चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

जे एन यू – जहाँ सवाल करना सिखाया जाता है। नवम्बर 13, 2008

जे एन यू के बारे में एक कहावत है कि यहाँ प्रश्नों का उत्तर देना नहीं सिखाया जाता बल्कि उत्तरों पर प्रश्न उठाना सिखाया जाता है अपनी इसी प्रश्न पूछने की आदत और जिज्ञासु प्रवृति के कारण जे एन यू के छात्र अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों से अलग पहचाने जाते हैं। इस प्रश्न पूछने के कल्चर का रहस्य यहाँ की अद्वितीय गुरुशिष्य परंपरा में छुपा हुआ है।

जे एन यू शायद अकेला ऐस विश्वविद्यालय है जहाँ आपको प्रोफ़ेसर्स छात्रों के साथ चाय पीते और पकौड़े खाते दिख जायेंगे; जहाँ सभी छात्रों के पास सभी शिक्षकों के फ़ोन नम्बर्स और पते होते हैं और अपनी किसी भी समस्या के लिए वे इनका इस्तेमाल भी कर सकते हैं; जहाँ हर शिक्षक अपने सभी छात्रों को उनके नाम से जानता है; जहां शिक्षक विश्वविद्यालय परीक्षा की तारीख इसलिए बढ़ा देते हैं कि किसी छात्र के पिताजी अस्पताल में भर्ती हैं और वह परीक्षा में उस दिन शामिल नहीं हो सकता।

यहाँ शिक्षक छात्रों के अभिभावक भी होते हैं और दोस्त भी। शिक्षकों और छात्रों के बीच इस प्रगाढ़ संबंध का एक कारण जे एन यू का उच्च शिक्षकछात्र अनुपात (:१०) भी है। जे एन यू के प्रोफ़ेसर्स अपने अपने विषयों के ख्यातिप्राप्त विद्वान होते हैं पर कक्षा में उनको पढ़ाते देखकर आपको लगेगा कि यहां किसी बड़े यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर का लेक्चर नहीं चल रहा बल्कि छात्र आपस में बातचीत कर रहे हैं और कोइ शिक्षक बस उनकी बातचीत को नियंत्रित और दिशानिर्देशित कर रहा है।

शिक्षक यहां अपने विचारों को छात्रों पर थोपते नहीं बल्कि उनके विचारों को उद्वेलित करते हैं। वे छात्रों की सोच को एक वैचारिक धरातल देने की कोशिश करते हैं। अन्य विश्वविद्यालयों कि तरह जे एन यू में कक्षाओं और परीक्षाओं की तारीख और समय ब्रह्मवाक्य की तरह अचल अटल नहीं होते। यह बहुत कुछ शिक्षकों और छात्रों की आपसी समझ और सुविधा के अनुसार परिवर्तनीय होता है। यहां अपको रात के दस बजे खुले आसमान के नीचे क्लास लगाते शिक्षक और छात्र भी दिख जायेंगे।

छात्र सिर्फ़ कैरियर, समाज़ और राजनीति जैसे विषयों पर शिक्षकों से खुलकर बात करते हैं बल्कि अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भी उनके साथ शेयर करते हैं और शिक्षकगण यथासम्भव उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।

जे एन यू की गुरुशिष्य परंपरा सचमुच अद्वितीय और गौरवशाली है। अगर अन्य विश्वविद्यालय भी जे एन यू के मॉडल का अनुकरण करें तो सिर्फ़ शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारा जा सकता है बल्कि नैतिक मूल्यों और आत्मविश्वास से लबरेज़ छात्रों की एक पीढ़ी तैयार की जा सकती है।

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