चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

ज़िद्दी – इस्मत चुग़ताई नवम्बर 14, 2008

Filed under: इस्मत चुग़ताई — Satish Chandra Satyarthi @ 1:56 अपराह्न
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पूरन

पानी जान तोड़ कर बरस रहा था। मालूम होता था, आसमान में सूराख हो गए हैं। सच भी है कब से तना खड़ा है, सड़ गल कर सूराख हो जाना क्या तअज्जुब ? कई रात बरसता रहा और सुबह से बरस रहा था। जोर-जोर से गोया भर-भर समन्दर पानी को कोई पूरी ताकत से जमीन पर पटख रहा हो। दीवारों के घर तो कभी के पानी के तमाँचों से बेदम होकर बैठ गए। छप्पर गीली दाढ़ियों की तरह बाँसों और बल्लियों से झूल पड़े और घर वाले पेड़ों के नीचे दुबक बैठे। मगर पानी जैसे उनसे छेड़ कर रहा था। कोई पेड़ भी पत्थर के सायबान तो न थे, जो पानी पत्तों को चीर फाड़ कर सरों पर न गिरता। वैसे भी जैसे कोई चुल्लू भर-भर कर पेड़ों के भी नीचे उलीच रहा था। परनालों की वावेला से और भी होशो-हवास गुम थे, और फिर रात आ रही थी। घटाटोप सियाही गाढ़ी होती जा रही थी। गटर तेजी से लुढ़क रहे थे।

आशा माँ को आखिरी घूँट पानी के देने की कोशिश कर रही थी। माँ तो जाने कब मर गई थी, पर यह नानी ही माँ-बाप सभी कुछ थी, अब नानी भी चल-चलाव पर तुली थी, और बाप बेकार निखट्टू-सा था। एक दिन स्टेशन के पास मरा हुआ पड़ा मिला। नानी बहुत कुछ उसे देती थी, पर अब वह भी बूढ़ी हो चली थी। बात ये थी कि वह राजा साहब की खिलाई1 रह चुकी थी, और राजा साहब के बाद उनके बेटों को भी इन्हीं सूखे-मारे घुटनों पर वही सड़ी-पुरानी लोरियाँ दी थीं जो वह उनके बाप को दे चुकी थी। पर वह खर्राच थी और फिर कोई जागीर थोड़े ही मिल गई थी। जेवर थोड़ा-थोड़ा करके खाया, बर्तन रखने की जरूरत ही कौन सी थी। उम्र भर राजा साहब के यहाँ रही और


1. बच्चों को खिलाने वाली औरत, धाय

बुढ़ापे में कौन सोने के थाल लगाता है। कई साल से महल के कोने में पड़ी सड़ रही थी। राजा साहब ने अज़राहे-हमदर्दी उसे पेंशन देकर गाँव भेज दिया। कुछ भी था, उसे सुकून था कि वह अपने गाँव में मर रही थी। अपना गाँव कहाँ, गाँव तो राजा का ही था।

‘‘नहीं आया, अभी नहीं आया’’ आशा समझी, बुढ़िया यमदूत को याद कर रही है, मगर वह पूरन के बारे में सोच रही थी। पूरन राजा साहब का सबसे छोटा लड़का था। वह अच्छा-खासा, सात बरस का हो चुका था, तब भी बूढ़ी अम्मा के साथ ही सोता था और हर इतवार को गाँव बड़े भाई के साथ आया करता था। और आज तो इतवार था। बुढ़िया जाने क्यों, उसका इंतज़ार कर रही थी और इसीलिए ठहरी हुई थी वरना इसे कायदे से तो बहुत पहले मर जाना चाहिए था।

‘‘रंजी की माँ कहाँ है। गई ?’’ बुढ़िया फिर जागी।

‘‘हाँ अम्मा ! क्या बुला लाऊं। मींह बहुत पड़ रहा है, नहीं…पर है बड़ी…वह…ऐसे…छोड़ गई।’’

साँस घुटी जा रही थी। ‘‘क्या मींह बहुत पड़ रहा है।’’
बुढ़िया को फ़िक्र हुई कि अब जलाई कैसे जाएगी !

‘‘हाँ, आशा सहमी हुई धोती का किनारा मरोड़ रही थी।

‘‘और जाने रंजी की माँ कहाँ मर गई’’ न जाने रंजी की माँ पर इतनी ममता क्यों आ रही थी। रंजी वैसे तो रंजीत, और सिंह बनियापन छिपाने को लगाया गया था मगर कहलाते ‘अबे रंजी’ थे। और यह वालिदा साहिब खिरया की दुल्हन मोती की बहू और राम भरोसे की बीवी और न मालूम कितनी जगहें बदल चुकी थीं। पर सब कमबख़्त मर-खप गए और उनमें से किसी एक की यादगार रंजी थे। समाज में उनकी हैसियत भी थूर के दरख़्त की सी थी, ज़्यादा कारआमद बनने का उनमें जज़्बा ही नहीं था। कमसिनी में कुछ दिनों हीजड़ों की टोली में जा घुसे और रंजी की माँ को सारा दिन मुहल्ले वालों को गालियाँ तक़सीम करने में गुज़र जाता। न जाने क्यों, वह बज़िद थीं कि हीजड़ों की टोली में नहीं बल्कि नौटंकी में गया है जो छोटा-मोटा थियेटर होता है। कुछ भी हो रंजी की निभी नहीं और वह पिट कर भाग आये और अब गाँव भर में नग्मा सराई के लिए मशहूर थे और एकदम बाग़ियना ख़यालात कुजा1 हीजड़ों में थे और कुजा अब


1. कहाँ, कभी

अव्वल नंबर के गुंडों में शुमार किए जाते थे। कुछ भी था मगर वालिदा साहिबा तो सर उठा कर चलती थीं।

बुढ़िया की बेक़रारी बेकार न गई और वह बोरा ओढ़े आन पहुँची।

‘‘कहाँ चली गईं थीं।’’ बुढ़िया मौत के फ़रिश्ते की तरह गुर्राई।

‘‘ए ज़रा देखने गई थी। रंजी लौटा कि नहीं। लछमी की माँ के गई थी, हरामी न जाने कहाँ मरा है जा के।’’
‘‘हूँ चाहे मैं मर जाती।’’ बुढ़िया अकेली आशा के सामने नहीं मरना चाहती थी कि कहीं उसका दिल न हिल जाए रंजी आशा पर आशिक़ थे। बुढ़िया को पहले तो बहुत बुरा लगा। मगर फिर सर घुमा कर देखा तो कौन से हीरे जड़े थे और यह भी बात थी कि रंजी लुच्चा होगा अपने घर का। आशा से छेड़ करने की उसमें कभी हिम्मत न हुई, आशा बाहर भी कब जाती थी ? बुढ़िया साँप बनी उसकी हिफ़ाज़त कर रही थी। सारा काम रंजी की माँ रिश्वत में कर रही थी, और रंजी जब कभी आता गधे की तरह सर झुका कर बैठ जाता, बुढ़िया राज़ी ही थी, पर अभी नहीं। अभी आशा थी ही कितनी, दो साल हुए तो उसने बाक़ायदा धोती पहननी शुरू की वरना लहंगा पहने ज़रा-सी बच्ची लगती थी, मगर रंजी की माँ की राय में लहंगे साड़ी से कुछ नहीं होता जब वह इतनी थीं तो बच्चे गिर चुके थे और तीसरा वारिद होने को था।
‘‘अपनी-अपनी उठान है।’’ बड़ी बी जब अच्छी थीं तो उनकी हिम्मत से मरऊब होकर कहती थीं, ‘‘आशा मेरी धान-पान है’’ और रंजी की गैंडे जैसी मटक देख कर सहम जाती है।

रंजी बुरा भी न था। हुस्न का मुक़ाबला तो हो नहीं रहा था। ठिगना ज़रूर था और बत्तीसी ज़रा लौटी हुई सी थी बजाय नीचे के दाँतों के ऊपर के दाँत अंदर थे और ठोड़ीं ज़रा आगे को थी, जब हँसता था तो मालूम होता था किसी ने गला उल्टा कर दिया है और होंठ तो दोनों एक जैसे सपाट ही थे। नाक थोड़ी नीची और वसीअ1 थी मगर आँखों में रस था और बाल जैसे आजकल बड़े लोगों में जिसे देखो गंजा होता चला जाता है पर हफ़्तों न धोने के बाइस धूल में अटे हुए।

‘‘पूरन नहीं आया।’’ रंजी के ज़िक्र से उक्ता कर रुख़ पलटा।

‘‘ए लो वह इस पानी में आएंगे, बड़े आदमी किसी के भी ना होते सच


1. चौड़ी

तो यह है।’’

बुढ़िया में दम होता तो वह इतना लड़ती कि रंजी की माँ पस्त हो जाती। अंधी कहीं की कोढ़न ! और जो वह जो हर इतवार आता था तो क्या उसे दिखाई न देता था। आते ही वह अचार की हंडिया टटोलता और उम्दा घी की फ़रमाइश करता। उम्दा घी और लड़ाई के ज़माने में, भला किधर से आए न जाए। ये लड़ाई में घी का क्या ख़र्च है ? तोपों में भर-भर कर मारते होंगे। भला घासलेट क्यों नहीं भरते ? आदमी तो खाए घासलेट और तोपें। और फिर उन्हें नाश्ता कराने में तो हल्कान हो ही जाती।
‘‘मम्मी मेरा तोस’’, निर्मल चिल्लाता सूखा मारा इंसान।

‘‘और मेरा दूध’’, दूध पी-पी कर शीला कचौरी हो गई।

और सब से छोटा भैया हलक के आख़िरी कोने से चिंघाड़ मारता, ‘‘बीच में भाभी कुश्ती लड़ती।’’

‘‘देखो मम्मी ये मेरा पापड़ खा गई’’, निर्मल मिनमिनाता।

‘‘ले अपना पापड़…मंगते’’, शीला पापड़ मुँह पर मार देती।

‘‘देखो मम्मी’’, निर्मल फ़र्याद करता है।

‘‘सूखे टिड्डे।’’

‘‘मोटी भैंस।’’

‘‘तुम सूखे टिड्डे हवा में एक दिन उड़ जाओगे।’’

‘‘और तू मोटी कुप्पा एक दिन ठपाक से फट जाएगी बस।’’

‘‘किनया..अलन।’’ निर्मल और शीला एक दूसरे का खूब मुँह नोचते और निहायत मुहब्बत से काढ़ी हुई फ्राक पर दूध छलक जाता। और निर्मल का तोस उसकी कोहनी में चिपक जाता-तब भाभी चिंघाड़ती।
क्या अंधेर है निर्मल के बच्चे। यह चटापट निर्मल की रानों पर थप्पड़ मारती और शीला की कमर में धमोके लगाती। और जो उसी असना1 में कहीं पूरन आ जाता तो बस भोंचाल का मजा आ जाता। वह आते ही निर्मल के अछू लगवा देता और शीला की तोंद में उँगलियाँ टहलाता और भैया के मोटे-मोटे गाल इतने मसलता के ख़ून झलक आता।

‘‘हट वहाँ से आया बड़ा।’’ भाभी छोटे-छोटे हाथों से पूरन को धकेलती। ‘‘ले के मेरे बच्चे के गाल लाल हो गए।’’ मगर पूरन उसे और भींचता और वह


1. बीच, दरमियान

हँसता। ‘‘देख लो भाभी हंस रहा है।’’

‘‘है न बेहया।’’

‘‘हाँ बिल्कुल अपनी माँ की तरह।’’ पूरन उसे हवा में उछालता और साथ-साथ भाभी का जी उछलता।

‘‘हाय पूरन…मेरा बच्चा…’’वह साँस रोक लेती और जब पूरन उसे लिटा कर उसका मुँह दिखाता तो भैया हँसता ही होता, और अगर आशा कोई चीज़ लेकर आती या कोई काम करती होती तो पूरन कह उठता-
‘‘चलता दुकान भी चलती और फिर जब सब खा पी चुकते तो दूसरा धंधा इख़्तियार किया जाता है।’’

वही बड़ों का ख़्वान्चा लगाया, दिन भर चख-चख कर ही खत्म कर लिया। सिगरेट, बीड़ी की दुकान दोस्त यार फूँक गए। जेब के दाम भी गये।
हाँ जो रंजी किसी करम का हो जाए तो बुरा नहीं।

‘‘देखा जाएगा अम्मा, पहले अच्छी तो हो जाओ।’’ बुढ़िया को अच्छे होने से कोई दिलचस्पी ही न थी और होगी भी तो मौत की सख़्त जल्दी थी। और जब आशा को सिसकता छोड़कर बुढ़िया चल दी तो पूरन की फ़रमाइश धरी रह गयी।

रंजी की माँ इतनी चीख़ी कि आशा भी सहम कर चुप हो गई। ऐसे सोग करने वाले भी कौन थे, पेड़ सूख गया तो पत्तियाँ भी इधर-उधर बिखर गईं। आशा जिंदगी के नए रास्ते पर चलने के लिए पूरन की मोटर में राजा साहब के यहाँ चल दी। रास्ते भर वह कोने में दुबकी आँसू पोंछती रही। पूरन को उसकी तरफ़ देखने की हिम्मत भी न हुई कि कहीं वह और न रोने लगे।

मगर जब आशा महल में पहुँची तो उसका धड़कता हुआ कलेजा ज़रा के ज़रा थम गया। राजा साहब ने मुहब्बत से हाथ फेरा और माता जी ने पास बैठा लिया। मगर भाभी। भाभी ने तो कलेजे से लगा लिया। कम उम्री में ग़म और वह भी बूढ़ी नानी का। ज़रा से दिनों में ख़त्म हो गया और साथ की दूसरी नौकरानियों, कामकाज और भाभी के बच्चों की मुहब्बत में और भी कुछ ज़्यादा न रहा, और आशा एक सीधी पुरसुकून ज़िंदगी गुज़ारने लगी।

भाभी
आशा के न कोई भाई था न बहन। फिर भाभी का तो सवाल ही क्या था। मगर वह जब कभी घर की चंचल और ख़ुशमिज़ाज बहू को देखती उसका दिल मुहब्बत से लरज़ उठता। भाभी का क़द मुन्ना-सा गुड़िया जैसा था, और वैसे ही छोटे-छोटे कमज़ोर हाथ, मगर वह शरीर कितनी थी और क़हक़हे कैसे गूंजते थे जैसे चाँदी के मोती आपस में टकरा रहे हों। वह किसी तरह भी तो तीन बच्चों की माँ नहीं मालूम होती थी। निर्मल से थोड़ी ही बड़ी तो लगती थी और निर्मल भी जब पैदा हो गया था तभी भाभी को सीधे पल्ले की साड़ी भी पहननी न आई थी, और शीला भैंस की भैंस ! फूल जैसी माँ की कितनी फूली कुप्पा बेटी थी इतना खाती थी कि माँ तो तीन दिन में न खा सकती और सबसे छोटा भैया तो बस ग़ज़ब था, हाँ वह ज़रा भाभी का बेटा लगता था क्योंकि उस पर ही वह फ़िदा थी।
यह बेतुके बच्चे और पति महाराज तो बस बृद्ध का मुजस्समा1 थे। जितना बीवी हँसती उतना ही वक़्त वह चुप रहते। किसी बनिए की परछाई पड़ गई थी बस सिवाय गाँव की देखभाल के और कुछ नहीं बस मुस्कुरा देते थे और भाभी ? हर वक़्त तीतरी की तरह उड़ती फिरती। उसके पति महाराज के मिजाज में जमीन और आसमान का फर्क़ था। मगर ऐसे ही सुकून से निभ रही थी जैसे जमीन आसमान की निभ रही है उनकी बला से बीवी छोटी, कम उम्र और ज़िद्दी थी वह सास का कहना बस कुछ ऐसा ही मानती, ज़रा-सी बात पर रूठ जाती, मुँह फुलाकर घंटों रोती, देवर से शिकायत कर देती, यहाँ तक कि ससुर की लाड़ली होने की वजह से सास की शिकायत ससुर से भी हो जाती वह थी भी तो उनसे उम्र में छोटी। हाँ और देवर से तो हर वक़्त उसकी लड़ाई


1. प्रतिमा

होती, शादी हो कर आई तो पहला प्यार देवर से शुरू हुआ और पहली लड़ाई भी उससे हुई और उसने शर्म करना तो किसी से सीखा ही नहीं।

सुबह ही सुबह यह रंगीन भाभी उठ बैठती और बच्चों पर सफ़ाई का हुक्म सादिर कर देती। हाँ तोपें ही हुईं, सुर्ख़ अंगारा जैसे दहानों की तोपें ! ज़रा बोलो आग उगलने लगें ये गोरे ! लो ये घी के ज़िक्र पर गोरे कहाँ से आन टपके।

हाँ तो पूरन हर इतवार आता था। आज बूढ़ी खिलाई को उसका इंतज़ार था, तो मींह बरसने पर तुल पड़ा।

‘‘वाह तुझे क्या मालूम आएगा वह ज़रूर। ज़रा देख तो कहीं…।’’

‘‘ए है कहीं भी नहीं आया।’’

रंजी की माँ उठने के डर से मारे जल्दी से बात टालने लगी।

‘‘कुछ खाया भी ? क्या हाल हो गया है…।’’

उसने चाहा बुढ़िया को मौत की याद दिला कर धमकाये। इंतजार की चंद घड़ियाँ ही गुजरीं थीं कि राजा साहब के मोटर की आवाज़ आई। बुढ़िया में जैसे थोड़ी देर के लिए दम आ गया, वह मोटर की आवाज़ को ख़ूब पहचानती थी। मोटरे आतीं ही कब थीं गाँव में, और ज़रा-सी देर में पूरन सड़े-भुसे पलंग पर मुहब्बत से बुढ़िया के पास बैठ गया।

‘‘अम्मा यहाँ ठीक इलाज नहीं हो रहा है तुम्हें लेने आया हूँ।’’

बुढ़िया तो जाने को तैयार थी, मगर कोई पूरन से भी ज़बरदस्त उसे तेजी से घसीट रहा था।

‘‘अब तो परमात्मा के चरनों में चली बेटा…।’’

‘‘कैसी बातें करती हो, और तुम तो कहती थी कि पूरन की बहू लाऊँगी, उसका बेटा खिलाऊँगी और फिर अब परमात्मा से छुट्टी लेकर आऊँगी, बस आज ही चलो वहाँ तुम्हारा इलाज यूँ हो जाएगा।’’ पूरन ने चुटकी बजा कर कहा।

‘‘अब मेरा इलाज दुनिया के किसी डाक्टर से न होगा, मेरी बात सुन।’’

‘‘नहीं अम्मा तुम…

‘‘सुन मेरे लाल ! आशा मेरी…मेरी बच्ची, मैंने इसे बड़ा खिलाया है, बड़ी प्यारी बच्ची है, उसे राजा साहब के चरणों में पहुँचा देना, उसे दुःख न देना-…मेरी… और कहीं अच्छा लड़का ढूँढ़ कर उसका ब्याह कर देना, अब उसके दुनिया में तुम्हीं लोग हो।
पूरन मौत के आसार भी न पहचानता था। ‘‘तुम ख़ुद ही चलो।’’

‘‘मैं…मैं तो जाऊँगी, मगर..रंजी ढंग का होता।’’

‘‘रंजी दुकान करने की सोच रहा है, बनिए ने वादा किया है। रंजी की वालिदा बोली, दो दिन में चल निकलेगी।’’

हालांकि रंजी कई दुकानें कर चुके थे मगर जितने दिन माल…

‘‘भाभी आशा अपनी नौकर तो नहीं, वह काम क्यों करती है ?’’

