चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

इन्दु जी क्या हुआ आपको अप्रैल 11, 2009

यह कविता बाबा नागार्जुन ने इंदिरा गांधी की हिटलरी नीतियों के विरोध में लिखी थी. 

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?

सत्ता की मस्ती में

भूल गई बाप को?

इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?


आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग

हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग

सच-सच बताओ भी

क्या हुआ आपको

यों भला भूल गईं बाप को!


छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको

काले चिकने माल का मस्का लगा आपको

किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको

अन्ट-शन्ट बक रही जनून में

शासन का नशा घुला ख़ून में

फूल से भी हल्का

समझ लिया आपने हत्या के पाप को

इन्दु जी, क्या हुआ आपको

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!


बचपन में गांधी के पास रहीं

तरुणाई में टैगोर के पास रहीं

अब क्यों उलट दिया ‘संगत’ की छाप को?

क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको

बेटे को याद रखा, भूल गई बाप को

इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी…


रानी महारानी आप

नवाबों की नानी आप

नफ़ाख़ोर सेठों की अपनी सगी माई आप

काले बाज़ार की कीचड़ आप, काई आप


सुन रहीं गिन रहीं

गिन रहीं सुन रहीं

सुन रहीं सुन रहीं

गिन रहीं गिन रहीं


हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को

एक-एक टाप को, एक-एक टाप को


सुन रहीं गिन रहीं

एक-एक टाप को

हिटलर के घोड़े की, हिटलर के घोड़े की

एक-एक टाप को…

छात्रों के ख़ून का नशा चढ़ा आपको

यही हुआ आपको यही हुआ आपको

(१९७४ में रचित,’खिचड़ी विप्लव देखा हमने’ नामक संग्रह से )

बाबा नागार्जुन के काव्य संसार का आनंद लेने के लिए जेएनयू पर चलें.

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आओ, बेटी, आ जाओ, पास बैठो अप्रैल 10, 2009

विज्ञापन सुंदरी

रमा लो मांग में सिन्दूरी छलना…

फिर बेटी विज्ञापन लेने निकलना…

तुम्हारी चाची को यह गुर कहाँ था मालूम!


हाथ न हुए पीले

विधि विहित पत्नी किसी की हो न सकीं

चौरंगी के पीछे वो जो होटल है

और उस होटल का

वो जो मुच्छड़ रौबीला बैरा है

ले गया सपने में बार-बार यादवपुर

कैरियर पे लाद के कि आख़िर शादी तो होगी ही

नहीं? मैं झूठ कहता हूँ?

ओ, हे युग नन्दिनी विज्ञापन सुन्दरी,

गलाती है तुम्हारी मुस्कान की मृदु मद्धिम आँच

धन-कुलिश हिय-हम कुबेर के छौनों को

क्या ख़ूब!

क्या ख़ूब

कर लाई सिक्योर विज्ञापन के आर्डर!

क्या कहा?

डेढ़ हज़ार?

अजी, वाह, सत्रह सौ!

सत्रह सौ के विज्ञापन?

आओ, बेटी, आ जाओ, पास बैठो

तफसील में बताओ…

कहाँ-कहाँ जाना पड़ा? कै-कै बार?

क्लाइव रोड?

डलहौजी?

चौरंगी?

ब्रेबोर्न रोड?

बर्बाद हुए तीन रोज़ : पाँच शामें ?

कोई बात नहीं…

कोई बात नहीं…

आओ, आओ, तफ़सील में बतलाओ!

रचनाकार: नागार्जुन

 

बाकी बच गया अण्डा

Filed under: नागार्जुन — Satish Chandra Satyarthi @ 3:21 अपराह्न
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पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया,बाकी रह गये चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गये दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झन्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा

रचनाकाल : 1950

रचनाकार : नागार्जुन


बाबा नागार्जुन के काव्य संसार का आनंद लेने के लिए जेएनयू पर चलें.

 

नागार्जुन के दोहे – अन्नपचीसी से फ़रवरी 1, 2009

सीधे सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़।
अन्नपचीसी खोल ले, अर्थ जान ले मूढ़।

कबिरा खड़ा बज़ार में लिए लुकाठी हाथ।
बंदा क्या घबराएगा जनता देगी साथ।

छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट।
मिल सकती कैसे भला अन्न चोर को छूट।

आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाश।
कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफाश।

नागार्जुन मुख से कढ़े साखी के ये बोल।
साथी को समझाइए रचना है अनमोल।

अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़ करोड़।
सचमुच ही लग जाएगी, आँख कान में होड़।

अन्न ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच।
औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच।

 

अग्निबीज – नागार्जुन जनवरी 31, 2009

Filed under: नागार्जुन — Satish Chandra Satyarthi @ 8:15 अपराह्न
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अग्निबीज
तुमने बोए थे
रमे जूझते,
युग के बहु आयामी
सपनों में, प्रिय
खोए थे!
अग्निबीज
तुमने बोए थे

तब के वे साथी
क्या से क्या हो गए,
कर दिया क्या से क्या तो,
देख-देख
प्रतिरूपी छवियाँ
पहले खीझे
फिर रोए थे
अग्निबीज
तुमने बोए थे

ऋषि की दृष्टि
मिली थी सचमुच
भारतीय आत्मा थे तुम तो
लाभ-लोभ की हीन भावना
पास न फटकी
अपनों की यह ओछी नीयत
प्रतिपल ही
काँटों-सी खटकी
स्वेच्छावश तुम
शरशैया पर लेट गए थे
लेकिन उन पतले होठों पर
मुस्कानों की आभा भी तो
कभी-कभी खेला करती थी!
यही फूल की अभिलाषा थी
निश्चय, तुम तो
इस ‘जन-युग’ के
बोधिसत्व थे,
पारमिता में त्याग तत्व थे।