चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

राज ठाकरे और राजनीति का बदलता चरित्र नवम्बर 5, 2008

– एक –

पहले राजनेता नहीं थे। शुरूआती होमोसेपियंस ने दुनिया में जहाँ चाहा, वहाँ अपना तम्बू गाड़ा और वहीं रहने लगे।
फिर धीरे-धीरे शुरुआती राजनेता आए और देश बने। एक देश से दूसरे देश में जाना दूभर हो गया। किसी गढ़रिए ने बॉर्डर क्रॉस किया तो पुलिस पकड़ने लगी।
फिर आए राज ठाकरे टाइप लोग… एक राज्य से दूसरे राज्य में आना-जाना मुश्किल हो गया। गए तो ठोंक-बजा दिए गए।
अब लगता है कुछ दिनों में शहरों की दिक़्क़त आएगी… आगरा से मथुरा गए तो पिटाई हो जाएगी।
फिर राजनीति और आगे बढ़ेगी… प्रांतवाद के बाद मुहल्लावाद भी आएगा। ये सोचकर कॉलेज के मेरे नॉट-सो-गुड-फ़्रेण्ड्स बहुत ख़ुश हैं। अगर मैं छिपीटोले गया, तो मेरा घण्टा बजाने का मौक़ा मिलेगा। मैं भी ख़ुश हूँ… मुझे भी मौक़ा मिलेगा।
इसके बाद गलीवाद भी आएगा… सामने वाली गली में गए ग़लती से तो भरपूर प्रसाद देकर वापस भेजा जाएगा।
फिर शायद राजनीति और विकसित होगी… चूँकि पड़ोसी मनसे का कार्यकर्ता होगा, तो उसके आंगन में गेंद उठाने जाना ख़तरे से खाली नहीं होगा।
आपको भले ये ख़याली पुलाव लगे, लेकिन मुझे राजनीति और राजनेताओं पर पूरा भरोसा है… भविष्य में घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना भी ख़ामख़्वाह का ख़तरा मोल लेना होगा।
इसके आगे समझ नहीं आ रहा कि राजनीति कैसे विकसित होगी… आप भी सोचिए ।

– दो –

राज ठाकरे को भूमिपुत्र कहते हैं । भूमिपुत्र तो यूपी-बिहार वाले भी हुए…………….. परिभाषा के हिसाब से, इर्रेस्पेक्टिव ऑफ़ कोई कहीं भी रहे। मेरे ख़्याल से राज्य-पुत्र सरीखा कुछ होना चाहिए।
फिर राजनीति के विकास के साथ –
शहर/क़स्बा/गांव पुत्र
मोहल्ला-पुत्र
गली-पुत्र
मकान-पुत्र
कमरा-पुत्र
आगे आप सोचिए।

 

वेलकम टू सज्जनपुर नवम्बर 4, 2008

Filed under: चौपाल,रोचक लेख,सम-सामयिक — Satish Chandra Satyarthi @ 1:22 अपराह्न
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मामूली खुशियों की दुनिया में लौटा लेने आई है श्याम बेनेगल की फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर। हमारी ज़िंदगी के बीच से बहुत सारी चीज़े गायब होती जा रही हैं, अपनी इस फिल्म के ज़रिये बेनेगल उन्हें ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। चिट्टी आती नहीं और डाकिया अब परिवार नियोजन से लेकर कूरियर तक के काम में लगा दिया जा रहा है। गली की मोड़ से लाल बक्सा गायब होता जा रहा है। ई-मेल और एस एम एस के ज़माने में शब्द सिर्फ एक बीप साउंड बन कर रह गए हैं। हमें मालूम ही नहीं शब्दों का इस्तमाल और लिखने का अंदाज़।

बेनेगल का किरदार महादेव याद दिलाता है कि शब्द सबके बस की बात नहीं। वेलकम टू सज्जनपुर का किरदार महादेव कहता है एक एक शब्द के पीछे भावना होती है। यूं ही नहीं लिख देता है कोई चिट्ठी। रात भर जाग कर जब वह शब्दों में भाव भरता है तो फ्लैश बैक में प्रेम के बिल्कुल सादे क्षण बन जाते हैं। जहां आडंबर नहीं है, कोई बड़ी बात नहीं है। सिर्फ प्रेम की चाहत है। मामूली चाहत।

बहुत दिनों के बाद एक ऐसी फिल्म आई है जो वासु चटर्जी, ह्रषिकेश मुखर्जी की याद दिलाती है। श्रेयस तलपडे आज के अमोल पालेकर लगते हैं। आम आदमी का हीरो। गमछा और कुर्ता और साइकिल। गांव की पगडंडिया। कभी खुशी कभी गम, तारा रम पम पम, हंसो और हंसाया करो। थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है, ज़िंदगी फिर भी यहां खूबसूरत है। कुछ इसी तरह के साधारण गाने हैं वेलकम टू सज्जनपुर के। नब्बे के दशक में हमारी चाहत बड़ी होती चली गई। आर्थिक उदारीकरण ने हमारे सपनों को उदार बना दिया। हम गाने लगे थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे। हमारा हीरो बड़ी कामयाबी हासिल करने लगा। महानगरों और मल्टीप्लेक्स का होने लगा। मल्टीप्लेक्स के हिसाब से फिल्में बनने लगी। शहरी और मध्यमवर्गीय फिल्में। गांवों को ग़ायब कर दिया गया। हमने मान लिया कि देश साक्षर हो चुका है। गांव शहर हो चुके हैं।