‘‘काम क्या हम नहीं करते।’’
‘‘बड़ा काम करती हो, बच्चों को पीटना और इसके सिवा तुम्हारे लिए क्या काम है मगर आशा कोई नौकर है।’’

‘‘काम करने से कोई नौकर नहीं हो जाता और फिर आशा को ब्याह कर जाना है, वहाँ क्या नौकर लगे होंगे। ग़रीब घर की लड़की।’’

‘‘क्यों ग़रीब घर की लड़की से क्या होता है, वह ग़रीब घर क्यों ब्याह कर जाएगी।’’

‘‘ग़रीब घर नहीं ब्याह कर जाएगी तो पूरन सिंह जी, तुम कहीं से उसके लिए शहज़ादा ढूँढ़ लाना।’’ वह ऐसे ज़ोर से कहती कि सभी तो सुन लें और पूरन डर जाता।

‘‘मैं ये थोड़े ही कहता हूँ भाभी, तुम तो चीख़ने लगती हो, न जाने तुम्हारा गला क्यों इतना चौड़ा है।’’ पूरन नीची आवाज़ से कहता और भाभी का बदला भैया ग़रीब के गालों और शीला की तोंद से लेता।

छोटे भैया

बड़ी बुढ़ियाँ कहती हैं तय्या मिर्चें ज़्यादा खा लो तो पेट में जो बच्चा होता है वह बिल्कुल तेज़ मिर्च पैदा होता है। जब पूरन पैदा होने की था तो शायद बड़ी बहूजी ने मिर्चें चाबीं थीं, बस उसे तो किसी कल क़रार ही नहीं था जब तक कॉलेज में रहा ख़ैर। छुट्टियों में तूफ़ान आता था मगर अब तो वह दो साल से घर पर ही किसी मुक़ाबले के इम्तिहान की तैयारी कर रहा था। यह ख़ब्त भले-चंगे को न जाने कहाँ से हो गया था, घर की जायदाद इतनी थी कि बैठ कर सात पीढ़ियाँ मज़े से खातीं मगर कॉलेजों में लड़कों के दिमाग़ गाँव से घबरा जाते हैं दरअसल क़सूर अपने गाँव का है, वहाँ है ही क्या सिवाये मालगुजारी के, जिसमें किसी का दिल लगे। बेवक़ूफ़ गधों से बदतर इंसान, मैले, बदहंगम1 टूटे-टेढ़े झोपड़ें, सड़ांधी पगडंडियाँ गन्दे नाले और उपलों की भयानक क़तारे नीममुर्दा मवेशी और मलगुजे बच्चे, भला क्या दिल लगे ?

हाँ तो पूरन की बोटी-बोटी बेकल थी सारा दिन वह भाभी से उलझता बच्चों को छेड़ता, छोकरियों से मज़ाक़ करता और चुपके-चुपके बड़े भैया पर जुमले कसा करता।
‘‘भाभी ! सुनते हैं कि भाई साहब जब दुनिया में तशरीफ़ ला रहे थे तो काली बिल्ली रास्ता काट गई, बस देख लो।’’

‘‘हू…नहीं तो तुम्हारी तरह…हाथ ही टूटेंगे। मेरी बच्ची का पेट क्या पत्थर का बना है कि सुबह से चुटकियाँ ले रहे हो।

‘‘तुम्हें तो अपने बच्चों की पड़ी रहती है, बच्चों के बाप की नहीं।’’

‘‘भई बच्चे कौन मना करता है हर साल। मगर पति महाराज सुबह से


1. कुरुप

पड़े खाता टटोल रहे हैं…’

‘‘भाभी मैं कहता हूँ कभी तो हँसते ही होंगे भाई साहब। कभी अकेले में तो…।’’

‘‘ऐसी जूती मारूँगी पाजी….।’’

अकेले में हँसने के ख़याल से ही भाभी लाल पड़ जाती।

बड़े भाई ही नहीं क्या वह नौकरों को छोड़ देता था ? चमकी को तो बाक़ायदा चपतें लगाता। शेव करते में साबुन उसके मुँह पर मल देता, उसकी चुटिया पाये से बाँध देता। वह तो ख़ैर जवान छोकरी थी और खिल भी जाती थी छेड़छाड़ से मगर भोला की ताई का और उसका भला क्या जोड़ था वह ग़रीब टूटे-फूटे काट-कबाड़ की तरह कोने में पड़ी रहती थी ढंग से सूझता भी न था, जाड़ों में तो ख़ैर पुराना स्वेटर या कोट पहन लेती होगी। मगर चिलचिलाती गर्मी में तो उसके कुर्ते ही फांस लगते थे। दालान में धूप भी आ जाती थी और कोठरी में घमस बला की, इसलिए वह टूटा हुआ पंखा लिए दालान में ही ऊँघा करती। पूरन उसके पास जा बैठता।
‘‘ऐ भोला की ताई ये जवानी क्यों खाक़ में मिला रही हो।’’

बुढ़िया सिर्फ घिन्ना कर देखती और मुँह फेर लेती कि शायद बेरुख़ी से बात टल जाए।

‘‘मैं कितना कहता हूँ तुमसे कि…भई अभी उम्र ही क्या है।’’

‘‘अरे हट इधर-मैं क्यों…।’’

‘‘यही तो तुम्हारी निठुराई मुझे पसन्द नहीं, मैं कहता हूँ।’’

‘‘क्या कहता है ?’’ भोला की ताई की आवाज़ बुड्ढे मुरदुवे जैसी थी।

‘‘अरे ! यही कहता हूँ..कि…कि तुम कुर्ता क्यों नहीं पहनती हो’’, वह कोई क़ाबिले-एतिराज़ बात न पाकर ही कहता।

बुढ़िया चटाई से डटी रहती पर जवान छोकरियाँ यह सुनकर शर्म से गड़ जातीं। भाभी भी बात टालने को दूसरी तरफ़ मुतवज्जा हो जाती जैसे उसने सुना ही नहीं।
‘‘अरे क्या पहनूँ’’, अब बुढ़िया फ़लसफ़ा छाँटती।

‘‘क्यों नहीं पहनो कहो तो मैं ला दूँ दो-चार पोलके ?’’

‘‘चल पोलकों के सगे।’’ बुढ़िया की बदमिज़ाजी कम न होती। कितना कहता हूँ, ‘‘भोला की ताई की मेंहदी लगाया करो, सुरमा काजल’’। छोकरियाँ हँसती और भोला की ताई मोटी-मोटी गालियाँ बड़बड़ाती।

‘‘यह तो चुड़ैलें तुमसे जलती हैं भोला की ताई’’ और वह आहिस्ता-आहिस्ता उसके पास खिसकता।

‘‘अरे क्यों मुझ पर चढ़ा चला आए है, उधर हट बेटा।’’

‘‘मुझे बेटा कहती है ?’’ पूरन संजीदगी से बुरा मानता।
‘‘हाँ भैया ज़रा गर्मी है उधर बैठ।’’

‘‘अरे भैया कहती हो मुझे ?’’ पूरन और भी बिगड़ता।

‘‘बेटा न कहूँ, भैया न कहूँ तो क्या ख़सम कहूँ तुझे ?’’ और बुढ़िया मोटी मोठ मुग़ल्ला ज़ात सुनाती।

‘‘मैं तो कहता हूँ फेरे करा लो मुझसे। क्या होगी तुम्हारी उम्र ?’’

‘‘अरे क्यों शामत आई है तेरी, ‘‘हरामी’ ’’, बुढ़िया भर्रायी हुई आवाज़ से गुर्रायी।

‘‘भोला की ताई जब गालियाँ देती हो तो बस जी चाहता है कि मुँह चूम लूँ वाह…वाह।’’

और फिर गालियों को ग़ैर मुआस्सिर पाकर भोला की ताई मारने पर तुल जाती। लौंडियाँ, बांदियाँ लपेट में आ जातीं और वह उन सबको नंगी-नंगी बातें कहतीं। यहाँ तक कि पूरन भी झेंप कर भाग खड़ा होता।
बुढ़िया बड़ी बहूजी के पास फ़रियाद लेकर जाती तो छोटी बहू उल्टा छेड़ने लगती।

‘‘अरे भोला की ताई कर लो न ऐसा क्या बुरा है ये लड़का।’’

मगर भोला की ताई कुछ ऐसी बातें कहती कि छोटी बहू सुनने से पहले ही दूसरे कमरे में चली जाती।

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शतरंज के खिलाड़ी – प्रेमचंद नवम्बर 4, 2008

Filed under: प्रेमचंद — Satish Chandra Satyarthi @ 2:21 अपराह्न

वाजिदअली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मजलिस सजाता था , तो कोई अफीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद को प्राधान्य था। शासन विभाग में, साहित्य क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था में, कला कौशल में, उद्योग-धन्धों में, आहार-विहार में, सर्वत्र विलासिता व्याप्त हो रही था। कर्मचारी विषय-वासना में, कविगण प्रेम और विरह के वर्णन में, कारीगर कलाबत्तू और चिकन बनाने में , व्यावसायी सुर में, इत्र मिस्सी और उबटन का रोजगार करने में लिप्त था। सभी की आँखो में विलासिता का मद छाया हुआ था। संसार में क्या हो रहा है, इसकी किसी को खबर न थी। बटेर लड़ रहे है। तीतरों की लड़ाई के लिए पाली बदी जा रही है। कही चौरस बिछी हुई है। पौ बारह का शोर मचा हुआ है। कही शतरंज का घोर संग्राम छिड़ा हुआ है। राजा से लेकर रंक तक इसी धुन में मस्त थे। यहाँ तक कि फकीरों को पैसे मिलते तो वे रोटियाँ न लेकर अफीम खाते या मदक पीते। शतरंज ताश, गंजीफा खेलने में बुद्धि तीव्र होती है, विचार शक्ति का विकास होता है, पेचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है, ये दलील जोर के साथ पेश की जाती थी। ( इस सम्प्रदाय के लोगो से दुनिया अब भी खाली नही है।) इसलिए अगर मिर्जा सज्जाद अली और मीर रौशन अली अपना अधिकांश समय बुद्धि-तीव्र करने में व्यतीत करते थे, तो किसी विचारशील पुरुष को क्या आपत्ति हो सकती थी? दोनों के पास मौरूसी जागीरें थी, जीविका की कोई चिन्ता न थी। घर बैठे चखोतियाँ करते। आखिर और करते ही क्या? प्रातःकाल दोनों मित्र नाश्ता करके बिसात बिछा कर बैठ जाते, मुहरे सज जाते और लड़ाई के दाँवपेच होने लगते थे। फिर खबर न होती थी कि कब दोपहर हुई कब तीसरा पहल, कब शाम। घर के भीतर से बार-बार बुलावा आता था – ‘खाना तैयार है।’ यहाँ से जबाव मिलता – ‘चलो आते है, दस्तर ख्वान बिछाओ।’ यहाँ तक कि बावरची विवश होकर कमरे में ही खाना रख जाता था, और दोनो मित्र दोनो काम साथ-साथ करते थे। मिर्जा सज्जाद अली के घर में कोई बड़ा-बूढा न था, इसलिए उन्हीं के दीवानखाने में बाजियाँ होती थी; मगर यह बात न थी कि मिर्जा के घर के और लोग उसके व्यवहार से खुश हो। घरवाली का तो कहना ही क्या, मुहल्ले वाले, घर के नौकर-चाकर तक नित्य द्वेषपूर्ण टिप्पणियाँ किया करते थे ‘बड़ा मनहूस खेल है। घर को तबाह कर देता है। खुदा न करे किसी को इसकी चाट पड़े। आदमी दीन दुनिया किसी के काम का नही रहता, न घर का न घाट का। बुरा रोग है यहाँ तक कि मिर्जा की बेगम इससे इतना द्वेष था कि अवसर खोज-खोज कर पति को लताड़ती थी। पर उन्हें इसका अवसर मुश्किल से मिलता था । वह सोचती रहती थी, तब तक उधर बाजी बिछ जाती था। और रात को जब सो जाती थी, तब कही मिर्जा जी भीतर आते थे। हाँ नौकरों पर वह अपना गुस्सा उतारती रहती थी – ‘क्या पान माँगे है? कह दो आकर ले जायँ। खाने की भी फुर्सत नही हैं? ले जाकर खाना सिर पटक दो, खायँ चाहे कुत्ते को खिलावें।’ पर रूबरु वह कुछ न कह सकती थी। उनको अपने पति से उतना मलाल न था जितना मीर साहब से। उन्होंने उसका नाम मीर बिगाड़ू रख छोड़ा था। शायद मिर्जा जी अपनी सफाई देने के लिए सारा इल्जाम मीर साहब ही के सिर थोप देते थे।

एक दिन बेगम साहिबा के सिर में दर्द होने लगा। उन्होंने लौड़ी से कहा – ‘जाकर मिर्जा साहब को बुला लो। किसी हकीम के यहाँ से दवा लाये। दौड़, जल्दी कर।’

लौड़ी गयी तो मिर्जा ने कहा – ‘चल, अभी आते है।’

बेगम का मिजाज गरम था। इतनी ताब कहाँ कि उनके सिर में दर्द हो, और पति शतरंज खेलता रहे। चेहरा सुर्ख हो गया। लौड़ी से कहा – ‘जाकर कह, अभी चलिए नही तो वह आप ही हकीम के यहाँ चली जायँगी।’

मिर्जा जी बड़ी दिलचस्प बाजी खेल रहे थे, दो ही किश्तो में मीर साहब की मात हुई जाती थी, झँललाकर बोले – ‘क्या ऐसा दम लबो पर है? जरा सब्र नही होता?’

मीर – अरे, तो जाकर सुन ही आइए न। औरते नाजुक-मिजाज होती है।

मिर्जा – जी हाँ, चला क्यों न जाऊँ। दो किश्तों में आपको मात होती है।

मीर – जनाब, इस भरोसे में न रहिएगा। वह चाल सोची है कि आपके मुहरे धरे रहें, औऱ मात हो जाए। पर जाइए, सुन आइए, क्यों ख्वामह-ख्वाह उनका दिल दुखाइएगा?

मिर्जा – इसी बात पर मात ही कर के जाऊँगा।

मीर – मै खेलूँगा ही नही। आप जाकर सुन आइए।

मिर्जा – अरे यार जाना, ही पड़ेगा हकीम के यहाँ। सिर-दर्द खाक नही है, मुझे परेशान करने का बहाना है।

मीर – कुछ भी हो, उनकी खातिर तो करनी ही पड़ेगी।

मिर्जा – अच्छा, एक चाल और चल लूँ।

मीर – हरगिज नही, जब तक आप सुन न आवेंगे, मै मुहरे में हाथ न लगाऊँगा।

मिर्जा साहब मजबूर होकर अन्दर गये तो बेगम साहबा ने त्योरियाँ बदल कर लेकिन कराहते हुए कहा – तुम्हें निगोड़ी शतरंज इतनी प्यारी है! चाहे कोई मर ही जाय, पर उठने का नाम नही लेते! नौज कोई तुम जैसा आदमी हो!

मिर्जा – क्या कहूँ, मीर साहब मानते ही न थे। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाकर आया हूँ।

बेगम – क्या जैसे वह खुद निखट्टू ही, वैसे ह सबको समझते है? उनके भी बाल बच्चे है, या सबका सफाया कर डाला है!

मिर्जा – बड़ा लती आदमी है। जब आ जाता है तब मजबूर होकर खेलना पड़ता है।

बेगम – दुत्कार क्यो नही देते?

मिर्जा – बराबर का आदमी है, उम्र में, दर्जें मे, मुझसे दो अंगुल ऊँचे। मुलाहिजा करना ही पड़ता है।

बेगम – तो मै ही दुत्कार देती हूँ। नाराज हो जायेंगे, हो जाएँ। कौन किसी की रोटियोँ चला देता है। रानी रूठेगी, अपना सुहाग लेंगी। हिरिया, बाहर से शतरंज उठा ला। मीर साहब से कहना, मियाँ अब न खेलेगे, आप तशरीफ ले जाइए।

मिर्जा – हाँ-हाँ, कहीं ऐसा गजब भी न कर ना! जलील करना चाहती हो क्या? ठहर हिरिया, कहाँ जाती है!

बेगम – जाने क्यों नही देते? मेरे ही खून पिए, जो उसे रोके। अच्छा, उसे रोका, मुझे रोको तो जानूँ।

यह कहकर बेगम साहिबा इल्लायी हुई दीवानखाने की तरफ चली। मिर्जा बेचारे का रंग उड़ गया। बीवी की मिन्नते करने लगे – खुदा के लिए, तुम्हे हजरत हुसेन की कसम। मेरी ही मैयत देखे, जो उधर जाए।’

लेकिन बेगम ने एक न मानी। दीवानखाने के द्वार तक चली गयी। पर एकाएक पर पुरुष के सामने जाते हुए पाँव बँध गए। भीतर झाँका, संयोग से कमरा खाली था; मीर साहब ने दो मुहरे इधर-उधर कर दिये थे और अपनी सफाई बताने के लिए बाहर टहल रहे थे। फिर क्या था, बेगम ने अन्दर पहुँच कर बाजी उलट दी; मुहरे कुछ तख्त के नीचे फेंक दिये, कुछ बाहर और किवाड़ अन्दर से बन्द करके कुंड़ी लगा दी। मीर साहब दरवाजे पर तो थे ही, मुहरे बाहर फेंके जाते देखे, चूड़ियों की झनक भी कान में पड़ी। फिर दरवाजा बन्द हुआ, तो समझ गये बेगम बिगड़ गयी। घर की राह ली।

मिर्जा ने कहा – तुमने गजब किया।

बेगम – अब, मीर साहब इधर आये तो खड़े-खड़े निकलवा दूँगी। इतनी लौ खुदा से लगाते तो क्या गरीब हो जाते? आप तो शतरंज खेले और मैं यहाँ चूल्हे चक्की की फिक्र में सिर खपाऊँ। बोलो, जाते हो हकीम के यहाँ कि अब भी ताम्मुल है।

मिर्जा घर से निकले तो हकीम के घर जाने के बदले मीर साहब के घर पहुँचे, और सारा वृतान्त कहा। मीर साहब बोले – मैने तो जब मुहरे बाहर आते देखे तभी ताजड गया। फौरन भागा। बड़ी गुस्सेवर मालूम होती हैं। मगर आपने उन्हे यो सिर पर चढ़ा रखा है यह मुनासिब नही। उन्हें इससे क्या मतलब की आप बाहर क्या करते है। घर का इन्तजाम करना उनका काम है, दूसरी बातो से उन्हें क्या सरोकार?

मिर्जा – खैर, यह तो बताइए, अब कहाँ जमाव होगा?

