताबें लेके काशी से आऊंगा), “अभी रहा था तो रास्ते में आपके क्लास का एक लड़का दिखा था” (तो मैं क्या करूं) इत्यादि। आपको चिढ़ बहुत आयेगी मगर जवाब तो देना ही पड़ेगा। इन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि आप क्लास के लिए लेट हो रहे हैं या आपका एक्जाम छूट रहा है। हां, एक बात और, ये दिन में जितनी बार आपसे मिलेंगे उतनी बार हाथ मिलाएंगे और कैसे हैंइस मुद्रा में पुछेंगे जैसे वर्षों के बिछुड़े भाई मिलें हों।

कड़ा चाट :- ऐसे चाटों का मानना होता है कि अवसर का इंतजार मत करो बल्कि उसे तलाशो। इनके अनुसार तसल्ली से बातचीत तो कमरे पर ही हो सकती है, इसलिए ये सीधे आपके कमरे पर ही पधारते हैं। पधारने का समय ऐसा अनुकूल होता है कि आप कोई बहाना बनाकर छूट भी नहीं सकते; जैसे, जब आप लंच के बाद सोने के लिए बिस्तर पर बस लेटने ही वाले हों या फ़िर छुट्टी का दिन हो और आप कमरे में पायजामा और बनियान में आराम से अखबार वगैरह पढ़ रहे हों। ये आते ही पहला वाक्य बोलेंगे अरे, आपको फ़ालतू डिस्टर्ब किया। दर असल कमरे में बैठकर बोर हो रहा था। अब हॉस्टल में दोचार बातें करने लायक आदमी ही कितने हैं (आप जैसे बेवकूफ़ को छोड़कर)और आप फ़ॉर्मलिटी निभाते हुए कहेंगे अरे नहीं, अच्छे आये; मैं भी बोर ही हो रहा था इसके बाद उनका चाट भाषण शुरू होगा। बिषय उनके ही महान जीवन से जुड़े होंगे; जैसे, कैसे उनके फलाना शिक्षक के एक्जाम में सारे प्रश्न सही करने के बाद भी (*गाली*) शिक्षक ने फ़ेल कर दिया या फ़िर कैसे गांव मे उन्होंने दारोगा पर गोली चला दी इत्यादि। आप ये सोच कर अनमने ढंग से सिर्फ़ हाँ“, “हूँकरते रहेंगे कि मेरा ज्यादा इंटरेस्ट नहीं देखकर ये जल्दी चला जायेगा। लेकिन वो चाट ही क्या जो इतनी जल्दी हार मान ले। आखिरकार आप ऊब कर कहेंगे,”चलिये, गंगा ढाबे पर चाय पीकर आते हैं ये सोचकर कि शायद ये महाशय चाय पीकर उधर से ही अपने कमरे में चले जायेंगे। इसी सुखद कल्पना में चाय और पकौड़े के पैसे भी आप ही दे देंगे। लेकिन आप यह देखकर सर पीट लेंगे कि श्रीमान आपके साथसाथ ही वापस आपके कमरे का रुख करते हैं।

राजनीतिक चाट :- ये किसी छात्र संगठन से जुड़े होते हैं इनको आप हुलिये से भी पह्चान सकते हैं: बढी हुई दाढ़ी, कंधे पर झोला और पैरों में हवाई चप्पल। ऐसा लगेगा सारी दुनिया को बदलने का जिम्मेदारी इन्ही के कंधों पर है। ये अपको कैंपस में यहांवहां भटकते हुए, ढाबों पर (शिकार की तलाश में) अथवा किसी धरना, प्रदर्शन या भूख हड़ताल में दिख जाएंगे। इनका भाषण रेडिमेड होता है और मौका देखते ही न्यूक्लियर डील, आतंकवाद, या बम विस्फ़ोटों के ऊपर आधे पौन घंटे का भाषण पेल देंगे। ये छोटी से छोटी बात को भी इतने जोरदार और उत्तेजक तरीके से बोलेंगे कि अपको लगेगा कि शायद तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया है। उदाहरण के लिए किसी लड़के ने चलती बस से थूक दिया और वो गलती से किसी पर पड़ गया इसपर उनका भाषण होगा,”यह कोई छोटी घटना नहीं है, आप इसकी गहराई में जाएं तो यह समाजवादी आंदोलन को धूमिल करने और कुचलने की कोशिश है। यहां बस पर बैठा छात्र पूंजीवाद का प्रतीक है और फ़ूटपाथी विद्यार्थी समाजवाद और प्रगतिशील विचरधारा का। हमारी जे एन यू प्रशासन से माँग है कि () इस मामले की जांच के लिए एक उच्च्स्तरीय कमिटी बनाई जाए, () पीड़ित छात्र को अगली दो परीक्षाओं में बिना बैठे ही पास कर दिया जाये और () कैम्पस मे थूक फेंकने वालों (खासकर बस से) पर पोटा और मकोका के तहत मुकदमा चलाया जाए। हमारी पार्टी यह भी चाहेगी की पूरे देश में इस मुद्दे एक सार्थक बहस हो। आज शाम इसी मुद्दे पर हम माही हॉस्टल मेस मे एक मीटिंग कर रहे हैं जिसमें हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष फलानाप्रसाद डिमकानादास भी रहे हैं। आपको ज़रूर आना है (यह वाक्य वो इस तरह से बोलेगा कि आपको लगेगा कि आपके बिना उनकी पार्टी और आंदोलन चल ही नहीं पाएंगे)अब इतने ज़बर्दस्त तरीके से चाटे जाने के बाद भी अगर आप उनकी मीटिंग में सोच रहे हैं तो मैं आपकी झेलूप्रतिभा को प्रणाम करता हूं। राजनीतिक चाटों से पिंड छुड़ाना भी उतना ही मुश्किल है। अगर आपने बीच में बोल कि, “अब मैं चलूंगा। मुझे जरा नेहरू प्लेस जाना हैतो वे तपाक से बोलेंगे, “अरे याद आया, नेहरु प्लेस तो मुझे भी जाना था। चलिये साथ में चलते हैं।अब अगर आपको सही में जाना भी होग तो भी आप प्लैन रद्द ही कर देंगे।

