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गये दिनों का सुराग़ लेकर फ़रवरी 3, 2009

Filed under: नासिर काज़मी — Satish Chandra Satyarthi @ 1:06 अपराह्न
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रचनाकार: नासिर काज़मी

गये दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो
ख़ुशी की रुत हो के ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँढती है हर दम
वो बू-ए-गुल था के नग़्मा-ए-जान मेरे तो दिल में उतर गया वो
वो मैकदे को जगानेवाला वो रात की नींद उड़ानेवाला
न जाने क्या उस के जी में आई कि शाम होते ही घर गया वो
कुछ अब सम्भलने लगी है जाँ भी बदल चला रन्ग आस्माँ भी
जो रात भारी थी टल गई है जो दिन कड़ा था गुज़र गया वो
शिकस्त पा राह में खड़ा हूँ गये दिनों को बुला रहा हूँ
जो क़ाफ़िला मेरा हमसफ़र था मिस्ल-ए-गर्द-ए-सफ़र गया वो
बस एक मन्ज़िल है बुलहवस की हज़ार रस्ते हैं अहल-ए-दिल के
ये ही तो है फ़र्क़ मुझ में उस में गुज़र गया मैं ठहर गया वो
वो जिस के शाने पे हाथ रख कर सफ़र किया तूने मन्न्ज़िलों का
तेरी गली से न जाने क्यूँ आज सर झुकाये गुज़र गया वो
वो हिज्र कि रात का सितार वो हमनफ़स हमसुख़न हमारा
सदा रहे उस का नाम प्यारा सुना है कल रात मर गया वो
बस एक मोती सी छब दिखाकर बस एक मीठी सी धुन सुना कर
सितारा-ए-शाम बन के आया बरंग-ए-ख़याल-ए-सहर गया वो
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो
वो रात का बेनवा मुसाफ़िर वो तेरा शायर वो तेरा “नासिर”
तेरी गली तक तो हम ने देखा फिर न जाने किधर गया वो

 

One Response to “गये दिनों का सुराग़ लेकर”

  1. This is very beautiful poetry Nasir Sahab.. I really wish to talk to you. Please add me on Facebook .. I have left the link below for my FB account. Many Thanks


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