मीर – इसका क्या गम? इतना बड़ा घर पड़ा हुआ है? बस यही जमे।

मिर्जा – लेकिन बेगम साहब को कैसे मनाऊँगा ? जब घर पर बैठा रहता था तब तो वह इतना बिगड़ती थी, यहाँ बैठक होग तो शायद जिन्दा न छोड़ेगी।

मीर – अजी बकने भी दीजिए, दो-चार रोज में आप ही ठीक हो जायँगी। हाँ, आप इतना कीजिए कि आज से जरा तन जाइए!

मीर साहब की बेग किसी अज्ञात कारण से उनका घर से दूर रहना ही उपयुक्त समझती थी। इसलिए वह उनके शतरंज प्रेम की कभी आलोचना न करती बल्कि कभी-कभी मीर साहब को देर हो जाती तो याद दिला देती थी। इन कारणों से मीर साहब को भ्रम हो गया था कि मेरी स्त्री अत्यन्त विनयशील और गम्भीर है। लेकिन जब दीवानखाने में बिसात बिछने लगी, और मीर साहब दिन भर घर में रहने लगे तो उन्हें बड़ा कष्ट होने लगा। उनकी स्वाधीनता में बाधा पड़ गयी। दिन भर दरवाजे पर झाँकने को तरस जाती।

उधर नौकरो में काना-फूसी होने लगी। अब तक दिन भर पड़े-पड़े मक्खियाँ मारा करते थे। घर में चाहे कोई आवे, चाहे कोई जाय, इनसे कुछ मतलब न था। आठों पहर की धौस हो गयी। कभी पान लाने का हुक्म होता, कभी मिठाई लाने का। और हु्क्का तो किसी प्रेमी के हृदय की भाँति नित्य जलता ही रहता था। वे बेगम साहब से जा-जाकर कहते – हुजूर, मियाँ की शतरंज तो हमारे जी का जंजाल हो गई! दिन भर दौड़ते-दौड़ते पैरौ में छाले पड़ गये। यह भी कोई खेल है कि सुबह को बैठे तो शाम ही कर दी। घड़ी आध घड़ी दिल-बहलाव के लिए खेल लेना बहुत है। खैर, हमें तो कोई शिकायत नही, हुजूर के गुलाम हो, जो हुक्म होगा बजा ही लावेंगे, मगर यह खेल मनहूस है । इसका खेलने वाला कभी पनपता नही, घर पर कोई न कोई आफत जरूर आता है। यहाँ तक कि एक के पीछे मुहल्ले के मुहल्ले तबाह हो जाते देखे गये है। सारे मुहल्ले मे यही चर्चा होती रहती है । हुजूर का नमक खाते है। अपने आका की बुराई सुन-सुनकर रंज होता है। मगर क्या करे? इसपर बेगम साहिबा कहती – मै तो खुद इसको पसन्द नही करती, पर वह किसी की सुनते ही नही, क्या किया जाय?

मुहल्ले में भी दो-चार पुराने जमाने के लोग थे। वे आपस में भाँति-भाँति के अमंगल की कल्पनाएँ करने लगे – अब खैरियत नही है। जब हमारे रईसों का यह हाल है, तो मुल्क का खुदा ही हाफिज। यह बादशाहत शतरंज के हाथों तबाह होगी। आसार बुरे है।

राज्य में हाहाकार मचा हुआ था। प्रजा दिन-दहाड़े लूटी जाती थी। कोई फरियाद सुनने वाला न था। देहातों की सारी दौलत लखनऊ में खिची चली आती थी, और वह वेश्याओ में, भाँड़ो में और विलासता के अन्य अंगों की पूर्ति मे उड़ जाती थी। अँगरेजी कम्पनी का ऋण दिन-दिन बढ़ता जाता थी। कमली दिन-दिन भीग कर भारी होती जाती थी। देख में सुव्यवस्था न होने के कारण वार्षिक कर भी न वसूल होता था। रेसिडेन्ट बार-बार चेतावनी देता था, पर यहाँ लोग विलासिता के नशे में चूर थे। किसी के कान में जूँ न रेंगती थी।

खैर, मीर साहब के दीवानखाने में शतरंज होते महीने गुजर गये। नये-नये नक्शे हल किये जाते, नये-नये बनाये जाते, नित नयी ब्यूह रचना होती; कभी-कभी खेलते-खेलते भिड़ हो जाती। तू-तू मै-मै तक की नौबत आ जाती। पर शीध्र ही दोनो में मेल हो जाता। कभी-कभी ऐसा भी होता कि बाजी उठा दी जाती. मिर्जा जी रूठ कर अपने घर में जा बैठते। पर रातभर की निद्रा के साथ सारा मनोमालिन्य शान्त हो जाता था। प्रातःकाल दोनो मित्र दीवानखाने में आ पहुँचते थे।

एक दिन दोनो मित्र बैठे शतरंज की दलदल में गोते लगा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफसर मीर साहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा। मीर साहब के होश उड़ गये। यह क्या बला सिर पर आयी? यह तलबी किस लिये हुई ? अब खैरियत नही नजर आती! घर के दरवाजे बन्द कर लिये। नौकर से बोले – कह दो घर में नही है।

सवार – घर में नही, तो कहाँ है?

नौकर – यह मैं नही जानता। क्या काम है?

सवार – काम तुझे क्या बतालाऊँ? हुजूर से तलबी है – शायद फौज के लिए कुछ सिपाही माँगे गये है। जागीरदार है कि दिल्लगी? मोरचे पर जाना पड़ेगा तो आटे-दाल का भाव मालूम हो जायेगा।

नौकर – अच्छा तो जाइए, कह दिया जायेगा।

सवार – कहने की बात नही। कल मै खुद आऊँगा। साथ ले जाने का हुक्म हुआ है।

सवार चला गया। मीर साहब की आत्मा काँप उठी। मिर्जा जी से बोले – कहिए, जनाब, अब क्या होगा?

मिर्जा – बड़ी मुसीबत बै। कहीं मेरी भी तलबी न हो।

मीर – कम्बख्त कल आने को कह गया है।

मिर्जा – आफत है, और क्या! कहीं मोरचे पर जाना पड़ा तो बेमौत मरे।

मीर – बस, यही एक तदबीर है कि घर पर मिलें ही नही। कल से गोमती पर कहीं वीराने नें नक्शा जमें। वहाँ किसे खबर होगी? हजरत आकर लौट जायेंगे।

मिर्जा – वल्लाह, आपको खूब सूझी! इसके सिवा औऱ कोई तदबीर नही है।

इधर मीर साहब की बेगम उस सवार से कह रही थी – तुमने खूब ध्रता बतायी। उसने जवाब दिया – ऐसे गावदियों को तो चुटकियों पर नचाता हूँ। इनकी सारी अकल और हिम्मत तो शतरंजे चर ली। अब भूलकर भी घर न रहेंगे।

दूसरे दिन से दोनों मित्र मुँह अँधेरे घर से निकल खड़े होते। बगल में एक छोटी-सी दरी दबाये, डिब्बे में गिलोरियाँ भरे, गोमती पार कर एक पुरानी वीरान मस्जिद में चले जाते, जिसे शायद नवाब आसफउद्दौला ने बनवाया था। रास्ते में तम्बाकू, चिलम औऱ मदरिया ले लेते और मस्जिद में पहुँच, दरी बिछा, हुक्का भर शतरंज खेलने बैठ जाते थे। फिर उन्हें दीन-दुनिया की फिक्र न रहती थी। ‘किस्त’, ‘शह’ आदि दो-एक शब्दों के सिवा मुँह से और कोई वाक्य नही निकलता था। कोई योगी भी समाधि में इतना एकाग्र न होता। दो पहर को जब भूख मालूम होती तो दोनो मित्र किसी नानबाई की दूकान पर जाकर खाना खा आते और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम क्षेत्र में डट जाते। कभी कभी तो उन्हें भोजन का भी ख्याल न रहता था।

इधर देश की राजनीतिक दशा भयंकर हलचल मची हुई थी। लोग बाल-बच्चो को ले-ले कर देहातो में भाग रहे थे। पर हमारे दोनो खिलाड़ियो को इसकी जरा भी फिक्र न थी। वे घर से आते तो गलियो में होकर। डर था कि कही किसी बादशाही मुलाजिम की निगाह न पड़ जाय, नही तो बेगार में पकड़े जायँ हजारो रूपये सालाना की जागीर मुफ्त में ही हजम करना चाहते थे।

एक दिन दोनो मित्र मस्जिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे। मिर्जा की बाजी कुछ कमजोर थी। मीर साहब को किश्त पर किश्त दे रहे थे। इतने में कम्पनी के सैनिक आते हुए दिखाई दिये। यह गोरो की फौज थी जो लखनऊ पर अधिकार जमाने के लिए आ रही थी।

मीर साहब – अंगरेजी फौज आ रही है खुदा खैर करे!

मिर्जा – आने दीजिए, किश्त बचाइए। लो यह किश्त!

मीर – तोरखाना भी है। कोई पाँच हजार आदमी होगे, कैसे जवान है। लाल बंदरो से मुँह है। सूरत देखकर खौफ मालूम होता है।

मिर्जा – जनाब, हीले न कीजिए। ये चकमें किसी और को दीजिएगा – यह किश्त!

मीर – आप भी अजीब आदमी है। यहाँ तो शहर पर आफत आयी हुई है, और आपको किश्त की सूझी है। कुछ खबर है कि शहर घिर गया तो घर कैसे चलेंगे?

मिर्जा – जब घर चलने का वक्त आयेगा तो देखी जाएगी – यह किश्त, बस अब की शह में मात है।

फौज निकल गयी। दस बजे का समय था। फिर बाजी बिछ गयी। मिर्जा बोले – आज खाने की कैसी ठहरेगा?

मीर – अजी, आज तो रोजा है। क्या आपको भूख ज्यादा मालूम होती है?

मिर्जा – जी नही। शहर में जाने क्या हो रहा है?

मीर – शहर में कुछ न हो रहा होगा। लोग खाना खा-खाकर आराम से सो रहे होगे। हुजूर नवाब साहब भी ऐशगाह में होगे ।

दोनो सज्जन फिर जो खेलने बैठे तो तीन बज गए। अब की मिर्जा की बाजी कमजोर थी। चार का गजर बज रहा था कि फौज की वापसी की आहट मिली। नवाब वाजिदअली शाह पकड़ लिए गये थे, और सेना उन्हें किसी अज्ञात स्थान को लिए जा रही थी। शहर में न कोई हलचल थी, न मार-काट। एक बूँद भी खून नही गिरा था। आज तक किसी स्वाधीन देश के राजा की पराजय इतनी शान्ति से इस तरह खून बहे बिना न हुई होगी। यह अहिंसा न थी, जिस पर देवगण प्रसन्न होते है। यह कायरपन था जिस पर बड़े से बड़े कायर आँसू बहाते है। अवध के विशाल देश का नवाब बन्दी बना चला जाता था और लखनऊ ऐश की नींद में मस्त था। यह राजनीतिक अधःपतन की चरम सीमा थी।

मिर्जा ने कहा – हुजूर नवाब को जालिमों नें कैद कर लिया है।

मीर – होगा, यह लीजिए शह!

मिर्जा – जनाब, जरा ठहरिए। इस वक्त इधर तबीयत ठीक नही लगती। बेचारे नवाब साहब इस वक्त खून के आँसू रो रहे होंगे।

मीर – रोया ही चाहे, यह ऐश वहाँ कहाँ नसीब होगा? यह किश्त।

मिर्जा – किसी के दिन बराबर नही जाते। कितनी दर्दनाक हालत है।

मीर – हाँ, सो तो है ही, यह लो फिर किश्त! बस अब की किश्त में मात है। बच नहीं सकते।

मिर्जा – खुदा की कसम, आप बड़े बे दर्द है। इतना बड़ा हादसा देखकर भी आपको दुःख नही होता। हाय, गरीब वाजिदअली शाह!

मीर – पहले अपने बादशाह को तो बचाइए, फिर नवाब का मातम कीजिएगा। यह किश्त और मात! लाना हाथ!

बादशाह को लिए हुए सेना सामने से निकल गयी। उनके जाते ही मिर्जा ने फिर बाजी बिछा ली। हार की चोट बुरी होती है। मीर ने कहा – आइए नवाब के मातम में मरसिया कह डाले। लेकिन मिर्जा की राजभक्ति अपनी हार के साथ लुप्त हो चुकी थी । वह हार का बदला चुकाने के लिए अधीर हो गए थे।

शाम हो गयी। खंडहर मेमं चमगादड़ो ने चीखना शुरू किया। अबाबीले आ-आकर अपने घोंसलों में चिपटी। पर दोनों खिलाड़ी डटे हुए थे। मानो दोनों खून के प्यासे सूरमा आपस में लड़ रहे हो। मिर्जा जी तीन बाजियाँ लगातार हार चुके थे; इस चौथी बाजी का भी रंग अच्छा न था। वह बार-बार जीतने का दृढ़निश्चय कर सँभलकर खेलते थे लेकिन एक न एक चाल ऐसी बेढ़ब आ पड़ती थी जिससे बाजी खराब हो जाती थी। हर बार हार के साथ प्रतिकार की भावना और उग्र होती जाती थी। उधर मीर साहब मारे उमंग के गजले गाते थे, चुटकियाँ लेते थे, मानो कोई गुप्त धन पा गये हो। मिर्जा सुन-सुनकर झुझलाते और हार की झेंप मिटाने कि लिए उनकी दाद देते थे। ज्यों-ज्यों बाजी कमजोर पड़ती थी, धैर्य हाथ से निकलता जाता था। यहाँ तक कि वह बात-बात पर झुँझलाने लगे। ‘जनाब’ आप चाल न बदला कीजिए।यह क्या कि चाल चले औऱ फिर उसे बदल दिया जाय। जो कुछ चलना है एक बार चल दीजिए। यह आप मुहरे पर ही क्यों हाथ रखे रहते है। मुहरे छोड़ दीजिए। जब तक आपको चाल न सूझे, मुहरा छुइए ही नही। आप एक-एक चाल आध-आध घंटे में चलते है। इसकी सनद नही। जिसे एक चाल चलनें में पाँच मिनट से ज्यादा लगे उसकी मात समझी जाय। फिर आपने चाल बदली? चुपके से मुहर वही रख दीजिए।

मीर साहब की फरजी पिटता था। बोले – मैने चाल चली ही कब थी?

मिर्जा – आप चाल चल चुके है। मुहरा वही रख दीजिए – उसी घर में।

मीर – उसमें क्यो रखूँ? हाथ से मुहरा छोड़ा कब था?

मिर्जा – मुहरा आप कयामत तक न छोड़े, तो क्या चाल ही न होगी? फरजी पिटते देखा तो धाँधली करने लगे।

मीर – धाँधली आप करते है। हार-जीत तकदीर से होती है। धाँधली करने से कोई नही जीतता।

मिर्जा – तो इस बाजी में आपकी मात हो गयी।

मीर – मुझे क्यो मात होने लगी?

मिर्जा – तो आप मुहरा उसी घर में रख दीजिए, जहाँ पहले रखा था।

मीर – वहाँ क्यो रखूँ? नही रखता।

मिर्जा – क्यों न रखिएगा? आपको रखना होगा।

तकरार बढ़ने लगी। दोनों अपनी-अपनी टेक पर अड़े थे। न यह दबता था, न वह। अप्रासंगिक बाते होने लगी। मिर्जा बोले – किसी ने खानदान में शतरंज खेली होती तब तो इसके कायदे जानते। वो तो हमेशा घास छीला किए, आप शतरंज क्या खेलिएगा? रियासत और ही चीज है। जागीर मिल जाने ही से कोई रईस नही हो जाता।

मीर – क्या! घास आपके अब्बाजन छीलते होगे। यहाँ तो पीढ़ियों से शतरंज खेलते चले आते है?

मिर्जा – अजी जाइए भी, गाजीउद्दीन हैदर के यहाँ बावर्ची का काम करते-करते उम्र गुजर गयी। आज रईस बनने चले है। रईस बनना कुछ दिल्लगी नही।

मीर – क्यो अपने बुजुर्गो के मुँह पर कालिख लगाते हो – वे बावर्ची का काम करते होंगे। यहाँ तो बादशाह के दस्तर ख्वान पर खाना खाते चले आये है।

मिर्जा – अरे चल चरकटे, बहुत बढ़कर बातें न कर!

मीर – जबान सँभालिए, वर्ना बुरा होगा। मै ऐसी बातें सुनने का आदी नही। यहाँ तो किसी ने आँखे दिखायी कि उसकी आँखें निकाली । है हौसला?

मिर्जा – आप मेरा हौसला देखना चाहते है, तो फिर आइए, आज दो-दो हाथ हो जायँ, इधर या उधर।

मीर – तो यहाँ तुमसे दबने वाला कौन है?

