चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट फ़रवरी 1, 2009

: ——– सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

आम आदमी पर अक्सर जागरूक न होने और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होने के आरोप लगाए जाते हैं .
इन तमाम आरोपों का जवाब देती है यह छोटी सी कविता .


गोली खाकर
एक के मुँह से निकला-
‘राम’।

दूसरे के मुँह से निकला-
‘माओ’।

लेकिन
तीसरे के मुँह से निकला-
‘आलू’।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।

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जंगल की याद मुझे मत दिलाओ – सर्वेश्वरदयाल सक्सेना नवम्बर 14, 2008

कुछ धुआँ

कुछ लपटें

कुछ कोयले

कुछ राख छोड़ता

चूल्हे में लकड़ी की तरह मैं जल रहा हूँ,

मुझे जंगल की याद मत दिलाओ!
हरे —भरे जंगल की

जिसमें मैं सम्पूर्ण खड़ा था

चिड़ियाँ मुझ पर बैठ चहचहाती थीं

धामिन मुझ से लिपटी रहती थी

और गुलदार उछलकर मुझ पर बैठ जाता था.

जँगल की याद

अब उन कुल्हाड़ियों की याद रह गयी है

जो मुझ पर चली थीं

उन आरों की जिन्होंने

मेरे टुकड़े—टुकड़े किये थे

मेरी सम्पूर्णता मुझसे छीन ली थी !

चूल्हे में

लकड़ी की तरह अब मैं जल रहा हूँ

बिना यह जाने कि जो हाँडी चढ़ी है

उसकी खुदबुद झूठी है

या उससे किसी का पेट भरेगा

आत्मा तृप्त होगी,

बिना यह जाने

कि जो चेहरे मेरे सामने हैं

वे मेरी आँच से

तमतमा रहे हैं

या गुस्से से,

वे मुझे उठा कर् चल पड़ेंगे

या मुझ पर पानी डाल सो जायेंगे.

मुझे जंगल की याद मत दिलाओ!

एक—एक चिनगारी

झरती पत्तियाँ हैं

जिनसे अब भी मैं चूम लेना चाहता हूँ

इस धरती को

जिसमें मेरी जड़ें थीं!