चौपाल

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“घर में वापसी” – धूमिल की एक कविता मार्च 27, 2009

सुदामा प्रसाद पाण्डेयधूमिलकी एक और कविता आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। पता नहीं क्यों इसे पढने के बाद ब्लॉग पर डालने का मोह नहीं दबा पाया। छोटी सी कविता के सरल शब्दों में मानवीय रिश्तों के अलावा भी कुछ बताने की कोशिश की है कवि ने और कहना होगा की इसमें वह विलक्षण रूप से सफल भी रहा है। मैं और अधिक बोलकर इस कविता को कमज़ोर नहीं करना चाहता हूँ क्योंकि कुछ कविताएँ ऐसी होती हैं जिनको महसूस किया जाता है व्यक्त नहीं; अभिव्यक्ति भावों को कमज़ोर कर देती है। आनंद लीजिये ………………………

घर में वापसी

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं
माँ की आँखें
पड़ाव से पहले ही
तीर्थयात्रा की बस के
दो पंचर पहिये हैं।


पिता की आँखें
लोहसाँयसी ठंडी शलाखें हैं।
बेटी की आँखेंमंदिर में दीवट पर
जलते घी के
दो दिये हैं।


पत्नी की आँखें, आँखें नहीं
हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं।
वैसे हम स्वजन हैं,
करीब हैं
बीच की दीवार के दोनों ओर
क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं।
रिश्ते हैं,
लेकिन खुलते नहीं हैं।
और हम अपने खून में इतना भी लोहा
नहीं पाते
कि हम उससे एक ताली बनाते
और भाषा के भुन्नासी ताले को खोलते
रिश्तों को सोचते हुए
आपस मे प्यार से बोलते


कहते कि ये पिता हैं
यह प्यारी माँ है,
यह मेरी बेटी है
पत्नी को थोड़ा अलग
करतेतू मेरी
हमबिस्तर नहींमेरी
हमसफ़र है


हम थोड़ा जोखिम उठाते
दीवार पर हाथ रखते और कहते
यह मेरा घर है

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मेरे लिये हर आदमी एक जोड़ी जूता है मार्च 24, 2009

धूमिल की यह कविता कुछ वर्षों पहले भी पढी थी पर उस वक्त कुछ ख़ास अनुभूति नहीं हुई थी। शायद इस कविता को समझने की उम्र नहीं थी या फ़िर एक छोटे से गाँव में रहने के कारण इस कविता के व्यावहारिक रूप का अनुभव नहीं हुआ था, इस कारण दिल्ली में कुछ सालों तक रहने के बाद जब एक दिन दुबारा इस कविता को पढ़ा तो कई नए पहलू उभर कर सामने आए

धूमिल जी हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील और विद्रोही कवियों में गिने जाते हैं उनकी कविताएँ जहाँ एक ओर आम जन की भाषा में उसके दर्द को, उसके विद्रोह को व्यक्त करती है वहीं दूसरी ओर समाज के शोषक वर्ग, राजनीति और व्यवस्था पर करारा व्यंग्य भी करती है

इस कवितामोचीराममें एक मोची के माध्यम से धूमिल एक साथ समाज की कई बुराइयों पर चोट करते हैं। एक ओर तो वे जाति और वर्ण व्यवस्था पर चोट करते हैं तो दूसरी ओर मध्य वर्ग के झूठे आत्मगौरव और दिखावे की प्रवृति को भी नंगा करते हैं। साथ ही इसमें समाज के एक नीचले स्तर के व्यक्ति का ऊहापोह भी दिखाया गया है; वह अपने आप से सवाल जवाब करता है। कभी वह अपने पेशे को कोसता है तो कभी उसे अपनी जाति को कोसने पर मलाल भी होती है। कभी वह मध्यवर्ग को नफरत की नज़रों से देखता है तो कभी उसे उनकी विवशता पर तरस भी आता है।

इस कविता के द्वारा धूमिल ने यह भी जताने की कोशिश की है कि कविता तथाकथित सभ्य और बुद्धिजीवी वर्ग की बपौती नहीं है। और ही कविता की भाषा पर किसी ख़ास वर्ग का अधिकार नहीं है। ऐसा लिखते हुए वे कविता को छंद, लय और अलंकृत भाषाप्रयोग के बंधनों से मुक्त करने की वकालत करते हुए दिखाई देते हैं।

लीजिए इस कविता को पढिये और पढ़कर आपके मन में जो उदगार उठते हैं उन्हें टिप्पणियों के माध्यम से व्यक्त कीजिये.