दोनो दोस्तों ने कमर से तलवारे निकाल ली। नवाबी जमाना था। सभी तलवार, पेशकब्ज कटार वगैरह बाँधते थे। दोनो विलासी थे, पर कायर न थे। उनमें राजनीतिक भावों का अधःपतन हो गया था। बादशाह के लिए क्यों मरे? पर व्यक्तिगत वीरता का अभाव न था। दोनो ने पैतरे बदले, तलवारे चमकी, छपाछप की आवाजे आयी। दोनो जख्मी होकर गिरे, दोनो न वहीं तड़प-तड़प कर जाने दी। अपने बादशाह के लिए उनकी आँखों से एक बूँद आँसू न निकला, उन्होने शतरंज के वजीर की रक्षा नें प्राण दे दिए।

अँधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनो बादशाह अपने-अपने सिहांसन पर बैठे मानो इन वीरो की मृत्यु पर रो रहे थे। चारो तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। खँडहर की टूटी हुई, मेहराबे गिरी हुई दीवारे और धूल-धूसरितें मीनारे इन लाशों को देखती और सिर धुनती थी।

 

पूस की रात – प्रेमचन्द

Filed under: प्रेमचंद — Satish Chandra Satyarthi @ 2:20 अपराह्न

हल्कू ने आकर स्त्री से कहा– सहना आया है । लाओं, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, किसी तरह गला तो छूटे ।

मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली-तीन ही रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहॉँ से आवेगा? माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? उससे कह दो, फसल पर दे देंगें। अभी नहीं ।

हल्कू एक क्षण अनिशिचत दशा में खड़ा रहा । पूस सिर पर आ गया, कम्बल के बिना हार मे रात को वह किसी तरह सो नहीं सकता। मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियॉं देगा। बला से जाड़ों मे मरेंगे, बला तो सिर से टल जाएगी । यह सोचता हुआ वह अपना भारी-भरकम डील लिए हुए (जो उसके नाम को झूठ सिध्द करता था ) स्त्री के समीप आ गया और खुशामद करके बोला-दे दे, गला तो छूटे ।कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूंगा ।

मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और ऑंखें तरेरती हुई बोली-कर चुके दूसरा उपाय! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे ? कोई खैरात दे देगा कम्मल ? न जान कितनी बाकी है, जों किसी तरह चुकने ही नहीं आती । मैं कहती हूं, तुम क्यों नहीं खेती छोड़ देते ? मर-मर काम करों, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुटटी हुई । बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ हैं । पेट के लिए मजूरी करों । ऐसी खेती से बाज आयें । मैं रुपयें न दूँगी, न दूँगी । हल्कू उदास होकर बोला-तो क्या गाली खाऊँ ? मुन्नी ने तड़पकर कहा-गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है ? मगर यह कहने के साथ् ही उसकी तनी हुई भौहें ढ़ीली पड़ गई । हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भॉँति उसे घूर रहा था । उसने जाकर आले पर से रुपये निकाले और लाकर हल्कू के हाथ पर रख दिए। फिर बोली-तुम छोड़ दो अबकी से खेती । मजूरी में सुख से एक रोटी तो खाने को मिलेगी । किसी की धौंस तो न रहेगी । अच्छी खेती है ! मजूरी करके लाओं, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस । हल्कू न रुपयें लिये और इस तरह बाहर चला, मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हों । उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-काटकर तीन रुपये कम्बल के लिए जमा किए थें । वह आज निकले जा रहे थे । एक-एक पग के साथ उसका मस्तक पानी दीनता के भार से दबा जा रहा था ।

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पूस की अँधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे। हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बॉस के खटाले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा कॉप रहा था । खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था । दो मे से एक को भी नींद नहीं आ रही थी । हल्कू ने घुटनियों कों गरदन में चिपकाते हुए कहा-क्यों जबरा, जाड़ा लगता है ? कहता तो था, घर में पुआल पर लेट रह, तो यहॉँ क्या लेने आये थें ? अब खाओं ठंड, मै क्या करूँ ? जानते थें, मै। यहॉँ हलुआ-पूरी खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये । अब रोओ नानी के नाम को । जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ कहा-कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे । यीह रांड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही हैं । उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ । किसी तरह रात तो कटे ! आठ चिलम तो पी चुका । यह खेती का मजा हैं ! और एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा आए तो गरमी से घबड़ाकर भागे। मोटे-मोटे गददे, लिहाफ, कम्बल । मजाल है, जाड़े का गुजर हो जाए । जकदीर की खूबी ! मजूरी हम करें, मजा दूसरे लूटें ! हल्कू उठा, गड्ढ़े मे से जरा-सी आग निकालकर चिलम भरी । जबरा भी उठ बैठा । हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा-पिएगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता हैं, हॉँ जरा, मन बदल जाता है। जबरा ने उनके मुँह की ओर प्रेम से छलकता हुई ऑंखों से देखा । हल्कू-आज और जाड़ा खा ले । कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा । उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा । जबरा ने अपने पंजो उसकी घुटनियों पर रख दिए और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया । हल्कू को उसकी गर्म सॉस लगी । चिलम पीकर हल्कू फिर लेटा और निश्चय करके लेटा कि चाहे कुछ हो अबकी सो जाऊँगा, पर एक ही क्षण में उसके हृदय में कम्पन होने लगा । कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भॉँति उसकी छाती को दबाए हुए था । जब किसी तर न रहा गया, उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाए हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था । जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न ,थी । अपने किसी अभिन्न मित्र या भाई को भी वह इतनी ही तत्परता से गले लगाता । वह अपनी दीनता से आहत न था, जिसने आज उसे इस दशा कोपहुंचा दिया । नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था । सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पाई । इस विशेष आत्मीयता ने उसमे एक नई स्फूर्ति पैदा कर रही थी, जो हवा के ठंडें झोकों को तुच्छ समझती थी । वह झपटकर उठा और छपरी से बाहर आकर भूँकने लगा । हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया । हार मे चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा। एक क्षण के लिए आ भी जाता, तो तुरंत ही फिर दौड़ता । कर्त्तव्य उसके हृदय में अरमान की भाँति ही उछल रहा था ।

3

एक घंटा और गुजर गया। रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरु किया। हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई, ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया हैं, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहीं है। उसने झुककर आकाश की ओर देखा, अभी कितनी रात बाकी है ! सप्तर्षि अभी आकाश में आधे भी नहीं चढ़े । ऊपर आ जाऍंगे तब कहीं सबेरा होगा । अभी पहर से ऊपर रात हैं । हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था । पतझड़ शुरु हो गई थी । बाग में पत्तियो को ढेर लगा हुआ था । हल्कू ने सोच, चलकर पत्तियों बटोरूँ और उन्हें जलाकर खूब तापूँ । रात को कोई मुझें पत्तियों बटारते देख तो समझे, कोई भूत है । कौन जाने, कोई जानवर ही छिपा बैठा हो, मगर अब तो बैठे नहीं रह जाता । उसने पास के अरहर के खेत मे जाकर कई पौधें उखाड़ लिए और उनका एक झाड़ू बनाकर हाथ में सुलगता हुआ उपला लिये बगीचे की तरफ चला । जबरा ने उसे आते देखा, पास आया और दुम हिलाने लगा । हल्कू ने कहा-अब तो नहीं रहा जाता जबरू । चलो बगीचे में पत्तियों बटोरकर तापें । टॉटे हो जाऍंगे, तो फिर आकर सोऍंगें । अभी तो बहुत रात है। जबरा ने कूँ-कूँ करें सहमति प्रकट की और आगे बगीचे की ओर चला। बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था । वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं । एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया । हल्कू ने कहा-कैसी अच्छी महक आई जबरू ! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही हैं ? जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गई थी । उसे चिंचोड़ रहा था । हल्कू ने आग जमीन पर रख दी और पत्तियों बठारने लगा । जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया था । हाथ ठिठुरे जाते थें । नगें पांव गले जाते थें । और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था । इसी अलाव में वह ठंड को जलाकर भस्म कर देगा । थोड़ी देर में अलावा जल उठा । उसकी लौ ऊपर वाले वृक्ष की पत्तियों को छू-छूकर भागने लगी । उस अस्थिर प्रकाश में बगीचे के विशाल वृक्ष ऐसे मालूम होते थें, मानो उस अथाह अंधकार को अपने सिरों पर सँभाले हुए हों । अन्धकार के उस अनंत सागर मे यह प्रकाश एक नौका के समान हिलता, मचलता हुआ जान पड़ता था । हल्कू अलाव के सामने बैठा आग ताप रहा था । एक क्षण में उसने दोहर उताकर बगल में दबा ली, दोनों पॉवं फैला दिए, मानों ठंड को ललकार रहा हो, तेरे जी में आए सो कर । ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था । उसने जबरा से कहा-क्यों जब्बर, अब ठंड नहीं लग रही है ? जब्बर ने कूँ-कूँ करके मानो कहा-अब क्या ठंड लगती ही रहेगी ? ‘पहले से यह उपाय न सूझा, नहीं इतनी ठंड क्यों खातें ।’ जब्बर ने पूँछ हिलायी । अच्छा आओ, इस अलाव को कूदकर पार करें । देखें, कौन निकल जाता है। अगर जल गए बचा, तो मैं दवा न करूँगा । जब्बर ने उस अग्नि-राशि की ओर कातर नेत्रों से देखा ! मुन्नी से कल न कह देना, नहीं लड़ाई करेगी । यह कहता हुआ वह उछला और उस अलाव के ऊपर से साफ निकल गया । पैरों में जरा लपट लगी, पर वह कोई बात न थी । जबरा आग के गिर्द घूमकर उसके पास आ खड़ा हुआ । हल्कू ने कहा-चलो-चलों इसकी सही नहीं ! ऊपर से कूदकर आओ । वह फिर कूदा और अलाव के इस पार आ गया ।

4

पत्तियॉँ जल चुकी थीं । बगीचे में फिर अँधेरा छा गया था । राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर ऑंखे बन्द कर लेती थी ! हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा । उसके बदन में गर्मी आ गई थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाए लेता था । जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । हल्कू को ऐसा मालूम हुआ कि जानवरों का एक झुण्ड खेत में आया है। शायद नीलगायों का झुण्ड था । उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी । फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं है। उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी। उसने दिल में कहा-नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता। नोच ही डाले। मुझे भ्रम हो रहा है। कहॉँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता। मुझे भी कैसा धोखा हुआ! उसने जोर से आवाज लगायी-जबरा, जबरा। जबरा भूँकता रहा। उसके पास न आया। फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली। अब वह अपने को धोखा न दे सका। उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था। कैसा दँदाया हुआ बैठा था। इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा। वह अपनी जगह से न हिला। उसने जोर से आवाज लगायी-हिलो! हिलो! हिलो! जबरा फिर भूँक उठा । जानवर खेत चर रहे थें । फसल तैयार हैं । कैसी अच्छी खेती थी, पर ये दुष्ट जानवर उसका सर्वनाश किए डालते है। हल्कू पक्का इरादा करके उठा और दो-तीन कदम चला, पर एकाएक हवा कस ऐसा ठंडा, चुभने वाला, बिच्छू के डंक का-सा झोंका लगा कि वह फिर बुझते हुए अलाव के पास आ बैठा और राख को कुरेदकर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा । जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नील गाये खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था । अकर्मण्यता ने रस्सियों की भॉति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था। उसी राख के पस गर्म जमीन परद वही चादर ओढ़ कर सो गया । सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैली गई थी और मुन्नी की रही थी-क्या आज सोते ही रहोगें ? तुम यहॉ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया । हल्कू न उठकर कहा-क्या तू खेत से होकर आ रही है ? मुन्नी बोली-हॉँ, सारे खेत कासत्यनाश हो गया । भला, ऐसा भी कोई सोता है। तुम्हारे यहॉ मँड़ैया डालने से क्या हुआ ? हल्कू ने बहाना किया-मैं मरते-मरते बचा, तुझे अपने खेत की पड़ी हैं। पेट में ऐसा दरद हुआ, ऐसा दरद हुआ कि मै नहीं जानता हूँ ! दोनों फिर खेत के डॉँड पर आयें । देखा सारा खेत रौदां पड़ा हुआ है और जबरा मॅड़ैया के नीचे चित लेटा है, मानो प्राण ही न हों । दोनों खेत की दशा देख रहे थें । मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था । मुन्नी ने चिंतित होकर कहा-अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी। हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा-रात को ठंड में यहॉ सोना तो न पड़ेगा।

 

पंच परमेश्वर – प्रेमचंद

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जुम्मन शेख अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गये थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गये थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खाना-पाना का व्यवहार था, न धर्म का नाता; केवल विचार मिलते थे। मित्रता का मूलमंत्र भी यही है।

इस मित्रता का जन्म उसी समय हुआ, जब दोनों मित्र बालक ही थे, और जुम्मन के पूज्य पिता, जुमराती, उन्हें शिक्षा प्रदान करते थे। अलगू ने गुरू जी की बहुत सेवा की थी, खूब प्याले धोये। उनका हुक्का एक क्षण के लिए भी विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येक चिलम अलगू को आध घंटे तक किताबों से अलग कर देती थी। अलगू के पिता पुराने विचारों के मनुष्य थे। उन्हें शिक्षा की अपेक्षा गुरु की सेवा-शुश्रूषा पर अधिक विश्वास था। वह कहते थे कि विद्या पढ़ने ने नहीं आती; जो कुछ होता है, गुरु के आशीर्वाद से। बस, गुरु जी की कृपा-दृष्टि चाहिए। अतएव यदि अलगू पर जुमराती शेख के आशीर्वाद अथवा सत्संग का कुछ फल न हुआ, तो यह मानकर संतोष कर लेना कि विद्योपार्जन में मैंने यथाशक्ति कोई बात उठा नहीं रखी, विद्या उसके भाग्य ही में न थी, तो कैसे आती?

मगर जुमराती शेख स्वयं आशीर्वाद के कायल न थे। उन्हें अपने सोटे पर अधिक भरोसा था, और उसी सोटे के प्रताप से आज-पास के गॉँवों में जुम्मन की पूजा होती थी। उनके लिखे हुए रेहननामे या बैनामे पर कचहरी का मुहर्रिर भी कदम न उठा सकता था। हल्के का डाकिया, कांस्टेबिल और तहसील का चपरासी–सब उनकी कृपा की आकांक्षा रखते थे। अतएव अलगू का मान उनके धन के कारण था, तो जुम्मन शेख अपनी अनमोल विद्या से ही सबके आदरपात्र बने थे।

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जुम्मन शेख की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थी। उसके पास कुछ थोड़ी-सी मिलकियत थी; परन्तु उसके निकट संबंधियों में कोई न था। जुम्मन ने लम्बे-चौड़े वादे करके वह मिलकियत अपने नाम लिखवा ली थी। जब तक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार किया गया; उन्हें खूब स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये। हलवे-पुलाव की वर्षा- सी की गयी; पर रजिस्ट्री की मोहर ने इन खातिरदारियों पर भी मानों मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज, तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मन शेख भी निठुर हो गये। अब बेचारी खालाजान को प्राय: नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थी।

बुढ़िया न जाने कब तक जियेगी। दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया, मानों मोल ले लिया है ! बघारी दाल के बिना रोटियॉँ नहीं उतरतीं ! जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से तो अब तक गॉँव मोल ले लेते। कुछ दिन खालाजान ने सुना और सहा; पर जब न सहा गया तब जुम्मन से शिकायत की। तुम्मन ने स्थानीय कर्मचारी—गृहस्वांमी—के प्रबंध देना उचित न समझा। कुछ दिन तक दिन तक और यों ही रो-धोकर काम चलता रहा। अन्त में एक दिन खाला ने जुम्मन से कहा—बेटा ! तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह न होगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना पका-खा लूँगी।

जुम्मन ने धृष्टता के साथ उत्तर दिया-— रुपये क्या यहाँ फलते हैं?

खाला ने नम्रता से कहा—मुझे कुछ रूखा-सूखा चाहिए भी कि नहीं?

जुम्मन ने गम्भीर स्वर से जवाब़ दिया—तो कोई यह थोड़े ही समझा था कि तु मौत से लड़कर आयी हो?

खाला बिगड़ गयीं, उन्होंने पंचायत करने की धमकी दी। जुम्मन हँसे, जिस तरह कोई शिकारी हिरन को जाली की तरफ जाते देख कर मन ही मन हँसता है। वह बोले—हॉँ, जरूर पंचायत करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात-दिन की खटखट पसंद नहीं।

पंचायत में किसकी जीत होगी, इस विषय में जुम्मन को कुछ भी संदेह न थ। आस-पास के गॉँवों में ऐसा कौन था, उसके अनुग्रहों का ऋणी न हो; ऐसा कौन था, जो उसको शत्रु बनाने का साहस कर सके? किसमें इतना बल था, जो उसका सामना कर सके? आसमान के फरिश्ते तो पंचायत करने आवेंगे ही नहीं।

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इसके बाद कई दिन तक बूढ़ी खाला हाथ में एक लकड़ी लिये आस-पास के गॉँवों में दौड़ती रहीं। कमर झुक कर कमान हो गयी थी। एक-एक पग चलना दूभर था; मगर बात आ पड़ी थी। उसका निर्णय करना जरूरी था। बिरला ही कोई भला आदमी होगा, जिसके समाने बुढ़िया ने दु:ख के ऑंसू न बहाये हों। किसी ने तो यों ही ऊपरी मन से हूँ-हॉँ करके टाल दिया, और किसी ने इस अन्याय पर जमाने को गालियाँ दीं। कहा—कब्र में पॉँव जटके हुए हैं, आज मरे, कल दूसरा दिन, पर हवस नहीं मानती। अब तुम्हें क्या चाहिए? रोटी खाओ और अल्लाह का नाम लो। तुम्हें अब खेती-बारी से क्या काम है? कुछ ऐसे सज्जन भी थे, जिन्हें हास्य-रस के रसास्वादन का अच्छा अवसर मिला। झुकी हुई कमर, पोपला मुँह, सन के-से बाल इतनी सामग्री एकत्र हों, तब हँसी क्यों न आवे? ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे, जिन्होंने इस अबला के दुखड़े को गौर से सुना हो और उसको सांत्वना दी हो। चारों ओर से घूम-घाम कर बेचारी अलगू चौधरी के पास आयी। लाठी पटक दी और दम लेकर बोली—बेटा, तुम भी दम भर के लिये मेरी पंचायत में चले आना।

अलगू-— मुझे बुला कर क्या करोगी? कई गॉँव के आदमी तो आवेंगे ही।

खाला—अपनी विपद तो सबके आगे रो आयी। अब आनरे न आने का अख्तियार उनको है।

अलगू—यों आने को आ जाऊँगा; मगर पंचायत में मुँह न खोलूँगा।

खाला—क्यों बेटा?

अलगू—अब इसका कया जवाब दूँ? अपनी खुशी। जुम्मन मेरा पुराना मित्र है। उससे बिगाड़ नहीं कर सकता।

खाला—बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?

हमारे सोये हुए धर्म-ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाय, तो उसे खबर नहीं होता, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता। अलगू इस सवाल का काई उत्तर न दे सका, पर उसके हृदय में ये शब्द गूँज रहे थे-

क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?