श्याम बेनेगल की यह फिल्म उन गांवों की कहानी है जहां आज भी बहुत कुछ नहीं बदला। डिस्पेंसरी की दीवार पर चिपका सरकारी नारा हम दो हमारे एक। डॉक्टर गायब है और कंपाउंडर इलाज कर रहा है। दिल्ली और मुंबई के कई अपार्टमेंट को आबाद करने वाले मध्यमवर्ग के भीतर आज भी गांव छुपा हैं। वो स्वीकार नहीं करना चाहते। बेनेगल याद दिलाते हैं। हैदराबाद में मध्यप्रदेश के बघेलखंड की पृष्ठभूमि तैयार कर देते हैं और इस तरह यह गांव पूरे भारत का गांव बन जाता है। धीरे धीरे कहानी खुलती है और बताती हैं बड़े सपनों की चाहत में हम छोटी खुशियों को कैसे भूल गए हैं। बॉल पेन को खारिज कर महादेव जब स्याही की कलम से ख़त लिखता है तो किसी पुराने ज़माने में छूट गया इंसान नहीं लगता। दुकानदार कहता है तुम अपना नाम महादेव से भ्रम देव रख लो। महादेव कहता है कि वो इस कलम से मोहब्बत करता है। फिल्म बहुत ही सहज रूप से बता रही है कि हम सब के भीतर महादेव है जो स्याही की कलम को प्यार कर सकता है। मगर हम सब दुनिया की दौड़ में बॉल पेन और कंप्यूटर की-बोर्ड पर शब्दों को टाइप किये जा रहे हैं। भावनाएं खत्म हो रही हैं।

लेकिन यह फिल्म गांव की याद दिलाने के लिए ही नहीं बनी है। कामेडी है। मगर कामेडी के ज़रिये उन मुद्दों पर फिर से बहस करा देती हैं जिन्हें हम बोरियत भरा मान कर उन न्यूज़ चैनलों को देखने लगते हैं जहां दुनिया के खात्मे का एलान हर दिन कोई बेलमुंड ज्योतिष करने लगता है। वेलकम टू सज्जनपुर जन के द्वारा जन के लिए लोकतंत्र की बात करती है। मुखिया के चुनाव में होने वाले प्रपंच को प्रहसन में बदल कर उस कुंठा को हल्का किया जाता है जो हमें यही याद दिलाती है कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता।

हंसते हंसाते बेनेगल बताते हैं कि बहुत कुछ हो सकता है। वो भी आसानी से। सिर्फ हम अपने बोल बदल दें। शब्दों को ठीक जगह पर इस्तमाल करें। तभी तो दबंग रामसिंह कलेक्टर को चिट्ठी भेज कर अपने प्रतिद्वंदि को पाकिस्तानी जासूस बना देता है। लिखने वाला तो महादेव ही है। अगली बार महादेव राम सिंह की चिट्ठी की भाषा बदल देता है और कलेक्टर रामसिंह पर शक करने लगता है। मुन्नी देवी का किरदार कामेडी के बाद गंभीर होता हुआ लोकतंत्र की लड़ाई को जन की लड़ाई में बदल देता है। मुन्नी देवी कहती है मैं तो ऐसी तैसी नहीं जानती, डेमोक्रेसी जानती हूं।

यहीं पर श्याम बेनेगल भाषा का फर्क सीखा रहे हैं। राम सिंह की भाषा और मुन्नी देवी की भाषा का फर्क। जब एक प्रसंग में मुन्नी देवी कलेक्टर को ख़त लिखती है तो उसकी भाषा बता रही है कि बहुत कुछ बचा है। कलेक्टर को हुजूर कहते वक्त मुन्नी देवी सिस्टम के सामंतवादी ढर्रे में आस्था नहीं जताती बल्कि एक जनसेवक से उम्मीद लगा बैठती है कि हुजूर इंसाफ करेंगे।

ख़त लिखने के बहाने श्याम बेनेगल किसी नोस्ताल्जिया को उतारने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वह शब्दों की अहमियत पर ज़ोर दे रहे हैं। उदासी और हताशा के दौर में वो आस्था पैदा कर रहे हैं। अच्छे शब्दों से निकले नारे से जनता मुन्नी देवी के लिए खड़ी हो जाती है। फिल्म में लोकतंत्र जीतता है तो यही बताने के लिए अपनी मामूली समस्याओं के बाद भी लोक जी रहा है। मरता नहीं है।

महादेव का प्रेम, कमला का इंतज़ार और मौसी की बेकरारी। मुंबई गए एक मज़दूर की व्यथा। अपनी बाल विधवा बहू के प्रेमी को पाकर रोते बिलखते सूबेदार। इसके बाद भी सज्जनपुर सबका स्वागत करता है। याद दिलाता है कि हो सके तो कभी लौट आइयेगा अपनी उस पुरानी दुनिया में। जिसे हम छोड़ कभी बड़े सपनों को हासिल करने चले गए हैं। यह एक अद्भुत फिल्म है। हंसाती है, रुलाती है और खुशियों से भर देती है। जीवन यहां किसी राष्ट्रीय समस्या को निपटाने का संघर्ष नहीं है बल्कि छोटी छोटी खुशियों को पाने की ज़िद है।

इस फिल्म की कहानी, किरदार और संवाद किसी कल्पना की उपज नहीं है। आम जीवन से बस उठा लिये गए हैं। साधारण से संवाद हैं और बाते बड़ी बड़ी नहीं हैं। यह फिल्म सरपंची के चुनाव को इतना मार्मिक बना देती है कि मुन्नी देवी के साथ साथ रोने का मन करता है। कमला की खुशी के लिए जब महादेव अपनी ज़मीन गिरवी रख देता है तो याद आता है कि तमाम कामयाबियों के बीच हम किसी के लिए कुछ करने की आदत को किस तरह से भूलते जा रहे हैं। इन्हीं सब बातों को याद दिलाने के लिए श्याम बेनेगल आप सभी का स्वागत कर रहे हैं। वेलकम टू सज्जनपुर।