मोचीराम


राँपी से उठी हुई आँखों ने मुझे
क्षणभर टटोला

और फिर

जैसे पतियाये हुये स्वर में

वह हँसते हुये बोला

बाबूजी सच कहूँमेरी निगाह में

कोई छोटा है

कोई बड़ा है

मेरे लिये,हर आदमी एक जोड़ी जूता है

जो मेरे सामने

मरम्मत के लिये खड़ा है।


और असल बात तो यह हैकि वह चाहे जो है

जैसा है,जहाँ कहीं है

आजकल

कोई आदमी जूते की नाप से

बाहर नहीं है

फिर भी मुझे ख्याल है रहता है

कि पेशेवर हाथों और फटे जूतों के बीच

कहीं कहीं एक आदमी है

जिस पर टाँके पड़ते हैं,

जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट छाती पर

हथौड़े की तरह सहता है।


यहाँ तरहतरह के जूते आते हैं और आदमी की अलगअलगनवैयत

बतलाते हैं

सबकी अपनीअपनी शक्ल है

अपनीअपनी शैली है

मसलन एक जूता है:

जूता क्या हैचकतियों की थैली है

इसे एक आदमी पहनता है

जिसे चेचक ने चुग लिया है

उस पर उम्मीद को तरह देती हुई हँसी है

जैसेटेलीफ़ूनके खम्भे पर

कोई पतंग फँसी है

और खड़खड़ा रही है।


बाबूजी! इस पर पैसा क्यों फूँकते हो?’ मैं कहना चाहता हूँ

मगर मेरी आवाज़ लड़खड़ा रही है

मैं महसूस करता हूँभीतर से

एक आवाज़ आती है-’कैसे आदमी हो

अपनी जाति पर थूकते हो।

आप यकीन करें,उस समय

मैं चकतियों की जगह आँखें टाँकता हूँ

और पेशे में पड़े हुये आदमी को

बड़ी मुश्किल से निबाहता हूँ।


एक जूता और है जिससे पैर को

नाँघकरएक आदमी निकलता है

सैर को

वह अक्लमन्द है

वक्त का पाबन्द है

उसकी आँखों में लालच है

हाथों में घड़ी है

उसे जाना कहीं नहीं है

मगर चेहरे पर

बड़ी हड़बड़ी है

वह कोई बनिया है

या बिसाती है

मगर रोब ऐसा कि हिटलर का नाती है

इशे बाँद्धो,उशे काट्टो,हियाँ ठोक्को,वहाँ पीट्टो

घिस्सा दो,अइशा चमकाओ,जूत्ते को ऐना बनाओ

ओफ्फ़! बड़ी गर्मी है

रुमाल से हवा करता है,

मौसम के नाम पर बिसूरता है

सड़क परआतियोंजातियोंको

बानर की तरह घूरता है

गरज़ यह कि घण्टे भर खटवाता है

मगर नामा देते वक्त

साफनटजाता है

शरीफों को लूटते होवह गुर्राता है

और कुछ सिक्के फेंककर

आगे बढ़ जाता है

अचानक चिंहुककर सड़क से उछलता है

और पटरी पर चढ़ जाता है

चोट जब पेशे पर पड़ती है

तो कहींकहीं एक चोर कील

दबी रह जाती है

जो मौका पाकर उभरती है

और अँगुली में गड़ती है।


कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

कि मुझे कोई ग़लतफ़हमी है

मुझे हर वक्त यह खयाल रहता है कि जूते

और पेशे के बीच

कहींकहीं एक अदद आदमी है

जिस पर टाँके पड़ते हैं

जो जूते से झाँकती हुई अँगुली की चोट

छाती पर

हथौड़े की तरह सहता है

और बाबूजी! असल बात तो यह है कि ज़िन्दा रहने के पीछे

अगर सही तर्क नहीं है

तो रामनामी बेंचकर या रण्डियों की