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संध्या समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही फर्श बिछा रखा था। उन्होंने पान, इलायची, हुक्के-तम्बाकू आदि का प्रबन्ध भी किया था। हॉँ, वह स्वय अलबत्ता अलगू चौधरी के साथ जरा दूर पर बैठेजब पंचायत में कोई आ जाता था, तब दवे हुए सलाम से उसका स्वागत करते थे। जब सूर्य अस्त हो गया और चिड़ियों की कलरवयुक्त पंचायत पेड़ों पर बैठी, तब यहॉँ भी पंचायत शुरू हुई। फर्श की एक-एक अंगुल जमीन भर गयी; पर अधिकांश दर्शक ही थे। निमंत्रित महाशयों में से केवल वे ही लोग पधारे थे, जिन्हें जुम्मन से अपनी कुछ कसर निकालनी थी। एक कोने में आग सुलग रही थी। नाई ताबड़तोड़ चिलम भर रहा था। यह निर्णय करना असम्भव था कि सुलगते हुए उपलों से अधिक धुऑं निकलता था या चिलम के दमों से। लड़के इधर-उधर दौड़ रहे थे। कोई आपस में गाली-गलौज करते और कोई रोते थे। चारों तरफ कोलाहल मच रहा था। गॉँव के कुत्ते इस जमाव को भोज समझकर झुंड के झुंड जमा हो गए थे।

पंच लोग बैठ गये, तो बूढ़ी खाला ने उनसे विनती की–

‘पंचों, आज तीन साल हुए, मैंने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे जुम्मन के नाम लिख दी थी। इसे आप लोग जानते ही होंगे। जुम्मन ने मुझे ता-हयात रोटी-कपड़ा देना कबूल किया। साल-भर तो मैंने इसके साथ रो-धोकर काटा। पर अब रात-दिन का रोना नहीं सहा जाता। मुझे न पेट की रोटी मिलती है न तन का कपड़ा। बेकस बेवा हूँ। कचहरी दरबार नहीं कर सकती। तुम्हारे सिवा और किसको अपना दु:ख सुनाऊँ? तुम लोग जो राह निकाल दो, उसी राह पर चलूँ। अगर मुझमें कोई ऐब देखो, तो मेरे मुँह पर थप्पड़ मारी। जुम्मन में बुराई देखो, तो उसे समझाओं, क्यों एक बेकस की आह लेता है ! मैं पंचों का हुक्म सिर-माथे पर चढ़ाऊँगी।’

रामधन मिश्र, जिनके कई असामियों को जुम्मन ने अपने गांव में बसा लिया था, बोले—जुम्मन मियां किसे पंच बदते हो? अभी से इसका निपटारा कर लो। फिर जो कुछ पंच कहेंगे, वही मानना पड़ेगा।

जुम्मन को इस समय सदस्यों में विशेषकर वे ही लोग दीख पड़े, जिनसे किसी न किसी कारण उनका वैमनस्य था। जुम्मन बोले—पंचों का हुक्म अल्लाह का हुक्म है। खालाजान जिसे चाहें, उसे बदें। मुझे कोई उज्र नहीं।

खाला ने चिल्लाकर कहा–अरे अल्लाह के बन्दे ! पंचों का नाम क्यों नहीं बता देता? कुछ मुझे भी तो मालूम हो।

जुम्मन ने क्रोध से कहा–इस वक्त मेरा मुँह न खुलवाओ। तुम्हारी बन पड़ी है, जिसे चाहो, पंच बदो।

खालाजान जुम्मन के आक्षेप को समझ गयीं, वह बोली–बेटा, खुदा से डरो। पंच न किसी के दोस्त होते हैं, ने किसी के दुश्मन। कैसी बात कहते हो! और तुम्हारा किसी पर विश्वास न हो, तो जाने दो; अलगू चौधरी को तो मानते हो, लो, मैं उन्हीं को सरपंच बदती हूँ।

जुम्मन शेख आनंद से फूल उठे, परन्तु भावों को छिपा कर बोले–अलगू ही सही, मेरे लिए जैसे रामधन वैसे अलगू।

अलगू इस झमेले में फँसना नहीं चाहते थे। वे कन्नी काटने लगे। बोले–खाला, तुम जानती हो कि मेरी जुम्मन से गाढ़ी दोस्ती है।

खाला ने गम्भीर स्वर में कहा–‘बेटा, दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंच के दिल में खुदा बसता है। पंचों के मुँह से जो बात निकलती है, वह खुदा की तरफ से निकलती है।’

अलगू चौधरी सरपंच हुएं रामधन मिश्र और जुम्मन के दूसरे विरोधियों ने बुढ़िया को मन में बहुत कोसा।

अलगू चौधरी बोले–शेख जुम्मन ! हम और तुम पुराने दोस्त हैं ! जब काम पड़ा, तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पड़ा, तुम्हारी सेवा करते रहे हैं; मगर इस समय तुम और बुढ़ी खाला, दोनों हमारी निगाह में बराबर हो। तुमको पंचों से जो कुछ अर्ज करनी हो, करो।

जुम्मन को पूरा विश्वास था कि अब बाजी मेरी है। अलग यह सब दिखावे की बातें कर रहा है। अतएव शांत-चित्त हो कर बोले–पंचों, तीन साल हुए खालाजान ने अपनी जायदाद मेरे नाम हिब्बा कर दी थी। मैंने उन्हें ता-हयात खाना-कपड़ा देना कबूल किया था। खुदा गवाह है, आज तक मैंने खालाजान को कोई तकलीफ नहीं दी। मैं उन्हें अपनी मॉँ के समान समझता हूँ। उनकी खिदमत करना मेरा फर्ज है; मगर औरतों में जरा अनबन रहती है, उसमें मेरा क्या बस है? खालाजान मुझसे माहवार खर्च अलग मॉँगती है। जायदाद जितनी है; वह पंचों से छिपी नहीं। उससे इतना मुनाफा नहीं होता है कि माहवार खर्च दे सकूँ। इसके अलावा हिब्बानामे में माहवार खर्च का कोई जिक्र नही। नहीं तो मैं भूलकर भी इस झमेले मे न पड़ता। बस, मुझे यही कहना है। आइंदा पंचों का अख्तियार है, जो फैसला चाहें, करे।

अलगू चौधरी को हमेशा कचहरी से काम पड़ता था। अतएव वह पूरा कानूनी आदमी था। उसने जुम्मन से जिरह शुरू की। एक-एक प्रश्न जुम्मन के हृदय पर हथौड़ी की चोट की तरह पड़ता था। रामधन मिश्र इस प्रश्नों पर मुग्ध हुए जाते थे। जुम्मन चकित थे कि अलगू को क्या हो गया। अभी यह अलगू मेरे साथ बैठी हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था ! इतनी ही देर में ऐसी कायापलट हो गयी कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है। न मालूम कब की कसर यह निकाल रहा है? क्या इतने दिनों की दोस्ती कुछ भी काम न आवेगी?

जुम्मन शेख तो इसी संकल्प-विकल्प में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू ने फैसला सुनाया–

जुम्मन शेख ! पंचों ने इस मामले पर विचार किया। उन्हें यह नीति संगत मालूम होता है कि खालाजान को माहवार खर्च दिया जाय। हमारा विचार है कि खाला की जायदाद से इतना मुनाफा अवश्य होता है कि माहवार खर्च दिया जा सके। बस, यही हमारा फैसला है। अगर जुम्मन को खर्च देना मंजूर न हो, तो हिब्वानामा रद्द समझा जाय। यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्नाटे में आ गये। जो अपना मित्र हो, वह शत्रु का व्यवहार करे और गले पर छुरी फेरे, इसे समय के हेर-फेर के सिवा और क्या कहें? जिस पर पूरा भरोसा था, उसने समय पड़ने पर धोखा दिया। ऐसे ही अवसरों पर झूठे-सच्चे मित्रों की परीक्षा की जाती है। यही कलियुग की दोस्ती है। अगर लोग ऐसे कपटी-धोखेबाज न होते, तो देश में आपत्तियों का प्रकोप क्यों होता? यह हैजा-प्लेग आदि व्याधियॉँ दुष्कर्मों के ही दंड हैं। मगर रामधन मिश्र और अन्य पंच अलगू चौधरी की इस नीति-परायणता को प्रशंसा जी खोलकर कर रहे थे। वे कहते थे–इसका नाम पंचायत है ! दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। दोस्ती, दोस्ती की जगह है, किन्तु धर्म का पालन करना मुख्य है। ऐसे ही सत्यवादियों के बल पर पृथ्वी ठहरी है, नहीं तो वह कब की रसातल को चली जाती।

इस फैसले ने अलगू और जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ-साथ बातें करते नहीं दिखायी देते। इतना पुराना मित्रता-रूपी वृक्ष

सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच वह बालू की ही जमीन पर खड़ा था।

उनमें अब शिष्टाचार का अधिक व्यवहार होने लगा। एक दूसरे की आवभगत ज्यादा करने लगा। वे मिलते-जुलते थे, मगर उसी तरह जैसे तलवार से ढाल मिलती है।

जुम्मन के चित्त में मित्र की कुटिलता आठों पहर खटका करती थी। उसे हर घड़ी यही चिंता रहती थी कि किसी तरह बदला लेने का अवसर मिले।

5

अच्छे कामों की सिद्धि में बड़ी दरे लगती है; पर बुरे कामों की सिद्धि में यह बात नहीं होती; जुम्मन को भी बदला लेने का अवसर जल्द ही मिल गया। पिछले साल अलगू चौधरी बटेसर से बैलों की एक बहुत अच्छी गोई मोल लाये थे। बैल पछाहीं जाति के सुंदर, बडे-बड़े सीगोंवाले थे। महीनों तक आस-पास के गॉँव के लोग दर्शन करते रहे। दैवयोग से जुम्मन की पंचायत के एक महीने के बाद इस जोड़ी का एक बैल मर गया। जुम्मन ने दोस्तों से कहा–यह दग़ाबाज़ी की सजा है। इन्सान सब्र भले ही कर जाय, पर खुदा नेक-बद सब देखता है। अलगू को संदेह हुआ कि जुम्मन ने बैल को विष दिला दिया है। चौधराइन ने भी जुम्मन पर ही इस दुर्घटना का दोषारोपण किया उसने कहा–जुम्मन ने कुछ कर-करा दिया है। चौधराइन और करीमन में इस विषय पर एक दिन खुब ही वाद-विवाद हुआ दोनों देवियों ने शब्द-बाहुल्य की नदी बहा दी। व्यंगय, वक्तोक्ति अन्योक्ति और उपमा आदि अलंकारों में बातें हुईं। जुम्मन ने किसी तरह शांति स्थापित की। उन्होंने अपनी पत्नी को डॉँट-डपट कर समझा दिया। वह उसे उस रणभूमि से हटा भी ले गये। उधर अलगू चौधरी ने समझाने-बुझाने का काम अपने तर्क-पूर्ण सोंटे से लिया।

अब अकेला बैल किस काम का? उसका जोड़ बहुत ढूँढ़ा गया, पर न मिला। निदान यह सलाह ठहरी कि इसे बेच डालना चाहिए। गॉँव में एक समझू साहु थे, वह इक्का-गाड़ी हॉँकते थे। गॉँव के गुड़-घी लाद कर मंडी ले जाते, मंडी से तेल, नमक भर लाते, और गॉँव में बेचते। इस बैल पर उनका मन लहराया। उन्होंने सोचा, यह बैल हाथ लगे तो दिन-भर में बेखटके तीन खेप हों। आज-कल तो एक ही खेप में लाले पड़े रहते हैं। बैल देखा, गाड़ी में दोड़ाया, बाल-भौरी की पहचान करायी, मोल-तोल किया और उसे ला कर द्वार पर बॉँध ही दिया। एक महीने में दाम चुकाने का वादा ठहरा। चौधरी को भी गरज थी ही, घाटे की परवाह न की।

समझू साहु ने नया बैल पाया, तो लगे उसे रगेदने। वह दिन में तीन-तीन, चार-चार खेपें करने लगे। न चारे की फिक्र थी, न पानी की, बस खेपों से काम था। मंडी ले गये, वहॉँ कुछ सूखा भूसा सामने डाल दिया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेने पाया था कि फिर जोत दिया। अलगू चौधरी के घर था तो चैन की बंशी बचती थी। बैलराम छठे-छमाहे कभी बहली में जोते जाते थे। खूब उछलते-कूदते और कोसों तक दौड़ते चले जाते थे। वहॉँ बैलराम का रातिब था, साफ पानी, दली हुई अरहर की दाल और भूसे के साथ खली, और यही नहीं, कभी-कभी घी का स्वाद भी चखने को मिल जाता था। शाम-सबेरे एक आदमी खरहरे करता, पोंछता और सहलाता था। कहॉँ वह सुख-चैन, कहॉँ यह आठों पहर कही खपत। महीने-भर ही में वह पिस-सा गया। इक्के का यह जुआ देखते ही उसका लहू सूख जाता था। एक-एक पग चलना दूभर था। हडिडयॉँ निकल आयी थी; पर था वह पानीदार, मार की बरदाश्त न थी। एक दिन चौथी खेप में साहु जी ने दूना बोझ लादा। दिन-भरका थका जानवर, पैर न उठते थे। पर साहू जी कोड़े फटकारने लगे। बस, फिर क्या था, बैल कलेजा तोड़ का चला। कुछ दूर दौड़ा और चाहा कि जरा दम ले लूँ; पर साहू जी को जल्द पहुँचने की फिक्र थी; अतएव उन्होंने कई कोड़े बड़ी निर्दयता से फटकारे। बैल ने एक बार फिर जोर लगाया; पर अबकी बार शक्ति ने जवाब दे दिया। वह धरती पर गिर पड़ा, और ऐसा गिरा कि फिर न उठा। साहु जी ने बहुत पीटा, टॉँग पकड़कर खीचा, नथनों में लकड़ी ठूँस दी; पर कहीं मृतक भी उठ सकता है? तब साहू जी को कुछ शक हुआ। उन्होंने बैल को गौर से देखा, खोलकर अलग किया; और सोचने लगे कि गाड़ी कैसे घर पहुँचे। बहुत चीखे-चिल्लाये; पर देहात का रास्ता बच्चों की ऑंख की तरह सॉझ होते ही बंद हो जाता है। कोई नजर न आया। आस-पास कोई गॉँव भी न था। मारे क्रोध के उन्होंने मरे हुए बैल पर और दुर्रे लगाये और कोसने लगे–अभागे। तुझे मरना ही था, तो घर पहुँचकर मरता ! ससुरा बीच रास्ते ही में मर रहा। अब गड़ी कौन खीचे? इस तरह साहू जी खूब जले-भुने। कई बोरे गुड़ और कई पीपे घी उन्होंने बेचे थे, दो-ढाई सौ रुपये कमर में बंधे थे। इसके सिवा गाड़ी पर कई बोरे नमक थे; अतएव छोड़ कर जा भी न सकते थे। लाचार वेचारे गाड़ी पर ही लेटे गये। वहीं रतजगा करने की ठान ली। चिलम पी, गाया। फिर हुक्का पिया। इस तरह साह जी आधी रात तक नींद को बहलाते रहें। अपनी जान में तो वह जागते ही रहे; पर पौ फटते ही जो नींद टूटी और कमर पर हाथ रखा, तो थैली गायब ! घबरा कर इधर-उधर देखा तो कई कनस्तर तेल भी नदारत ! अफसोस में बेचारे ने सिर पीट लिया और पछाड़ खाने लगा। प्रात: काल रोते-बिलखते घर पहँचे। सहुआइन ने जब यह बूरी सुनावनी सुनी, तब पहले तो रोयी, फिर अलगू चौधरी को गालियॉँ देने लगी–निगोड़े ने ऐसा कुलच्छनी बैल दिया कि जन्म-भर की कमाई लुट गयी। इस घटना को हुए कई महीने बीत गए। अलगू जब अपने बैल के दाम मॉँगते तब साहु और सहुआइन, दोनों ही झल्लाये हुए कुत्ते की तरह चढ़ बैठते और अंड-बंड बकने लगते—वाह ! यहॉँ तो सारे जन्म की कमाई लुट गई, सत्यानाश हो गया, इन्हें दामों की पड़ी है। मुर्दा बैल दिया था, उस पर दाम मॉँगने चले हैं ! ऑंखों में धूल झोंक दी, सत्यानाशी बैल गले बॉँध दिया, हमें निरा पोंगा ही समझ लिया है ! हम भी बनिये के बच्चे है, ऐसे बुद्धू कहीं और होंगे। पहले जाकर किसी गड़हे में मुँह धो आओ, तब दाम लेना। न जी मानता हो, तो हमारा बैल खोल ले जाओ। महीना भर के बदले दो महीना जोत लो। और क्या लोगे?

चौधरी के अशुभचिंतकों की कमी न थी। ऐसे अवसरें पर वे भी एकत्र हो जाते और साहु जी के बराने की पुष्टि करते। परन्तु डेढ़ सौ रुपये से इस तरह हाथ धो लेना आसान न था। एक बार वह भी गरम पड़े। साहु जी बिगड़ कर लाठी ढूँढ़ने घर चले गए। अब सहुआइन ने मैदान लिया। प्रश्नोत्तर होते-होते हाथापाई की नौबत आ पहुँची। सहुआइन ने घर में घुस कर किवाड़ बन्द कर लिए। शोरगुल सुनकर गॉँव के भलेमानस घर से निकाला। वह परामर्श देने लगे कि इस तरह से काम न चलेगा। पंचायत कर लो। कुछ तय हो जाय, उसे स्वीकार कर लो। साहु जी राजी हो गए। अलगू ने भी हामी भर ली।

6

पंचायत की तैयारियॉँ होने लगीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने दल बनाने शुरू किए। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष के नीचे पंचायत बैठी। वही संध्या का समय था। खेतों में कौए पंचायत कर रहे थे। विवादग्रस्त विषय था यह कि मटर की फलियों पर उनका कोई स्वत्व है या नही, और जब तक यह प्रश्न हल न हो जाय, तब तक वे रखवाले की पुकार पर अपनी अप्रसन्नता प्रकट करना आवश्यकत समझते थे। पेड़ की डालियों पर बैठी शुक-मंडली में वह प्रश्न छिड़ा हुआ था कि मनुष्यों को उन्हें वेसुरौवत कहने का क्या अधिकार है, जब उन्हें स्वयं अपने मित्रों से दगां करने में भी संकोच नहीं होता।

पंचायत बैठ गई, तो रामधन मिश्र ने कहा-अब देरी क्या है ? पंचों का चुनाव हो जाना चाहिए। बोलो चौधरी ; किस-किस को पंच बदते हो।

अलगू ने दीन भाव से कहा-समझू साहु ही चुन लें।

समझू खड़े हुए और कड़कर बोले-मेरी ओर से जुम्मन शेख।

जुम्मन का नाम सुनते ही अलगू चौधरी का कलेजा धक्-धक् करने लगा, मानों किसी ने अचानक थप्पड़ मारा दिया हो। रामधन अलगू के मित्र थे। वह बात को ताड़ गए। पूछा-क्यों चौधरी तुम्हें कोई उज्र तो नही। चौधरी ने निराश हो कर कहा-नहीं, मुझे क्या उज्र होगा?

अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है। जब हम राह भूल कर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक बन जाता है।

पत्र-संपादक अपनी शांति कुटी में बैठा हुआ कितनी धृष्टता और स्वतंत्रता के साथ अपनी प्रबल लेखनी से मंत्रिमंडल पर आक्रमण करता है: परंतु ऐसे अवसर आते हैं, जब वह स्वयं मंत्रिमंडल में सम्मिलित होता है। मंडल के भवन में पग धरते ही उसकी लेखनी कितनी मर्मज्ञ, कितनी विचारशील, कितनी न्याय-परायण हो जाती है। इसका कारण उत्तर-दायित्व का ज्ञान है। नवयुवक युवावस्था में कितना उद्दंड रहता है। माता-पिता उसकी ओर से कितने चितिति रहते है! वे उसे कुल-कलंक समझते हैंपरन्तु थौड़ी हीी समय में परिवार का बौझ सिर पर पड़ते ही वह अव्यवस्थित-चित्त उन्मत्त युवक कितना धैर्यशील, कैसा शांतचित्त हो जाता है, यह भी उत्तरदायित्व के ज्ञान का फल है।

जुम्मन शेख के मन में भी सरपंच का उच्च स्थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्मेदारी का भाव पेदा हुआ। उसने सोचा, मैं इस वक्त न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देववाणी के सदृश है-और देववाणी में मेरे मनोविकारों का कदापि समावेश न होना चाहिए। मुझे सत्य से जौ भर भी टलना उचित नही!

पंचों ने दोनों पक्षों से सवाल-जवाब करने शुरू किए। बहुत देर तक दोनों दल अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते रहे। इस विषय में तो सब सहमत थे कि समझू को बैल का मूल्य देना चाहिए। परन्तु वो महाशय इस कारण रियायत करना चाहते थे कि बैल के मर जाने से समझू को हानि हुई। उसके प्रतिकूल दो सभ्य मूल के अतिरिक्त समझू को दंड भी देना चाहते थे, जिससे फिर किसी को पशुओं के साथ ऐसी निर्दयता करने का साहस न हो। अन्त में जुम्मन ने फैसला सुनाया-

अलगू चौधरी और समझू साहु। पंचों ने तुम्हारे मामले पर अच्छी तरह विचार किया। समझू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दें। जिस वक्त उन्होंने बैल लिया, उसे कोई बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे दिए जाते, तो आज समझू उसे फेर लेने का आग्रह न करते। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बड़ा कठिन परिश्रम लिया गया और उसके दाने-चारे का कोई प्रबंध न किया गया।

रामधन मिश्र बोले-समझू ने बैल को जान-बूझ कर मारा है, अतएव उससे दंड लेना चाहिए।

जुम्मन बोले-यह दूसरा सवाल है। हमको इससे कोई मतलब नहीं !

