चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

जे एन यू में छात्र राजनीति नवम्बर 15, 2008

जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से नेक है। आज जहां देश के अन्य विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति हिंसा, बाहुबल, धनबल और भ्रष्टाचार जैसी बुराईयों से ग्रस्त है वहीं जे एन यू की छात्र राजनीति आज भी लोकतंत्र के उच्चतम मानदन्डों को सिर्फ़ सहेजे हुए है बल्कि दिनोंदिन उन्हें नई उंचाईयों की ओर ले जाने के लिए प्रयत्न्शील है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथसाथ इजराइलफ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जनआंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं।

जे एन यू छात्र राजनीति की एक विशेषता यह भी है कि यहां पूरी चुनाव प्रक्रिया का संचालन खुद छात्रों द्वारा किया जाता है तथा जे एन यू प्रशासन की इसमें कोई भुमिका नहीं होती। काबिलेतरीफ़ बात यह है कि यह काम इतने कुशल, निष्पक्ष और अनुशासित तरीके से संपादित किया जाता है कि भारतीय निर्वाचन आयोग के बड़े पदाधिकारी भी इसके उदाहरण देते हैं। हाल ही में लिंग्दोह कमिटी ने अपनी रिपोर्ट मे जे एन यू की चुनाव प्रक्रिया को एक आदर्श के रूप में स्वीकार किया है। यहां सभी छात्र नेता सिर्फ़ हाथ से लिखे पोस्टर्स, साइज़ पर्चों और व्यक्तिगत सम्पर्क के माध्यम से प्रचार करते हैं चुनाव के संचालन के लिए छात्रों द्वारा एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव समिति का गठन किया जाता है। स्कूल स्तर पर काउंसिलर्स तथा केन्द्रीय पैनल के लिये अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव के पदों के लिए चुनाव किया होता है। चुनाव से ठीक पहले जीबीएम (आम छात्र सभा) बुलाई जाती है जिसमें सभी उम्मीदवार छात्रों के समक्ष अपने विचार और योजनाओं को रखते हैं और उनपर उठाए गए सवालों के जवाब देते हैं।

चुनावों के लिए नामांकन के बाद से कैंपस में राजनीतिक माहौल गरमा जाता है और ढाबों पर चाय के साथ गरमागरम बहसों का दौर शुरू हो जाता है। रात को डिनर के बाद रोज किसी किसी हॉस्टल मेस मे पॉलिटिकल मीटिंग होती ही है। कुल मिलाकर १०१५ दिनों तक उत्सव का सा माहौल रह्ता है। छात्रों के उत्साह और राजनीतिक जागरुकता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जे एन यू मे मतदान का प्रतिशत ६०% से भी ज्यादा होता है।

फिलहाल इस साल जे एन यू एस यू चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अस्थाई रोक लगा दी गई हैं। विशेष जानकारी के लिए पढ़ें यह पोस्ट।

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जे एन यू – जहाँ सवाल करना सिखाया जाता है। नवम्बर 13, 2008

जे एन यू के बारे में एक कहावत है कि यहाँ प्रश्नों का उत्तर देना नहीं सिखाया जाता बल्कि उत्तरों पर प्रश्न उठाना सिखाया जाता है अपनी इसी प्रश्न पूछने की आदत और जिज्ञासु प्रवृति के कारण जे एन यू के छात्र अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों से अलग पहचाने जाते हैं। इस प्रश्न पूछने के कल्चर का रहस्य यहाँ की अद्वितीय गुरुशिष्य परंपरा में छुपा हुआ है।

जे एन यू शायद अकेला ऐस विश्वविद्यालय है जहाँ आपको प्रोफ़ेसर्स छात्रों के साथ चाय पीते और पकौड़े खाते दिख जायेंगे; जहाँ सभी छात्रों के पास सभी शिक्षकों के फ़ोन नम्बर्स और पते होते हैं और अपनी किसी भी समस्या के लिए वे इनका इस्तेमाल भी कर सकते हैं; जहाँ हर शिक्षक अपने सभी छात्रों को उनके नाम से जानता है; जहां शिक्षक विश्वविद्यालय परीक्षा की तारीख इसलिए बढ़ा देते हैं कि किसी छात्र के पिताजी अस्पताल में भर्ती हैं और वह परीक्षा में उस दिन शामिल नहीं हो सकता।

यहाँ शिक्षक छात्रों के अभिभावक भी होते हैं और दोस्त भी। शिक्षकों और छात्रों के बीच इस प्रगाढ़ संबंध का एक कारण जे एन यू का उच्च शिक्षकछात्र अनुपात (:१०) भी है। जे एन यू के प्रोफ़ेसर्स अपने अपने विषयों के ख्यातिप्राप्त विद्वान होते हैं पर कक्षा में उनको पढ़ाते देखकर आपको लगेगा कि यहां किसी बड़े यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर का लेक्चर नहीं चल रहा बल्कि छात्र आपस में बातचीत कर रहे हैं और कोइ शिक्षक बस उनकी बातचीत को नियंत्रित और दिशानिर्देशित कर रहा है।

शिक्षक यहां अपने विचारों को छात्रों पर थोपते नहीं बल्कि उनके विचारों को उद्वेलित करते हैं। वे छात्रों की सोच को एक वैचारिक धरातल देने की कोशिश करते हैं। अन्य विश्वविद्यालयों कि तरह जे एन यू में कक्षाओं और परीक्षाओं की तारीख और समय ब्रह्मवाक्य की तरह अचल अटल नहीं होते। यह बहुत कुछ शिक्षकों और छात्रों की आपसी समझ और सुविधा के अनुसार परिवर्तनीय होता है। यहां अपको रात के दस बजे खुले आसमान के नीचे क्लास लगाते शिक्षक और छात्र भी दिख जायेंगे।

छात्र सिर्फ़ कैरियर, समाज़ और राजनीति जैसे विषयों पर शिक्षकों से खुलकर बात करते हैं बल्कि अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भी उनके साथ शेयर करते हैं और शिक्षकगण यथासम्भव उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।

जे एन यू की गुरुशिष्य परंपरा सचमुच अद्वितीय और गौरवशाली है। अगर अन्य विश्वविद्यालय भी जे एन यू के मॉडल का अनुकरण करें तो सिर्फ़ शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारा जा सकता है बल्कि नैतिक मूल्यों और आत्मविश्वास से लबरेज़ छात्रों की एक पीढ़ी तैयार की जा सकती है।