खखोर चाट :- ये बड़े ही घातक किस्म के चाट होते हैं। इन्हें दूर से ही देखकर लोग अपना रास्ता बदल लेते हैं। चाट समाज इन्हें अपना गौरव मानता है। एक्चुअली, ये चाटते कम हैं, खखोरते ज्यादा हैं। इन्हें बुद्धिजीवी चाटभी कहते हैं। इनकी पह्चान यह है कि ये गुमसुम और विचारमग्न मुद्रा में रहेंगे, इनके हाथ में अकसर किसी बड़े अंग्रेजी लेखक की मोटी सी किताब रहेगी (जिसका शीर्षक भी हमआप जैसे मूढ़मति की समझ से बाहर होगा, किताब तो दूर की बात है) ये जेनरली आइ एस या पी सी एस की तैयारी कर रहे होते हैं इनके चाट भाषण के विषय भी आम आदमी की समझ से बाहर के होते हैं; जैसे, वर्तमान आर्थिक मंदी के संदर्भ में लियोनार्दो दा विन्सी के फ़लाने इसवी में बने चित्र का क्या महत्व है, या फ़िर बोलीविया के एक गांव मे गरीबी हटाने के तरीकों की खोज के लिए अमेरिका की बी सी युनिवर्सिटी में चल रहा १२० करोड़ का रिसर्च प्रोजेक्ट। अब इनको कौन बताए की अगर हमारी वैचारिक क्षमता इतनी ही तीक्ष्ण होती तो यहां बैठकर घास छील रहे होते; किसी हिन्दी चैनल में न्यूज़ एडिटर बन जाते।………………….

परसों सोमवार से एक्ज़ाम है बाकी पोस्ट तीन चार दिन में पूरी करूंगा।

 

जे एन यू में छात्र राजनीति

जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से नेक है। आज जहां देश के अन्य विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति हिंसा, बाहुबल, धनबल और भ्रष्टाचार जैसी बुराईयों से ग्रस्त है वहीं जे एन यू की छात्र राजनीति आज भी लोकतंत्र के उच्चतम मानदन्डों को सिर्फ़ सहेजे हुए है बल्कि दिनोंदिन उन्हें नई उंचाईयों की ओर ले जाने के लिए प्रयत्न्शील है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथसाथ इजराइलफ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जनआंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं।

जे एन यू छात्र राजनीति की एक विशेषता यह भी है कि यहां पूरी चुनाव प्रक्रिया का संचालन खुद छात्रों द्वारा किया जाता है तथा जे एन यू प्रशासन की इसमें कोई भुमिका नहीं होती। काबिलेतरीफ़ बात यह है कि यह काम इतने कुशल, निष्पक्ष और अनुशासित तरीके से संपादित किया जाता है कि भारतीय निर्वाचन आयोग के बड़े पदाधिकारी भी इसके उदाहरण देते हैं। हाल ही में लिंग्दोह कमिटी ने अपनी रिपोर्ट मे जे एन यू की चुनाव प्रक्रिया को एक आदर्श के रूप में स्वीकार किया है। यहां सभी छात्र नेता सिर्फ़ हाथ से लिखे पोस्टर्स, साइज़ पर्चों और व्यक्तिगत सम्पर्क के माध्यम से प्रचार करते हैं चुनाव के संचालन के लिए छात्रों द्वारा एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव समिति का गठन किया जाता है। स्कूल स्तर पर काउंसिलर्स तथा केन्द्रीय पैनल के लिये अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव के पदों के लिए चुनाव किया होता है। चुनाव से ठीक पहले जीबीएम (आम छात्र सभा) बुलाई जाती है जिसमें सभी उम्मीदवार छात्रों के समक्ष अपने विचार और योजनाओं को रखते हैं और उनपर उठाए गए सवालों के जवाब देते हैं।

चुनावों के लिए नामांकन के बाद से कैंपस में राजनीतिक माहौल गरमा जाता है और ढाबों पर चाय के साथ गरमागरम बहसों का दौर शुरू हो जाता है। रात को डिनर के बाद रोज किसी किसी हॉस्टल मेस मे पॉलिटिकल मीटिंग होती ही है। कुल मिलाकर १०१५ दिनों तक उत्सव का सा माहौल रह्ता है। छात्रों के उत्साह और राजनीतिक जागरुकता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जे एन यू मे मतदान का प्रतिशत ६०% से भी ज्यादा होता है।

फिलहाल इस साल जे एन यू एस यू चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अस्थाई रोक लगा दी गई हैं। विशेष जानकारी के लिए पढ़ें यह पोस्ट।

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