झगडू साहु ने कहा-समझू के साथं कुछ रियायत होनी चाहिए।

जुम्मन बोले-यह अलगू चौधरी की इच्छा पर निर्भर है। यह रियायत करें, तो उनकी भलमनसी।

अलगू चौधरी फूले न समाए। उठ खड़े हुए और जोर से बोल-पंच-परमेश्वर की जय!

इसके साथ ही चारों ओर से प्रतिध्वनि हुई-पंच परमेश्वर की जय! यह मनुष्य का काम नहीं, पंच में परमेश्वर वास करते हैं, यह उन्हीं की महिमा है। पंच के सामने खोटे को कौन खरा कह सकता है?

थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उनके गले लिपट कर बोले-भैया, जब से तुमने मेरी पंचायत की तब से मैं तुम्हारा प्राण-घातक शत्रु बन गया था; पर आज मुझे ज्ञात हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता। आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है। अलगू रोने लगे। इस पानी से दोनों के दिलों का मैल धुल गया। मित्रता की मुरझाई हुई लता फिर हरी हो गई।

 

कामरेड – कमलेश्वर

Filed under: कमलेश्वर — Satish Chandra Satyarthi @ 2:07 अपराह्न
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–लाल हिन्द, कामरेड!–एक दूसरे कामरेड ने मुक्का दिखाते हुए कहा। लाल हिन्द–कहकर उन्होंने भी अपना मुक्का हवा में चला दिया। मैं चौंका, और वैसे भी लोग कामरेड़ों का नाम सुन कर चौंकते हैं!

वास्तव में किसी हद तक यह सत्य भी है कि कामरेड की ‘रेड’ से सरकार तक चौंक जाती है। इनकी ‘रेड’ भी बड़े मजे की होती है, ‘रेड’ की पहली मंजिल में ये हड़ताल, दूसरी में मारपीट, तीसरी में अनशन, चौथी में जेल-यात्रा तक की धमकी देते हैं।

मैं इस शहर में नया-नया ही पहुँचा था, बहुत कठिनाई से एक कमरा इस मुहल्ले में पा सका। दूसरे दिन ही देखा कि तमाम खद्दरधारियों का ताँता इस मुहल्ले में, ख़ास कर मेरी पतली-सी सँकरी गली में लगा रहता। अनुमान लगाया सम्भवत: कांग्रेस की किसी सभा का आयोजन हो रहा है, इस कारण कार्यकर्ता-लोगों की दौड़-धूप मची रहती है। लगभग एक महीना बीत जाने पर किसी विशेष सभा आदि की बात नहीं सुनाई दी। एक दिन मैंने साहस करके एक कामरेड को रोककर पूछा– श्रीमान, आप लोग यहां दिन भर क्यों चक्कर काटते हैं?

पहले तो वे कुछ नाराज़ से हुए, फिर बड़ी अदा से अपने पतले से रूखे बालों पर हाथ फेरकर बोले– आप शायद नए-नए यहां आए हैं।

— जी हां।–मैंने कहा।

— तभी । आपका मकान कौन-सा है? –उन्होंने पूछा ।

— वह! –मैंने इशारा करके उन्हें बता दिया।

— यहां य़ह आपके मकान की बगल में हमारी पार्टी का ‘प्रॉविंशियल’ ऑफिस है।

— क्षमा कीजिएगा म़ुझे मालूम न था –मैं बोला– अच्छा नमस्ते।

–अजी नमस्ते हो जाएगी, लेकिन आप करते क्या हैं? –कुछ ज़बरदस्ती-सी करते हुए वह बोले।

— मैं तो विद्यार्थी हूँ।

–अच्छा त़ो कभी-कभी मिला कीजिएगा, यहां ऑफ़िस में आ जाया कीजिए। कभी-कभी क़ुछ ‘पार्टी लिटरेचर’ का अध्ययन कर लिया कीजिए।

–धन्यवाद!

–अच्छा, लाल हिन्द –कहकर उन्होंने मेरे ऊपर मुक्का तान दिया। मैंने डरते-डरते दोनों करबद्ध करके अपनी अहिंसात्मक प्रवृत्ति का परिचय दिया।

मेरा जिन कामरेड से परिचय हुआ उनका पूरा नाम था कामरेड सत्यपाल। वे भी वहीं प्रान्तीय ऑफिस में डेरा डाले थे। किसी लिमिटेड कम्पनी में एजेंट थे। काम रहता था घूमने-फिरने का, इस कारण समाज-सेवा का व्रत लेने में कठिनाई न थी। पिताजी उनके यद्यपि रहते थे इसी शहर में और सम्भवत: हाईकोर्ट में दफ़्तरी थे, परन्तु उनको कुछ शर्म आती थी अपने पिता के साथ रहने में और इसी कारण उनसे किनारा करके यहां आ बसे थे।

सात बजे का भोंपू बज चुका था, दीवारों पर सूरज की किरणें पड़ने लगीं थीं। दूध लेने वाले अपने-अपने लोटे ले-लेकर घर से बाहर निकल चुके थे, गंगा-स्नान को जाने वाली यात्रियों की टोलियां मिलिटरी की भाँति पंक्ति में एक के पीछे एक गंगा मइया के नारे बुलन्द करती जा रही थीं। मोटे-पतले बेचारे अपनी-अपनी पेंट सम्भालते हाथ में टिफ़िन कैरियर लिए पुल की ओर बेतहाशा दौड़े चले जा रहे थे। धर्मशाला में चहल-पहल आरम्भ हो गई थी। नुक्कड़ के मिठाई वाले ने पत्थर के कोयले की अंगीठी सुलगा कर, जलेबी बनाने के लिए कड़ाही चढ़ाकर डालडा का पीपा उलट दिया था। पास बैठा, मैला-सा अंगोछा लपेटे नौकर बासी चाशनी में पड़े चींटे और मक्खियां बीन-बीन कर फेंक रहा था, पर हमारे कामरेड बारजे के एक पतले कोने में चादर लपेटे अच्छा ख़ासा पार्सल बने अपनी पांचवी नींद पूरी कर रहे थे। धीरे-धीरे सुबह से दौड़ते अख़बार वालों की चहल-पहल समाप्त हुई और रात भर से बन्द दुकानों के दरवाजे चरमरा कर खुलने आरम्भ हुए तो उन्होंने एक करवट बदली और यह सिद्ध किया कि उनमें अभी जान बाकी थी। थके घोड़े की भांति तीन-चार बार लोट लगा कर उन्होंने अपनी चादर केवल गर्दन तक हटा कर सिर खोला, नज़र आई केवल लम्बी-लम्बी रूखी जटाएं, जैसे कलकत्ते से आने वाले किसी व्यक्ति ने अपने ‘होलडोल’ (होल्ड आल) में से नारियल निकाल दिया हो, और फिर उन्होंने वहीं से आवाज़ लगाई– इलाही!

— जी –इलाही ने भीतर से उत्तर दिया।

— टी! कुछ अलसाये से वह बोले ।

— दूध नहीं हैं। — क्यों, क्या डेरी वाला अभी तक नहीं आया? तो आज से उससे मना करा दो, इतनी देर में दूध नहीं चाहिए, कल से न आए।

— उसने तो कल से ही देना बन्द कर दिया है प़न्द्रह दिन का हिसाब साफ़ करने को कह रहा था। –इलाही ने भीतर से कहा।

— बकता है, पहली तारीख़ को डेढ़ रूपया दिया था, कल उससे हिसाब करके जो कुछ निकले तुम रख लेना और कल से दूध बन्द।

— आज सत्ताइस तारीख हो गई। पहली तारीख को डेढ़ रूपया दिया था। हिसाब करके तुम रख लेना।

कहकर इलाही खट-खट करता नीचे उतर गया ।
पाख़ाना जाने की किसे फुर्सत, खद्दर का कुर्ता चढ़ाकर, हाथ में पुराना अख़बार दबा कर उलझे हुए कामरेड नीचे उतर कर धर्मशाला के पास खड़े रिक्शे वालों के मजमें में समा गए। एक से बोले– क्यों इतवारी! उस दिन जो तुम्हारा रिक्शा ‘बस्ट’ हुआ था उसे जुड़वाने के दाम मालिक ने ही दिए थे?

वह जवाब भी न दे पाया था कि कामरेड दूसरे से बोल पड़े– क्यों मंगू! उस साहब से चौक से यहां तक का एक रूपया वसूल कर पाया था नहीं । या सिर्फ चवन्नी ही दी उसने।

— अरे भइया सिरफ़ चवन्नी दी उसने ब़ड़ा जालिम था।

— इन जालिमों के अत्याचार मिटाने को तुम्हें संगठित होना पड़ेगा, अपने हक के लिए तुम्हें लड़ना पड़ेगा. . .तुम्हारी क्या औक़ात है, क्या हस्ती है इसे तुम नहीं जानते। इनसे लड़ने को, अपनी मज़दूरी पूरी लेने को, अपने सड़ते बीवी-बच्चों, उनकी भूखी आत्माओं को शान्त करने के लिए, भर-पेट अन्न पाने के लिए तुम्हें ख़ून-पसीना एक करना होगा, एक साथ सबको खड़ा होना चाहिए स़बकी एक आवाज़ हो, एक मांग हो। अपनी ताकत को पहचानो! कल ही एक रिक्शा-मज़दूर यूनियन बनाओ। परसों से सारे शहर में हड़ताल कर दो। मैं और मेरे साथी तुम्हारा साथ देंगे। अपनी मांगों के परचे छपवाओ, सबसे चार-चार आने जमा कर लो, ये सब तुम लोगों के काम आएंगे। लेकिन बहुत जल्दी करो। अच्छा, अब मैं चलता हूँ। काम बहुत है। बिजली घर के मज़दूर मेरी राह देख रहे होंगे। तुम आज शाम को चन्दे का काम पूरा करके मुझ से मिल लेना सामने ऑफ़िस में! अच्छा साथियों लाल हिंद! –कहकर बड़ी तेज़ी से कामरेड सत्यपाल अपने कमरे में आकर पड़ी चादर को धीरे-धीरे तह करने लगे।
दस बजे के लगभग कामरेड अपना बिजलीघर वाला काल्पनिक काम समाप्त करने को, खद्दर का पजामा-कुरता पहने, हैंडबैग दबाये, ‘बाटा’ चप्पलें फड़फड़ाते उलझे से उतर पड़े और फटर-फटर करते शहर की ख़ास-ख़ास सड़कों, दीवारों पर दवाइयों, पेन बाम और सिनेमा के विज्ञापन पढ़ते – ‘डाक बंगला’ वास्ती, सुरैया त़ीन मैटनी, साढ़े दस, एक व तीन बजे शाम को रीजेंट थियेटर में – जैसे थके-मांदे फुटपाथ से होते-होते ‘वाटर-वर्क्स’ के फाटक से जा टकराए। चपरासी से बोले– क्यों भाई ।

— कहाँ जाना चाहते हैं साहब! अन्दर जाने का हुक्म नहीं हैं। –फाटक पर खड़े चपरासी ने पूछते हुए कोरा-सा ज़वाब दिया।

थकान से चूर बेचारे सामने के बाग में जा कर लान पर बैठकर ‘हिन्द में लाल क्रान्ति’ की रूपरेखा बनाते-बनाते, हैंडबैग का तकिया लगा कर सो गए। शाम को जब ऑफ़िस लौटे तो मंगू को बैठे पाया, तपाक से बोले– क्या बताऊं, ‘वाटर वर्क्स’ में बड़ी धांधली है, सबके सब पीछे पड़ गए… ऐसा उलझाते हैं कि छोड़ते ही नहीं द़ेर तो नहीं हुई तुम्हें आए।

— नहीं भइया, आज तुम्हारी जोश की बातों ने हममें जान डाल दी, यह छ: रूपए जमा कर लिए हैं, इन्हें रखकर कल से आप हमारा काम शुरू कर दीजिए और कल ही हम फिर कुछ और जमा कर लेंगे।

— अच्छा-अच्छा ठीक है, लाओ। पन्द्रह दिन में देखो क्या उलट-पुलट होती है… आज तारीख़ है सत्ताइस! ठीक है। यह पूँजीवादी सरकार पन्द्रह तारीख को आज़ादी की सालगिरह मनाने जा रही है जबकि हमारे गरीब मज़दूरों की मौत की सालगिरह मन रही हैं। मैं कल फिर तुमसे मिलूंगा! अच्छा, अभी तो मुझे प्रेस जाना है, कुछ खास ‘ख़बर’ निकलवानी है। अच्छा चलूँ, लाल हिन्द!

फिर वे दौड़े-दौड़े पान वाले की दुकान पर पहुँचे और बड़े गर्व से बोले– हां जी श्यामलाल, तुम्हारा कितना पैसा बाकी है।

— चार रूपये तीन आने!

— मुझे तो हिसाब याद नहीं, ख़ैर तुम्हारे विश्वास पर, यह लो चार रूपये… तीन आने फिर कभी… अरे कल ही लेना।

— बहुत अच्छा साहब। –कहकर उसने चार रूपए सन्दूकची में डाल दिए। रिक्शा किया प्रेस पहुँचे। रिक्शे वाले को रूपये का नोट देते बोले– लाओ, ग्यारह आने लौटाओ।

— बाबू, आठ आने हुए यहां तक के।

— शर्म नहीं आती आठ आने मांगते, कुल दो मील तो प्रेस है… लाओ ग्यारह आने वापिस करो, टकसाल लगा रखी है क्या जो पैसे बना-बनाकर तुम्हें लुटाया करूँ?

— आठ आना मजूरी है बाबू… कोई ज्यादा नहीं मांगे।

— अच्छा-अच्छा, ला दस आने लौटाल।

— बड़े जालिम हो बाबू, गरीब का पेट काटते हो। –रिक्शेवाले ने पैसे देते हुए कहा।

— गरीब में नौ मन चर्बी होती है! –और पैसे गिनते-गिनते कामरेड प्रेस में घुस गए। छ: रूपये में से एक रूपया दस आना शेष था।

भीतर पहुँच कर बड़े शिष्टाचार से सम्पादक जी से बोले– एक विशेष समाचार छापना है।

— स्थान तो रिक्त नहीं हैं, पर समाचार क्या है? –सम्पादक बोले।

— कामरेड सत्यपाल का एक विशेष उल्लेखनीय समाचार है।

— क्षमा कीजियेगा। चौथे पृष्ठ पर विज्ञापन के कालम खाली है, उन्हीं में विज्ञापन की दर पर छप सकेगा।

— बड़ी कृपा होगी यदि आप ऐसे ही छाप दें।

— असमर्थता है मित्र, केवल दो रूपए पड़ेंगे, विज्ञापन की दर पर जाएगा।

— अच्छा डेढ़ रूपया रखिए, धन्यवाद।
थोड़ी देर बाद कामरेड अपने कुरते की जेब में हाथ डाले चौकोर दुअन्नी के चारों कानों पर हाथ फेरते प्रसन्न से लौट आए। दूसरे दिन स्थानीय दैनिक में था –कामरेड सत्यपाल का तूफ़ानी कार्य; रिक्शा मज़दूर यूनियन का जन्म! और कुछ थोड़ा-सा विवरण। और आज सुबह कामरेड पुराने अख़बार के स्थान पर ताजा अख़बार लिए चौथा पृष्ठ ऊपर किए रिक्शेवालों के मजमे में थे।

धीरे-धीरे काम बढ़ रहा था, दिन निकल रहे थे। सोलह अगस्त था। बेचारे कामरेड पन्द्रह अगस्त के उत्सव के उपलक्ष्य में जाली रसीदें काट-काट कर चन्दा जमा करने के जुर्म में दो सिपाहियों के साथ कोतवाली की ओर चले जा रहे थे तो यूनियन के एक रिक्शेवाले ने देखकर आश्चर्य से पूछा– कामरेड, यह क्या?

— अरे भाई! ग़रीबों के लिए जो बोलता है उसका यही हाल होता है, मैं ग़रीबों के लिए बोला, यह अंज़ाम मिला, परन्तु चिन्ता नहीं, ग़रीबों को मिले रोटी तो मेरी जान सस्ती है. . .लाल हिन्द जिन्दाबाद!

और सच्चाई कामरेड की लच्छेदार बातों में दुबक कर रह गई, वह फिर चीख पड़े–लाल हिन्द जिन्दाबाद!

दो-तीन रिक्शेवाले चीख उठे– लाल हिन्द ज़िन्दाबाद! कामरेड सत्यपाल ज़िन्दाबाद!! ज़िन्दाबाद!!!
(यह कमलेश्वर की पहली कहानी है जो उन्होंने 1946 में लिखी थी)

 

एक सांवली सी परछाई – मनीषा कुलश्रेष्ठ

Filed under: मनीषा कुलश्रेष्ठ — Satish Chandra Satyarthi @ 1:59 अपराह्न
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सच कहूँ तो वो एक साँवली परछांई ही तो थीतमाम खूबसूरत चेहरों के पीछे सहमी-सी, एक छिपती-छुपाती परछांई

वह खूबसूरत लडक़ियों से चहकता घर मेरी सहेली फरजाना का थाजब मैं ने इसे अपनी क्लास में देखा था तो देखती रह गई थीछूने से मैला होता गोरा रंग, और टिपीकल खानदानी मुस्लिम नाक-नक्शएक तो छोटा कस्बा और साइंस पढने के लिये लडक़ों के स्कूल में जाने वाली एक मुस्लिम लडक़ी। यूँ हम चार लडक़ियाँ थी जो गर्ल्स स्कूल में साईंस फैकल्टी के अभाव में बॉयज स्क़ूल में नवीं क्लास में दाखिल हुई थीं पर हम तीन लडक़ियाँ उस कस्बे में बाहर से ट्रान्सफर होकर आए अधिकारियों की बेटियाँ थींनमिता के पापा उस कस्बे के एस डी एम थेनीरजा के पापा इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड के एक्स ई एन और मेरी मम्मी गर्ल्स स्कूल की प्रिन्सीपल थीं और पापा बी डी ओ

यूँ फरजाना के पापा भी जिले के लीडींग क्रिमनल लॉयर थे पर एक तो यह राजस्थान का मुस्लिम बहुल कस्बा उनका स्थाई निवास था, फिर उस समय भी जहाँ गिनी-चुनी लडक़ियाँ गर्ल्स स्कूल में भी बुरका पहन कर जाती थीं ऐसे में फरजाना ही जानती होगी कि उसने अपने पापा से कितनी जिद और मिन्नतें की होंगी हमारे साथ बॉयज स्क़ूल में एडमिशन लेने की

हालांकि उसकी कुछ बडी बहनें मम्मी के स्कूल में तब भी पढ रही थीं और वे बुरका पहन कर आया-जाया करती थींन जाने किस तरह फरजाना ने पापा को मनाया होगा कि न तो वह बुरका पहनेगी, और साइंस पढेग़ी वो भी लडक़ों के स्कूल मेंअम्मी की तो चलती ही कहाँ? फरजाना की बहनों की गिनती याद नहींपर दो बेइन्तहां खूबसूरत बहनें अंजुम दीदी और निकहत दीदी मम्मी के स्कूल से दसवीं की परीक्षा दे रही थीं

साथ पढने की वजह से और हमारे स्कूल से उसका घर पास होने की वजह से हम उसके घर जाने आने लगेतब पता चला कि और भी बहने हैं फरजाना कीउन दोनों दीदीयों से बडी एक दीदी की शादी हो चुकी हैएक फरजाना से जरा बडी बहन शाजिया को देख कर तो मेरे मुँह से निकल ही गया

हाय फरजी, पहले तुझे देखा तो तू खूबसूरत लगी फिर अंजुम और निकहत दीदी तुझसे भी सुंदर लगीं अब ये शाजिया माई गॉड तुम सब कुछ भी नहीं इसके आगे। और कितनी सुंदर बहनों से और मिलवाएगी?

