चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

दो दिलों के दरमियाँ फ़रवरी 20, 2009

Filed under: कुंवर बेचैन — Satish Chandra Satyarthi @ 6:18 पूर्वाह्न
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—             कुंवर बेचैन

दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक

हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक

जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक

फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक

 

One Response to “दो दिलों के दरमियाँ”

  1. sameer lal Says:

    डॉ बेचैन साहब का अंदाज ही निराला है. आभार इस प्रस्तुति का.


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