चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

एक वाक्य – धर्मवीर भारती फ़रवरी 8, 2009

Filed under: डॉ. धर्मवीर भारती — Satish Chandra Satyarthi @ 9:32 अपराह्न
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चेक बुक हो पीली या लाल,
दाम सिक्के हों या शोहरत –
कह दो उनसे
जो ख़रीदने आए हों तुम्हें
हर भूखा आदमी बिकाऊ नहीं होता है!

१४ जुलाई २००८

 

विदा देती एक दुबली बाँह – धर्मवीर भारती

Filed under: डॉ. धर्मवीर भारती — Satish Chandra Satyarthi @ 4:31 अपराह्न
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विदा देती एक दुबली बाँह-सी यह मेड़
अंधेरे में छूटते चुपचाप बूढ़े पेड़

ख़त्म होने को ना आएगी कभी क्या
एक उजड़ी माँग-सी यह धूल धूसर राह?
एक दिन क्या मुझी को पी जाएगी
यह सफ़र की प्यास, अबुझ, अथाह?

क्या यही सब साथ मेरे जाएँगे
ऊँघते कस्बे, पुराने पुल?
पाँव में लिपटी हुई यह धनुष-सी दुहरी नदी
बींध देगी क्या मुझे बिलकुल?

१४ जुलाई २००८

 

क्या इनका कोई अर्थ नहीं – धर्मवीर भारती


ये शामें, सब की शामें…
जिनमें मैंने घबरा कर तुमको याद किया
जिनमें प्यासी सीपी-सा भटका विकल हिया
जाने किस आने वाले की प्रत्याशा में

ये शामें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

वे लमहें
वे सूनेपन के लमहें
जब मैंने अपनी परछाई से बातें की
दुख से वे सारी वीणाएँ फेकीं
जिनमें अब कोई भी स्वर न रहे

वे लमहें
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

वे घड़ियाँ, वे बेहद भारी-भारी घड़ियाँ
जब मुझको फिर एहसास हुआ
अर्पित होने के अतिरिक्त कोई राह नहीं
जब मैंने झुककर फिर माथे से पंथ छुआ
फिर बीनी गत-पाग-नूपुर की मणियाँ

वे घड़ियाँ
क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

ये घड़ियाँ, ये शामें, ये लमहें
जो मन पर कोहरे से जमे रहे
निर्मित होने के क्रम में

क्या इनका कोई अर्थ नहीं?

जाने क्यों कोई मुझसे कहता
मन में कुछ ऐसा भी रहता
जिसको छू लेने वाली हर पीड़ा
जीवन में फिर जाती व्यर्थ नहीं

अर्पित है पूजा के फूलों-सा जिसका मन
अनजाने दुख कर जाता उसका परिमार्जन
अपने से बाहर की व्यापक सच्चाई को
नत-मस्तक होकर वह कर लेता सहज ग्रहण

वे सब बन जाते पूजा गीतों की कड़ियाँ
यह पीड़ा, यह कुण्ठा, ये शामें, ये घड़ियाँ

इनमें से क्या है
जिनका कोई अर्थ नहीं!

कुछ भी तो व्यर्थ नहीं!

१४ जुलाई २००८

 

आँगन – डॉ. धर्मवीर भारती

Filed under: डॉ. धर्मवीर भारती — Satish Chandra Satyarthi @ 7:30 पूर्वाह्न

बरसों के बाद उसी सूने- आँगन में
जाकर चुपचाप खड़े होना
रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना
मन का कोना-कोना

कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना
फिर आकर बाँहों में खो जाना
अकस्मात मण्डप के गीतों की लहरी
फिर गहरा सन्नाटा हो जाना
दो गाढ़ी मेंहदीवाले हाथों का जुड़ना,
कँपना, बेबस हो गिर जाना

रिसती-सी यादों से पिरा-पिरा उठना
मन को कोना-कोना
बरसों के बाद उसी सूने-से आँगन में
जाकर चुपचाप खड़े होना!

१४ जुलाई २००८

 

टूटा पहिया – डॉ. धर्मवीर भारती

Filed under: डॉ. धर्मवीर भारती — Satish Chandra Satyarthi @ 5:30 पूर्वाह्न

मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत!

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय!

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े-बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज़ को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें
तब मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ!
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!

१४ जुलाई २००८

 

थके हुए कलाकार से – डॉ. धर्मवीर भारती

Filed under: डॉ. धर्मवीर भारती — Satish Chandra Satyarthi @ 4:08 पूर्वाह्न

सृजन की थकन भूल जा देवता!
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अभी तो पलक में नहीं खिल सकी
नवल कल्पना की मृदुल चाँदनी,
अभी अधखिली ज्योत्स्ना की कली
नहीं जिन्दगी की सुरभि में सनी!

अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अधूरी धरा पर नहीं है कहीं
अभी स्वर्ग की नींव का भी पता।
सृजन की थकन भूल जा देवता!

रुका तू, गया रुक जगत का सृजन,
तिमिरमय नयन में डगर भूल कर
कहीं खो गई रोशनी की किरन
अलस बादलों में कहीं सो गया
नई सृष्टि का सात-रंगी सपन
रुका तू, गया रुक जगत का सृजन,
अधूरे सृजन से निराशा भला
किसलिए जब अधूरी स्वयं पूर्णता?
सृजन की थकन भूल जा देवता!

प्रलय से निराशा तुझे हो गयी,
सिसकती हुई साँस की जालियों में
सबल प्राण की अर्चना खो गयी
थके बहुओं में अधूरी प्रलय
औ’ अधूरी सृजन-योजना सो गयी
थकन से निराशा तुझे हो गयी?
इसी ध्वंस में मूर्छिता-सी कहीं
पड़ी हो नई जिन्दगी, क्या पता?
सृजन की थकन भूल जा देवता!