शाजिया का पढने में जरा मन न था, पाँचवी के बाद अम्मी से कह दिया नहीं पढना, अम्मी भी खुश, बेटी भीमगर शाजिया का कमाल देखते जरदोजी क़े गरारे कुर्ते काढने में और सुन्दरता तो जैसे तराशी हुई और तमाम उपमाओं को लगा दो उसके सौंन्दर्य वर्णन में तो कम पडें, हल्की भूरी बडी खों पे भ/वरे सी पलकें तीखी नाक , तराशे गुलाबी होंठ और सच मानो ये कल्पना नहीं

और भी दो छोटी बहनें थीं फरजाना की वसीमा और गुलगुल तो तब आंटी की गोद में ही थी ये छुटकियाँ भी कम न थींआखिर बेहद हैन्डसम वकील साहब और चालीस की उमर में भी गजब की खूबसूरत आंटी की बेटियाँ थींदो बेटे गुल से जरा बडे सुहैल और तुफैल ये भी माशाअल्लाह गोरे और सुन्दर

अकसर इन्टरवेल में हम वहीं होते, वकील साहब की हवेली में कभी आलू के मुगलई परांठे खाते कभी जरदा तो कभी सेंवईयाँ। मुझे और नमिता को तो गोश्त खाने में भी गुरेज न था पर हमारे साथ होती थी ब्राह्मणी नीरजा (आज लन्दन में डॉक्टर है, भले ही अब हैम-वैम खा लेती होगी) कितने ही दिन तो इस खूबसूरत खानदान में आते-जाते हो गएऔर अंजुम दीदी का निकाह तय हो गयाघर में माहौल बदल गया, रेशमी शरारे-गरारे सिले जाने लगे, दुपट्टों पर सुन्दर मुकैश और सुनहरी लैसों और मोतियों का काम शुरू हो गयाबीच-बीच में गीत भी होते, उबटन लगता बेला-मोतिया के गजरों का ढेर बंटता, महकता फरजाना पढने के लिये इतने बडे भव्य घर में भी तन्हाई न मिल पाने के कारण चिढ ज़ाती, उसे बस डॉक्टर बनना था, बाकि सब व्यर्थ लगतापर मुझे बहुत आकर्षित करता वह माहौलफरजाना का घर हमारे घर से दूर न था, उस पर अंजुम दीदी मम्मी की स्टूडेन्ट सो हर रस्म पर मैं वहीं होतीशाजिया से मेरी बेहद पटती, उसका खूबसूरत लहजे में बोलना, छेडना, रूमानी बातें करना मुझे भाता, हम दोनों ही की गीतों में, नाचने में खूब रुचि रहतीफरजाना चिढ ज़ाती

ऐसे ही एक दिन, शादीके पहले की रसमों के बीच चहकते गीतों और महकते उबटनों और सरसराते शरारों को छोड मैं पानी पीने उनकी रसोई तक गई तो वहाँ एक लम्बी साँवली लडक़ी रस्म के बाद बांटीजाने वाली केसरिया बूंदी दोनों में रख रही थीरसोई की गर्मी में सांवलाचेहरा तप आया था वो मुस्कुराईं –

आओ मनीषा
आप मुझे जानती हैं?
हाँ, बेशक! अकसर तो आती हो तुम!
आप?
फरजाना की बडी बहन हूँ। तभी नाक-नक्श में वही चिर-परिचत घुला-घुला सा लावण्य मुरझाए चेहरे में स्पष्ट था। दो लम्बी चोटियाँ, सादा सा हल्का नीला शलवार-कुर्ता। छरहरी देह पे कस के लपेटा सफेद दुपट्टा।
अं.. दीदी, पानी पीना था।

बाद में गीतों में बैठने पर याद आया, इस साँवली लडक़ी को देखा तो है पर बस एक परछांई सा, बस जरा सा, रसोई से निकल दस्तरख्वान तक जाना, वहाँ से रसोई और ढेरों कमरों के बीच किसी कमरे में आते-जाते हम अपनी किशोरवय अल्हडता में कब उस ओर ध्यान देते?

फरजाना से कहा कि तूने बताया नहीं

हाँ! वो अंजुम दीदी से बडी हैं। फिरदौस दीदी! पापा की यानि मेरी दूसरी अम्मी की बेटी। अलग रहती थीं कहीं, अम्मी नहीं रहीं तो यहाँ आ गईं।
इनकी शादी ? ”
कोई पैगाम ही नहीं आता।
ऐसी तो कहीं बदसूरत भी नहीं, नाक-नक्श कितने सुन्दर हैं, लम्बे बाल, लम्बा कद। तुम सब की हाईट तो एवरेज सी ही है। बस गोरी ही तो नहीं तुम सब की तरह। तुम्हारे पापा ही नहीं ढूंढते? ”
नहीं हमारे यहाँ पैगाम आए तभी शादी होती है।
नहीं आए, तो बैठे रहो? ”
आते हैं, अपने अपने लेवल के सबको आते हैं।

पूरी शादी में वह सांवला चेहरा जुटा रहा, बेजा कामों मेंसुन्दर बहनें, खिलखिलातीं, रेशमी शरारों में सजी, दुल्हन को इधर से उधर ले जातीं, सजातींअंजुम दीदी के निकाह में बडा मजा आयापहली बार मुस्लिम विवाह की सारी रस्में देखींदूल्हे का इकरार, फिर मैहर की रकम का तय होना, दुल्हन के इकरार के वक्त दुल्हन और उसकी बहनों, माँ-मौसियों का रोना और दुल्हन का एक धीमा सा शर्मीला हाँ कहनाफिर दूल्हे का जूठा लड्डू दुल्हन को खिलानामर्दों और औरतों का एकदम अलग-अलग इंतजाम होनाअंजुम दीदी की शादी में गुल बस दस महीनों की थी, सबसे छोटी साली करके उसे दूल्हा भाई की गोद में डाल दिया गया थापर फिरदौस उन खूबसूरत गोरी बहनों की साँवली परछांई बनी, पीछे कहीं से रस्में देख लेती। कपडों की सादगी भी वही थी ऐन निकाह के दिन भी हल्के हरे सादा साटन के गरारे पर वही सफेद दुपट्टा डाले बस दहेज का संदूक सजातीअम्मी का हुकुम बजाती भटकती रहीं

ऐसे ही निकहत दीदी का भी निकाह हो गया नकचढी शाजिया के बेपनाह हुस्न के चलते हजार पैगाम आए और उसका निकाह भी एक अमीर खानदानी घर के आई ए एस बेटे से तय हो गयाफरजाना चिढक़र कहती, न जाने क्या करेगी बस सुन्दरता ही है, दिमाग देखो तो ठस्स, उस दिन जब वह देखने आया तो डाईनिंग टेबल पर खाना चल रहा था, उसने बोला कि कैरी ऑन तो कमबख्त कच्ची कैरी ही उठा लाईन जाने कैसे चलेगी ये बेमेल शादी? पर चली खूब चली, एक साल बाद ही शाजिया को देखा तो पहचान न सकीकटे बाल, स्लीवलैस ब्लाउजयदा-कदा बाल झटक कर बोले गए अंग्रेजी के जुमलेदूल्हा भाई अलग सौ जान से निछावर कमी क्या थी? अदा थी, हुस्न थाबस इल्म ही तो कम था

लाख चाह कर फरजाना डॉक्टर न बन सकी, हम तो पहले ही पढाई में सीरीयस थे ही नहींनीरजा का पहली बार में ही पी. एम. टी. में सलेक्शन हो गयानमिता का तो हम दसवीं में थे तब ही ट्रान्सफर हो गया थाफरजाना और मैं ने बी.एस.सी. साथ किया, वो भी पास के शहर में डेली अप एण्ड डाउन करकेफाईनल करते करते उसका निकाह डॉक्टर से होना तय हुआफिर वही सरगर्मी, बहनें अपने बाल-बच्चे लिये कई कई दिन पहले आ जुटींफिर वही कुर्तों-दुपट्टों पे कढाई शुरू हुई, जर्दा पकता, उबटन घुलता

इस सब से अब मैं ऊबने लगी थी कि एक दिन यूँ ही फरजाना के कमरे में, चमेली की लतर से ढकी खिडक़ी के पास पडे बिस्तर पर पास-पास लेट कर उससे अंतरंग बातें कर रही थी –

उस दिन वसीम कॉलेज मिलने आए तो तू कहाँ मर गई थी, चेहरा देखा होता बेचारे का क्या करती? जिस दिन तय किया था, उनसे कॉलेज में मिलना उसी दिन ये हंगामा हो गया।
क्या? ”

बता न, पता चल गया क्या? ”
नहीं, मेरी बात नहीं। फिरदौस की बात खुल गई।
क्या!
चल छोड ना।
नहीं बता न।
तू..।
इडियट! क्या अब तक मुझ पर भरोसा नहीं? और तेरे घर की बात मेरे घर की बात है।
वो हमारी हवेली के बगल में एक छोटा सा घर है ना! खपरैल वाला, गफ्फार मास्साब का।
हाँ!
उनका एक भतीजा है, असलम, वो भी एक मास्टर है। यहीं रह रहा था। हमारी रसोई की एक खिडक़ी उधर को खुलती थीन जाने कब फिरदौस और असलम। फिर? ”
एक दिन असलम घर आ गया पैगाम लेकर, पापा पहले समझे नहीं सोचा मेरे लिये आया है। उस पर बिगड ग़ए। तब उसने फिरदौस का नाम लिया। तब तक सुहैल ने भी शिकायत की कि उसने उसे अकसर फिरदौस से बात करते देखा। फिर उसे तो डांटा ही, बेचारी फिरदौस को जो अम्मी और दादी ने खरी-खरी सुनाई कि बस। देखा मैं ने भी था दोनों को बात करते हुए, पर उसके उदास चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान ने मुझे उसकी शिकायत करने से हमेशा रोका। क्या करूं मनु, मेरा ही शादी करने को मन नहीं करता जब उसे अपनी शादी में भी वही सब करते देखती हूँ, जो उसने तमाम बहनों की शादी में किया तो जी भर आता है। शुरू से ही तो वह ऐसे ही रही है, खामोश और काम में मसरूफ। शाजिया को तो वह फूटी आँख नहीं सुहाती थी। हम दूसरी बहनें भी अपने में मगन रहीं। अम्मी और दादी ने उससे काम तो जमके लिया, बदले में प्यार का एक बोल नहीं बोला।
असलम क्या बुरा है? ”
नहीं, भला आदमी है। पर विडोअर है, उस पर हमारा उनका स्तर अलग है। अब फिरदौस भी तो तीस पार कर गई है।
तो क्या हुआ जब इसमें फिरदौस दीदी की खुशी है तो, जब पैगाम भी न आए, न अंकल कोई रिश्ता देखें तो क्या करे दीदी? असलम क्या बुरा आदमी है? ”
बहुत शरीफ है, जब देखा तहजीब से बात ही करते देखा।
तो तू कुछ कर न!
क्या ? मैं कर भी क्या सकती हूँ? ”
अपने लिये लडती आई है पापा से, पहले बुरका पहन के स्कूल न जाने के लिये, सांईस लेके लडक़ों वाले स्कूल में पढने के लिये। अब थोडा फिरदौस दीदी के लिये लड ले।
ठीक कह रही है तू? ”
और क्या, एक अपनी ही अभागी बहन की जिन्दगी के लिये तू इतना तो कर सकती है।
हाँ,मनु मुझे अब याद आता है, कितनी ही बार मैं ने एक्जाम्स में उसे चाय बनाके देने के लिये उठाया, उसने कभी बुरा नहीं माना और बना के दी।तेरा कहना सही है, अब जब मैं ही घर में बडी रह गई हूँ वो मेरी बात नहीं टालेंगे।

मैं घर चली आई, फरजाना ने न जाने कैसी वकालत की कि जब मुझे कार्ड मिला शादी का तो उसमें दोनों बहनों का नाम थाआखिर बेटी किस की थी एक नामी वकील की

फरजाना वेड्स वसीम और फरदौस वेड्स असलम

शादियाँ हुईं उस हवेली की तमाम शानोशौकत के और उन्हीं प्यारी रस्मों के साथफरज़ाना की खुशी दोहरी थी, वह चहक रही थी, वसीम मियाँ बडे बातूनी निकलेअसलम और फिरदौस दीदी दोनों सहमे तो थे पर खुशी उनकी आखों की कोरों से छलक रही थीफरजाना विदा के वक्त रस्मन आके गले मिली तो मैं ने कहा, कमबख्त! झूठमूठ ही सही रो तो दे, इत्ती दूर बॉम्बे जा रही हैवह फुसफुसाई, क्यों रोऊं, रोने की बात ही क्या है? गाँव से निकल कर शहर में जा रही हूँ।

उधर पास ही सटे घर में विदा हो कर जा रही फिरदौस दीदी जो जार-जार रोई हैं कि बस मुझे लगा बरसों की बात-बात पे दबाई रूलाई अब फूटी हैमेरे भी गले लगींवसीम मियाँ ने दहेज का सामान इसलिये ले जाने से इनकार कर दिया कि बॉम्बे में छोटे घर होते हैं, इनकन्वीनियन्स होगीअसलम मियाँ ने कहा कि यह उन्होंने पहले ही कहा था कि वे फिरदौस को बस दुल्हन के जोडे में ले जाना चाहते हैं, दहेज उनके उसूलों के खिलाफ बात हैफरजाना से फिर नहीं मिल सकी वो शारजाह चली गई, पर उसकी साँवली परछांई सी फिरदौस दीदी से मैं अपनी शादी के बाद एक बार फिर मिली, मम्मी के ऑफिस में जब मम्मी एजूकेशन में डिप्टी डाईरेक्ट्रेस थीं

अरे, मनीषा!
दीदी आप यहाँ? ”
हाँ। आंटी से तबादले की बात करने आई थी।
किसके?”
अपने।
आप
हाँ। मैं टीचर हूँ न, गर्ल्सस्कूल में वहीं पर अब प्रमोशन है पर मैं कहीं और नहीं जाना चाहती।
आपने पढाई कब की? ”
बाहरवीं तो फरजाना के कहने पर प्राईवेट किया था वहीं। शादी के बाद इन्होंने पढाया तो बीए फिर बीएड कर लिया कॉरसपोन्डेंस से।

मैं वही साँवली उदास परछांई ढूंढ रही थी जो मुझे ढूंढेनहीं मिल रही थी

 

मैं हिन्दू हूँ / असगर वज़ाहत

Filed under: असगर वजाहत — Satish Chandra Satyarthi @ 1:53 अपराह्न
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ऐसी चीख कि मुर्दे भी कब्र में उठकर खड़े हो जाएं। लगा कि आवाज़ बिल्कुल कानों के पास से आई है। उन हालात में. . .मैं उछलकर चारपाई पर बैठ गया, आसमान पर अब भी तारे थे. . .शायद रात का तीन बजा होगा। अब्बाजान भी उठ बैठे। चीख फिर सुनाई दी। सैफ अपनी खुर्री चारपाई पर लेटा चीख रहा था। आंगन में एक सिरे से सबकी चारपाइयां बिछी थीं।

‘लाहौलविलाकुव्वत. . .’ अब्बाजान ने लाहौल पढ़ी ‘खुदा जाने ये सोते-सोते क्यों चीखने लगता है।’ अम्मा बोलीं। ‘अम्मा इसे रात भर लड़के डराते हैं. . .’ मैंने बताया। ‘उन मुओं को भी चैन नहीं पड़ता. . .लोगों की जान पर बनी है और उन्हें शरारतें सूझती हैं’, अम्मा बोलीं।

