चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं फ़रवरी 1, 2009

Filed under: गुलज़ार — Satish Chandra Satyarthi @ 7:29 अपराह्न
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::————————  गुलज़ार

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

एक है जिसका सर नवें बादल में है

दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है

एक है जो सतरंगी थाम के उठता है

दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है

फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा

एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है

‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है

हिंदुस्तान उम्मीद से है!

आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है

सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है

साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है

अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!

हिन्दोस्तान उम्मीद से है..

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जरा छींक ही दो तुम – गुलज़ार

Filed under: गुलज़ार — Satish Chandra Satyarthi @ 2:33 अपराह्न
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चिपचिपे दूध से नहलाते हैं

आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।

शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या

घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के


औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर

पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो

इक पथराई सी मुस्कान लिए

बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।


जब धुआँ देता, लगातार पुजारी

घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर

इक जरा छींक ही दो तुम,

तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

 

आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ – गुलज़ार नवम्बर 14, 2008

Filed under: गुलज़ार — Satish Chandra Satyarthi @ 2:06 अपराह्न
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आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हा नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों से पोंचने से लगा आँच का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमान ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