चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

मां है रेशम के कारखाने में फ़रवरी 3, 2009

Filed under: अली सरदार जाफ़री — Satish Chandra Satyarthi @ 3:30 पूर्वाह्न

रचनाकार: अली सरदार जाफ़री

मां है रेशम के कारखाने में

बाप मसरूफ सूती मिल में है

कोख से मां की जब से निकला है

बच्चा खोली के काले दिल में है


जब यहाँ से निकल के जाएगा

कारखानों के काम आयेगा

अपने मजबूर पेट की खातिर

भूक सर्माये की बढ़ाएगा


हाथ सोने के फूल उगलेंगे

जिस्म चांदी का धन लुटाएगा

खिड़कियाँ होंगी बैंक की रोशन

खून इसका दिए जलायेगा


यह जो नन्हा है भोला भाला है

खूनीं सर्माये का निवाला है

पूछती है यह इसकी खामोशी

कोई मुझको बचाने वाला है!