दलाली करके रोज़ी कमाने में

कोई फर्क नहीं है

और यही वह जगह है जहाँ हर आदमी

अपने पेशे से छूटकर

भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है

सभी लोगों की तरह

भाष़ा उसे काटती है

मौसम सताता है

अब आप इस बसन्त को ही लो,

यह दिन को ताँत की तरह तानता है

पेड़ों पर लाललाल पत्तों के हजा़रों सुखतल्ले

धूप में, सीझने के लिये लटकाता है

सच कहता हूँउस समय

राँपी की मूठ को हाथ में सँभालना

मुश्किल हो जाता है

आँख कहीं जाती है

हाथ कहीं जाता है

मन किसी झुँझलाये हुये बच्चेसा

काम पर आने से बारबार इन्कार करता है

लगता है कि चमड़े की शराफ़त के पीछे

कोई जंगल है जो आदमी पर

पेड़ से वार करता है

और यह चौकने की नहीं,सोचने की बात है

मगर जो जिन्दगी को किताब से नापता है

जो असलियत और अनुभव के बीच

खून के किसी कमजा़त मौके पर कायर है

वह बड़ी आसानी से कह सकता है

कि यार! तू मोची नहीं ,शायर है

असल में वह एक दिलचस्प ग़लतफ़हमी का

शिकार है

जो वह सोचता कि पेशा एक जाति है

और भाषा पर

आदमी का नहीं,किसी जाति का अधिकार है

जबकि असलियत है यह है कि आग

सबको जलाती है सच्चाई

सबसे होकर गुज़रती है

कुछ हैं जिन्हें शब्द मिल चुके हैं

कुछ हैं जो अक्षरों के आगे अन्धे हैं

वे हर अन्याय को चुपचाप सहते हैं

और पेट की आग से डरते हैं

जबकि मैं जानता हूँ किइन्कार से भरी हुई एक चीख़

औरएक समझदार चुप

दोनों का मतलब एक है

भविष्य गढ़ने में ,’चुपऔरचीख

अपनीअपनी जगह एक ही किस्म से

अपनाअपना फ़र्ज अदा करते हैं।

 

घर में वापसी — धूमिल फ़रवरी 2, 2009

Filed under: सुदामा पांडेय 'धूमिल' — Satish Chandra Satyarthi @ 12:07 अपराह्न
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मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं
माँ की आँखें
पड़ाव से पहले ही
तीर्थ-यात्रा की बस के
दो पंचर पहिये हैं।

पिता की आँखें…
लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं।
बेटी की आँखें… मंदिर में दीवट पर
जलते घी के
दो दिये हैं।

पत्नी की आँखें, आँखें नहीं
हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं।
वैसे हम स्वजन हैं,
करीब हैं
बीच की दीवार के दोनों ओर
क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं।
रिश्ते हैं,
लेकिन खुलते नहीं हैं।
और हम अपने खून में इतना भी लोहा
नहीं पाते
कि हम उससे एक ताली बनाते
और भाषा के भुन्नासी ताले को खोलते
रिश्तों को सोचते हुए
आपस मे प्यार से बोलते

कहते कि ये पिता हैं
यह प्यारी माँ है,
यह मेरी बेटी है
पत्नी को थोड़ा अलग
करते…तू मेरी
हमबिस्तर नहीं…मेरी
हमसफ़र है

हम थोड़ा जोखिम उठाते
दीवार पर हाथ रखते और कहते…
यह मेरा घर है