सफिया ने चादर में मुंह निकालकर कहां, ‘इसे कहो छत पर सोया करे।’ सैफ अब तक नहीं जगा था। मैं उसके पलंग के पास गया और झुककर देखा तो उसके चेहरे पर पसीना था। साँस तेज़-तेज़ चल रही थी और जिस्म कांप रहा था। बाल पसीने में तर हो गए और कुछ लटें माथे पर चिपक गई थी। मैं सैफ को देखता रहा और उन लड़कों के प्रति मन में गुस्सा घुमड़ता रहा जो उसे डराते हैं।
तब दंगे ऐसे नहीं हुआ करते थे जैसे आजकल होते हैं। दंगों के पीछे छिपे दर्शन, रणनीति, कार्यपद्धति और गति में बहुत परिवर्तन आया है। आज से पच्चीस-तीस साल पहले न तो लोगों को जिंद़ा जलाया जाता था और न पूरी की पूरी बस्तियां वीरान की जाती थीं। उस ज़माने में प्रधानमंत्रियों, गृहमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों का आशीर्वाद भी दंगाइयों को नहीं मिलता था। यह काम छोटे-मोटे स्थानीय नेता अपन स्थानीय और क्षुद्र किस्म का स्वार्थ पूरा करने के लिए करते थे। व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता, ज़मीन पर कब्ज़ा करना, चुंगी के चुनाव में हिंदू या मुस्लिम वोट समेत लेना वगैरा उद्देश्य हुआ करते थे। अब तो दिल्ली दरबार का कब्ज़ा जमाने का साधन बन गए हैं। सांप्रदायिक दंगे। संसार के विशालतम लोकतंत्र की नाक में वही नकेल डाल सकता है जो सांप्रदायिक हिंसा और घृणा पर खून की नदियां बहा सकता हो।
सैफ को जगाया गया। वह बकरी के मासूम बच्चे की तरह चारों तरफ इस तरह देख रहा था जैसे मां को तलाश कर रहा हो। अब्बाजान के सौतेले भाई की सबसे छोटी औलाद सैफुद्दीन उर्फ़ सैफ ने जब अपने घर के सभी लोगों से घिरे देखा तो अकबका कर खड़ा हो गया। सैफ के अब्बा कौसर चचा के मरने का आया कोना कटा पोस्टकार्ड मुझे अच्छी तरह याद है। गांव वालों ने ख़त में कौसर चचा के मरने की ख़बर ही नहीं दी थी बल्कि ये भी लिखा था कि उनका सबसे छोटा सैफ अब इस दुनिया में अकेला रह गया है। सैफ के बड़े भाई उसे अपने साथ बंबई नहीं ले गए। उन्होंने साफ़ कह दिया है कि सैफ के लिए वे कुछ नहीं कर सकते। अब अब्बाजान के अलावा उसका दुनिया में कोई नहीं है। कोना कटा पोस्ट कार्ड पकड़े अब्बाजान बहुत देर तक ख़मोश बैठे रहे थे। अम्मां से कई बार लड़ाई होने के बाद अब्बाजान पुश्तैनी गांव धनवाखेड़ा गए थे और बची-खुची ज़मीन बेच, सैफ को साथ लेकर लौटे थे। सैफ को देखकर हम सबको हंसी आई थी। किसी गंवार लड़के को देखकर अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के स्कूल में पढ़ने वाली सफिया की और क्या प्रतिक्रिया हो सकती थी, पहले दिन ही यह लग गया कि सैफ सिर्फ गंवार ही नहीं है बल्कि अधपागल होने की हद तक सीधा या बेवकूफ़ है। हम उसे तरह-तरह से चिढ़ाया या बेवकूफ़ बनाया करते थे। इसका एक फायदा सैफ को इस तौर पर हुआ कि अब्बाजान और अम्मां का उसने दिल जीत लिया। सैफ मेहनत का पुतला था। काम करने से कभी न थकता था। अम्मां को उसकी ये ‘अदा` बहुत पसंद थी। अगर दो रोटियां ज्यादा खाता है तो क्या? काम भी तो कमर तोड़ करता है। सालों पर साल गुज़रते गए और सैफ हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। हम सब उसके साथ सहज होते चले गए। अब मोहल्ले का कोई लड़का उसे पागल कह देता तो तो मैं उसका मुंह नोंच लेता था। हमारा भाई है तुमने पागल कहा कैसे? लेकिन घर के अंदर सैफ की हैसियत क्या थी ये हमीं जानते थे।
शहर में दंगा वैसे ही शुरू हुआ था जैसे हुआ करता था यानी मस्जिद से किसी को एक पोटला मिला था जिसमे में किसी किस्म का गोश्त था और गोश्त को देखे बगैर ये तय कर लिया गया था कि चूंकि वो मस्जिद में फेंका गया गोश्त है इसलिए सुअर के गोश्त के सिवा और किसी जानवर का हो ही नहीं सकता। इसकी प्रतिक्रिया में मुगल टोले में गाय काट दी गई थी और दंगा भड़क गया था। कुछ दुकानें जली थीं और ज्यादातर लूटी गई थीं। चाकू-छुरी की वारदातों में क़रीब सात-आठ लोग मरे थे लेकिन प्रशासन इतना संवेदनशील था कि कर्फ़्यू लगा दिया गया था। आजकल वाली बात न थी हज़ारों लोगों के मारे जाने के बाद भी मुख्यमंत्री मूछों पर ताव देकर घूमता और कहता कि जो कुछ हुआ सही हुआ।
दंगा चूंकि आसपास के गांवों तक भी फैल गया था इसलिए कर्फ्यू बढ़ा दिया गया था। मुगलपुरा मुसलमानों का सबसे बड़ा मोहल्ला था इसलिए वहां कर्फ्यू का असर भी था और ‘जिहाद` जैसा माहौल भी बन गया था। मोहल्ले की गलियां तो थी ही पर कई दंगों के तजुर्बों ने यह भी सिखा दिया था कि घरों के अंदर से भी रास्ते होने चाहिए। यानी इमरजेंसी पैकेज। तो घरों के अंदर से, छतों के उपर से, दीवारें को फलांगते कुछ ऐसे रास्ते भी बन गए थे कि कोई अगर उनको जानता हो तो मोहल्ले के एक कोने से दूसरे कोने तक आसानी से जा सकता था। मोहल्ले की तैयारी युद्धस्तर की थी। सोचा गया था कि कर्फ्यू अगर महीने भर भी खिंचता है तो ज़रूरत की सभी चीजें मोहल्ले में ही मिल जाएं।
दंगा मोहल्ले के लड़कों के लिए एक अजीब तरह के उत्साह दिखाने का मौसम हुआ करता था। अजी हम तो हिंदुओं को ज़मीन चटा देंगे.. समझ क्या रखा है धोती बांधनेवालों ने. . .अजी बुज़दिल होते है।. . .एक मुसलमान दस हिंदुओं पर भारी पड़ता है. . .’हंस के लिया है पाकिस्तान लड़कर लेंगे हिन्दुस्तान जैसा माहौल बन जाता था, लेकिन मोहल्ले से बाहर निकलने में सबकी नानी मरती थी। पी.ए.सी. की चौकी दोनों मुहानों पर थी। पीएसी के बूटों और उनकी राइफलों के बटों की मार कई को याद थी इसलिए जबानी जमा-खर्च तक तो सब ठीक था लेकिन उसके आगे. . .
संकट एकता सिखा देता है। एकता अनुशासन और अनुशासन व्यावहारिकता। हर घर से एक लड़का पहरे पर रहा करेगा। हमारे घर में मेरे अलावा, उस ज़माने में मुझे लड़का नहीं माना जा सकता था, क्योंकि मैं पच्चीस पार कर चुका था, लड़का सैफ ही था इसलिए उसे रात के पहरे पर रहना पड़ता था। रात का पहरा छतों पर हुआ करता था। मुगलपुरा चूंकि शहर के सबसे उपरी हिस्से में था इसलिए छतों पर से पूरा शहर दिखाई देता था। मोहल्ले के लड़कों के साथ सैफ पहरे पर जाया करता था। यह मेरे, अब्बाजान, अम्मां और सफिया-सभी के लिए बहुत अच्छा था। अगर हमारे घर में सैफ न होता तो शायद मुझे रात में धक्के खाने पड़ते। सैफ के पहरे पर जाने की वजह से उसे कुछ सहूलियतें भी दे दी गई थीं, जैसे उसे आठ बजे तक सोने दिया जाता था। उससे झाडू नहीं दिलवाई जाती थी। यह काम सफिया के हवाले हो गया था जो इसे बेहद नापसंद करती थी।
कभी-कभी रात में मैं भी छतों पर पहुंच जाता था, लाठी, डंडे, बल्लम और ईंटों के ढेर इधर-उधर लगाए गए थे। दो-चार लड़कों के पास देसी कट्टे और ज्यादातर के पास चाकू थे। उनमें से सभी छोटा-मोटा काम करने वाले कारीगर थे। ज्यादातर ताले के कारखानों के काम करते थे। कुछ दर्जीगिरी, बढ़ईगीरी जैसे काम करते थे। चूंकि इधर बाजार बंद था इसलिए उनके धंधे भी ठप्प थे। उनमें से ज्यादातर के घरों में कर्ज से चूल्हा जल रहा था। लेकिन वो खुश थे। छतों पर बैठकर वे दंगों की ताज़ा ख़बरों पर तब्सिरा किया करते थे या हिंदुओं को गालियां दिया करते थे। हिंदुओं से ज्यादा गालियां वे पीएसी को देते थे। पाकिस्तान रेडियो का पूरा प्रोग्राम उन्हें जबानी याद था और कम आवाज़ में रेडियो लाहौर सुना करते थे। इन लड़कों में दो-चार जो पाकिस्तान जा चुके थे उनकी इज्जत हाजियों की तरह होती थी। वो पाकिस्तान की रेलगाड़ी ‘तेज़गाम` और ‘गुलशने इक़बाल कॉलोनी` के ऐसे किस्से सुनाते थे कि लगता स्वर्ग अगर पृथ्वी पर कहीं है तो पाकिस्तान में है। पाकिस्तान की तारीफ़ों से जब उनका दिल भर जाया करता था तो सैफ से छेड़छाड़ किया करते थे। सैफ ने पाकिस्तान, पाकिस्तान और पाकिस्तान का वज़ीफ़ा सुनने के बाद एक दिन पूछ लिया था कि पाकिस्तान है कहां? इस पर सब लड़कों ने उसे बहुत खींचा था। वह कुछ समझा था, लेकिन उसे यह पता नहीं लग सकता था कि पाकिस्तान कहां है।
गश्ती लौंडे सैफ को मज़ाक़ में संजीदगी से डराया करते थे, ‘देखो सैफ अगर तुम्हें हिंदू पा जाएंगे तो जानते हो क्या करेंगे? पहले तुम्हें नंगा कर देंगे।’ लड़के जानते थे कि सैफ अधपागल होने के बावजूद नंगे होने को बहुत बुरी और ख़राब चीज़ समझता है, ‘उसके बाद हिंदू तुम्हारे तेल मलेंगे।’

‘क्यों, तेल क्यों मलेंगे?’ ‘ताकि जब तुम्हें बेंत से मारें तो तुम्हारी खाल निकल जाए। उसके बाद जलती सलाखों से तुम्हें दागेंगे. . .’ ‘नहीं,’ उसे विश्वास नहीं हुआ।

रात में लड़के उसे जो डरावने और हिंसक किस्से सुनाया करते थे उनसे वह बहुत ज्यादा डर गया था। कभी-कभी मुझसे उल्टी-सीधी बातें किया करता था। मैं झुंझलाता था और उसे चुप करा देता था लेकिन उसकी जिज्ञासाएं शांत नहीं हो पाती थीं। एक दिन पूछने लगा, ‘बड़े भाई पाकिस्तान में भी मिट्टी होती है क्या?’

‘क्यों, वहां मिट्टी क्यों न होगी।’ ‘सड़क ही सड़क नहीं है…वहां टेरीलीन मिलता है…वहां सस्ती है… र ‘देखो ये सब बातें मनगढ़ंत हैं….तुम अल्ताफ़ वग़ैरा की बातों पर कान न दिया करो।’ मैंने उसे समझाया।
‘बड़े भाई क्या हिंदू आंखें निकाल लेते हैं. . .’ ‘बकवास है. . .ये तुमसे किसने कहा? ‘बच्छन ने।’ ‘गल़त है।’ ‘तो ख़ाल भी नहीं खींचते?’ ‘ओफ़्फोह. . .ये तुमने क्या लगा रखी है. . .’

वह चुप हो गया लेकिन उसकी आंखों में सैकड़ों सवाल थे। मैं बाहर चला गया। वह सफिया से इसी तरह की बातें करने लगा।

कर्फ्यू लंबा होता चला गया। रात की गश्त जारी रही। हमारी घर से सैफ ही जाता रहा। कुछ दिनों बाद एक दिन अचानक सोते में सैफ चीखने लगा था। हम सब घबरा गए लेकिन ये समझने में देर नहीं लगी कि ये सब उसे डराए जाने की वजह से है। अब्बाजान को लड़कों पर बहुत गुस्सा आया था और उन्होंने मोहल्ले के एक-दो बुजुर्गनुमा लोगों से कहा भी, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। लड़के और वो भी मोहल्ले के लड़के किसी मनोरंजन से क्यों कर हाथ धी लेते?
बात कहां से कहां तक पहुंच चुकी है इसका अंदाज़ा मुझे उस वक़्त तक न था जब तक एक दिन सैफ ने बड़ी गंभीरता से मुझसे पूछा, ‘बड़े भाई, मैं हिंदू हो जाउं?’ सवाल सुनकर मैं सन्नाटे में आ गया, लेकिन जल्दी ही समझ गया कि यह रात में डरावने किस्से सुनाए जाने का नतीजा है। मुझे गुस्सा आ गया फिर सोचा पागल पर गुस्सा करने से अच्छा है गुस्सा पी जाउं और उसे समझाने की कोशिश करूं। मैंने कहा, ‘क्यों तुम हिंदू क्यों होना चाहते हो?’

‘इसका मतलब है मैं न बच पाउंगा,’ मैंने कहा। ‘तो आप भी हो जाइए. . .’, वह बोला। ‘और तुम्हारे ताया अब्बार, मैंने अपने वालिद और उसके चचा की बात की। ‘नहीं. ..उन्हें. . .’ वह कुछ सोचने लगा। अब्बाजान की सफेद और लंबी दाढ़ी में वह कहीं फंस गया होगा।
‘देखा ये सब लड़कों की खुराफ़ात है जो तुम्हें बहकाते हैं। ये जो तुम्हें बताते हैं सब झूठ है। अरे महेश को नहीं जानते?’ ‘वो जो स्कूटर पर आते हैं. . .’ वह खुश हो गया। ‘हां-हां वही।’ ‘वो हिंदू है?’
‘हां हिंदू है।’ मैंने कहा और उसके चेहरे पर पहले तो निराशा की हल्की-सी परछाईं उभरी फिर वह ख़ामोश हो गया। ‘ये सब गुंडे बदमाशों के काम हैं. . .न हिंदू लड़ते हैं और न मुसलमान. . .गुंडे लड़ते हैं, समझे?’

दंगा शैतान की आंत की तरह खिंचता चला गया और मोहल्ले में लोग तंग आने लगे- यार शहर में दंगा करने वाले हिंदू और मुसलमान बदमाशों को मिला भी दिया जाए तो कितने होंगे. . . ज्यादा से ज्यादा एक हज़ार, चलो दो हज़ार मान लो तो भाई दो हज़ार आदमी लाखों लोगों की जिंद़गी को जहन्नुम बनाए हुए हैं और हम लोग घरों में दुबके बैठे हैं। ये तो वही हुआ कि दस हज़ार अंग्रेज़ करोड़ों हिंदुस्तानियों पर हुकूमत किया करते थे और सारा निज़ाम उनके तहत चलता रहता था और फिर इन दंगों से फ़ायदा किसका है, फ़ायदा? अजी हाजी अब्दुल करीम को फ़ायदा है जो चुंगी का इलेक्शन लड़ेगा और उसे मुसलमान वोट मिलेंगे। पंडित जोगेश्वर को है जिन्हें हिंदुओं के वोट मिलेंगे, अब तो हम क्या हैं? तुम वोटर हो, हिंदू वोटर, मुसलमान वोटर, हरिजन वोटर, कायस्थ वोटर, सुन्नी वोटर, शिआ वोटर, यही सब होता रहेगा इस देश में? हां क्यों नहीं? जहां लोग ज़ाहिल हैं, जहां किराये के हत्यारे मिल जाते हैं, जहां पॉलीटीशियन अपनी गद्दियों के लिए दंगे कराते हैं वहां और क्या हो सकता है? यार क्या हम लोगों को पढ़ा नहीं सकते? समझा नहीं सकते? हा-हा-हा-हा तुम कौन होते हो पढ़ाने वाले, सरकार पढ़ाएगी, अगर चाहेगी तो सरकार न चाहे तो इस देश में कुछ नहीं हो सकता? हां. . .अंग्रेजों ने हमें यही सिखाया है. . .हम इसके आदी हैं. . .चलो छोड़ो, तो दंगे होते रहेंगे? हां, होते रहेंगे? मान लो इस देश के सारे मुसलमान हिंदु हो जाएं? लाहौलविलाकुव्वत ये क्या कह रहे हो। अच्छा मान लो इस देश के सारे हिंदू मुसलमान हो जाएं? सुभान अल्लाह . . .वाह वाह क्या बात कही है. . .तो क्या दंगे रुक जाएंगे? ये तो सोचने की बात है. . .पाकिस्तान में शिआ सुन्नी एक दूसरे की जान के दुश्मन हैं. . .बिहारी में ब्राह्मण हरिजन की छाया से बचते हैं. . .तो क्या यार आदमी या कहो इंसान साला है ही ऐसा कि जो लड़ते ही रहना चाहता है? वैसे देखो तो जुम्मन और मैकू में बड़ी दोस्ती है। तो यार क्यों न हम मैकू और जुम्मन बन जाएं. . .वाह क्या बात कह दी, मलतब. . .मतलब. . .मतलब. . .
मैं सुबह-सुबह रेडियो के कान उमेठ रहा था सफिया झाडू दे रही थी कि राजा का छोटा भाई अकरम भागता हुआ आया और फलती हुई सांस को रोकने की नाकाम कोशिश करता हुआ बोला, ‘सैफ को पी.ए.सी. वाले मार रहे हैं।’

‘क्या? क्या कह रहे हो?’ ‘सैफ को पीएसी वाले मार रहे हैं’, वह ठहरकर बोला। ‘क्यों मार रहे हैं? क्या बात है?’ ‘पता नहीं. . .नुक्कड़ पर. . .’ ‘वहीं जहां पीएसी की चौकी है?’ ‘हां वहीं।’

‘लेकिन क्यों. . .’ मुझे मालूम था कि आठ बजे से दस बजे तक कर्फ्यू खुलने लगा है और सैफ को आठ बजे के करीब अम्मां ने दूध लेने भेजा था। सैफ जैसे पगले तक को मालूम था कि उसे जल्दी से जल्दी वापस आना है और अब दो दस बजे गए थे।

‘चलो मैं चलता हूं’ रेडियो से आती बेढंगी आवाज़ की फिक्र किए बग़ैर मैं तेजी से बाहर निकला। पागल को क्यों मार रहे हैं पीएसी वाले, उसने कौन-सा ऐसा जुर्म किया है? वह कर ही क्या सकता है? खुद ही इतना खौफज़दा रहता है उसे मारने की क्या ज़रूरत है. . .फिर क्या वजह हो सकती है? पैसा, अरे उसे तो अम्मां ने दो रुपए दिए थे। दो रुपए के लिए पीएसी वाले उसे क्यों मारेंगे?

नुक्कड़ पर मुख्य सड़क के बराबर कोठों पर मोहल्ले के कुछ लोग जमा था। सामने सैफ पीएसी वालों के सामने खड़ा था। उसके सामने पीएसी के जवान थे। सैफ जोर-जोर से चीख़ रहा था, ‘मुझे तुम लोगों ने क्यों मारा. . .मैं हिंदू हूं. . .हिंदू हूं. . .’

मैं आगे बढ़ा। मुझे देखने के बाद भी सैफ रुका नहीं वह कहता रहा, ‘हां, हां मैं हिंदू हूं. . .’ वह डगमगा रहा था। उसके होंठों के कोने से ख़ून की एक बूंद निकलकर ठोढ़ी पर ठहर गई थी। ‘तुमने मुझे मारा कैसे. . .मैं हिंदू. . .’ ‘सैफ. . .ये क्या हो रहा है. . .घर चलो’ ‘मैं. . .मैं हिंदू हूं।’ मुझे बड़ी हैरत हुई. . .अरे क्या ये वही सैफ है जो था. . .इसकी तो काया पलट कई है। ये इसे हो क्या गया। ‘सैफ होश में आओ’ मैंने उसे ज़ोर से डांटा।
मोहल्ले के दूसरे लोग पता नहीं किस पर अंदर ही अंदर दूर से हंस रहे थे। मुझे गुस्सा आया। साले ये नहीं समझते कि वह पागल है। ‘ये आपका कौन है?’ एक पीएसी वाले ने मुझसे पूछा। ‘मेरा भाई है. . . थोड़ी मेंटल प्राब्लम है इसे’ ‘तो इसे घर ले जाओ,’ एक सिपाही बोला।

‘हमें पागल बना दिया,’ दूसरे ने कहा। ‘चलो. . .सैफ घर चलो। कर्फ्यू लग गया है. . .कर्फ्यू. . .’ ‘नहीं जाउंगा. . .मैं हिंदू हूं. ..हिंदू. . .मुझे. . .मुझे. . .’ वह फट-फटकर रोने लगा. . .’मारा. . .मुझे मारा. . .मुझे मारा. . .मैं हिंदू हूं. . .मैं’ सैफ धड़ाम से ज़मीन पर गिरा. . .शायद बेहोश हो गया था. . .अब उसे उठाकर ले जाना आसान था।