चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

परिताप – कविता वाचक्नवी फ़रवरी 8, 2009

Filed under: कविता वाचक्नवी — Satish Chandra Satyarthi @ 9:28 अपराह्न
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ढूँढता है ठौर
यह दोने धरा
दीपक कँपीला ,
ठेलते दोनों किनारे के
थपेड़े।
( ठिठक कर )
छल – छद्म – तर्पण के बहाने
ला बहाना धार में
अच्छा चलन है ।
क्या करे ?
जाए कहाँ ?
बस डूबना तय है ……… सुनिश्चित ।

इस किनारे पर
खड़ी है भीड़ सब ,
जो उसे ढरका, सिरा, लहरों – लहर
लौट जाती है
उन्हीं रंगीनियों में,
उस किनारे पर
मचलती आँधियाँ, तूफान, बरखा
के बवण्डर,
बीच का विस्तार
नदिया का
भँवर का
लीलने को, निगलने को
आज बाँहें खोल पसरा।

जल, तनिक तू और जल
दीपक ! न डर जल से,
सोख लेगा
यह भयंकर जल
तुम्हारी
जलन के परिताप सारे,
लील लेगा
और जलने की समूची
वेदना में
जल भरेगा ।

जल मिटो
जल में मिटो
बस मिट चलो
दीपक हमारे !
मेट कर माटी करो
त्रय – ताप सारे ।

16 नवंबर 2007

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माँ – कविता वाचक्नवी

Filed under: कविता वाचक्नवी — Satish Chandra Satyarthi @ 5:26 अपराह्न
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माँ
तुम्हारी लोरी नहीं सुनी मैंने,
कभी गाई होगी
याद नहीं
फिर भी जाने कैसे
मेरे कंठ से
तुम झरती हो।

तुम्हारी बंद आँखों के सपने
क्या रहे होंगे
नहीं पता
किंतु मैं
खुली आँखों
उन्हें देखती हूँ ।

मेरा मस्तक
सूँघा अवश्य होगा तुमने
मेरी माँ !
ध्यान नहीं पड़ता
परंतु
मेरे रोम- रोम से
तुम्हारी कस्तूरी फूटती है ।

तुम्हारा ममत्व
भरा होगा लबालब
मोह से,
मेरी जीवनासक्ति
यही बताती है ।
और
माँ !
तुमने कई बार

छुपा-छुपी में
ढूँढ निकाला होगा मुझे
पर मुझे
सदा की
तुम्हारी छुपा-छुपी
बहुत रुलाती है;
बहुत-बहुत रुलाती है ;
माँ !!!

16 नवंबर 2007

 

घर : दस भावचित्र – कविता वाचक्नवी

1
ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं
घर हैं-  हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।

2
आज मेरी
बाँह में
घर आ गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक
नीली छत तले।

3
चिटखती उन लकड़ियों की
गंध की
रोटी मिले
दूर से
घर
लौटने को
हुलसता है मन बहुत।

4
सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं
आँखों में
औ’
नींद नहीं आती।

5
जब
विवशता हो गए
संबंध
तो फिर
घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे
प्रतिबंध
तो फिर
घर कहाँ?

6
अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।

7
लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।

8
घर रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उँगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहंदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।

9
नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय! रास्ता दूजा नहीं।

10
साँसों की आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।

9 जुलाई 2007

 

मैं कुछ नहीं भूली — कविता वाचक्नवी

Filed under: कविता वाचक्नवी — Satish Chandra Satyarthi @ 12:14 अपराह्न
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सब याद है मुझे
हमारे आँगन का ‘नलका’
‘खुरे’ में बैठ
‘मौसी’ का बर्तन माँजना
डिब्बे में राख रख
इक जटा- सी हाथ पकड़।

काले हाथों पर
लकड़ियों के चूल्हे की
सारी कालिख……
याद है मुझे ।

जाने कितने घरों में काम करती थी ‘मौसी’
मेरे मुँह ‘बर्तनोंवाली’ सुन
‘मौसी’ का गुस्सा
गुस्से में बड़- बड़
याद है मुझे।
फिर कभी ‘मौसी’ कहना
नहीं भूले हम।

आज लगता है –
मैंने उसका दिल गल – घिसाया था।
पूस माघ की ठण्डी रातें
‘मौसी’ के गले हाथ
सब याद है मुझे।

स्कूल के बाहर
छाबड़ी-सी ले
चूरन बेचता ‘मौसी’ का पति
आधी राह छोड़ चला गया ;
तीन-तीन बेटियों का विवाह
सब याद है मुझे।

मुझे ब्याह की असीस
“जीती रह मेरी बच्ची”
‘मौसी’ का दुपट्टा
हाथ-पोंछते हाथ
सब याद है मुझे।

16 नवंबर 2007

 

मैंने दीवारों से पूछा – कविता वाचक्नवी

Filed under: कविता वाचक्नवी — Satish Chandra Satyarthi @ 6:30 पूर्वाह्न

चिह्नों भरी दीवारों से पूछा मैंने
किसने तुम्हें छुआ कब – कब
बतलाओ तो
वे बदरंग, छिली – खुरचीं- सी
केवल इतना कह पाईं
हम तो
पूरी पत्थर- भर हैं
जड़ से
जन से
छिजी हुईं
कौन, कहाँ, कब, कैसे
दे जाता है
अपने दाग हमें
त्यौहारों पर कभी
दिखावों की घड़ियों पर कभी – कभी
पोत- पात, ढक – ढाँप – ढूँप झट
खूब उल्लसित होता है
ऐसे जड़ – पत्थर ढाँचों से
आप सुरक्षा लेता है
और ठुँकी कीलों पर टाँगे
कैलेंडर की तारीख़ें
बदली – बदली देख समझता
इन पर इतने दिन बदले।

16 नवंबर 2007