चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

थके हुए कलाकार से – डॉ. धर्मवीर भारती फ़रवरी 8, 2009

Filed under: डॉ. धर्मवीर भारती — Satish Chandra Satyarthi @ 4:08 पूर्वाह्न

सृजन की थकन भूल जा देवता!
अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अभी तो पलक में नहीं खिल सकी
नवल कल्पना की मृदुल चाँदनी,
अभी अधखिली ज्योत्स्ना की कली
नहीं जिन्दगी की सुरभि में सनी!

अभी तो पड़ी है धरा अधबनी,
अधूरी धरा पर नहीं है कहीं
अभी स्वर्ग की नींव का भी पता।
सृजन की थकन भूल जा देवता!

रुका तू, गया रुक जगत का सृजन,
तिमिरमय नयन में डगर भूल कर
कहीं खो गई रोशनी की किरन
अलस बादलों में कहीं सो गया
नई सृष्टि का सात-रंगी सपन
रुका तू, गया रुक जगत का सृजन,
अधूरे सृजन से निराशा भला
किसलिए जब अधूरी स्वयं पूर्णता?
सृजन की थकन भूल जा देवता!

प्रलय से निराशा तुझे हो गयी,
सिसकती हुई साँस की जालियों में
सबल प्राण की अर्चना खो गयी
थके बहुओं में अधूरी प्रलय
औ’ अधूरी सृजन-योजना सो गयी
थकन से निराशा तुझे हो गयी?
इसी ध्वंस में मूर्छिता-सी कहीं
पड़ी हो नई जिन्दगी, क्या पता?
सृजन की थकन भूल जा देवता!

 

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