चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

मैंने दीवारों से पूछा – कविता वाचक्नवी फ़रवरी 8, 2009

Filed under: कविता वाचक्नवी — Satish Chandra Satyarthi @ 6:30 पूर्वाह्न

चिह्नों भरी दीवारों से पूछा मैंने
किसने तुम्हें छुआ कब – कब
बतलाओ तो
वे बदरंग, छिली – खुरचीं- सी
केवल इतना कह पाईं
हम तो
पूरी पत्थर- भर हैं
जड़ से
जन से
छिजी हुईं
कौन, कहाँ, कब, कैसे
दे जाता है
अपने दाग हमें
त्यौहारों पर कभी
दिखावों की घड़ियों पर कभी – कभी
पोत- पात, ढक – ढाँप – ढूँप झट
खूब उल्लसित होता है
ऐसे जड़ – पत्थर ढाँचों से
आप सुरक्षा लेता है
और ठुँकी कीलों पर टाँगे
कैलेंडर की तारीख़ें
बदली – बदली देख समझता
इन पर इतने दिन बदले।

16 नवंबर 2007

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