चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

सब बुझे दीपक जला लूँ – महादेवी वर्मा फ़रवरी 2, 2009

Filed under: महादेवी वर्मा — Satish Chandra Satyarthi @ 9:18 पूर्वाह्न

काव्य संग्रह दीपशिखा से

सब बुझे दीपक जला लूं
घिर रहा तम आज दीपक रागिनी जगा लूं

क्षितिज कारा तोडकर अब
गा उठी उन्मत आंधी,
अब घटाओं में न रुकती
लास तन्मय तडित बांधी,
धूल की इस वीणा पर मैं तार हर त्रण का मिला लूं!

भीत तारक मूंदते द्रग
भ्रान्त मारुत पथ न पाता,
छोड उल्का अंक नभ में
ध्वंस आता हरहराता
उंगलियों की ओट में सुकुमार सब सपने बचा लूं!

लय बनी मृदु वर्तिका
हर स्वर बना बन लौ सजीली,
फैलती आलोक सी
झंकार मेरी स्नेह गीली
इस मरण के पर्व को मैं आज दीवाली बना लूं!

देखकर कोमल व्यथा को
आंसुओं के सजल रथ में,
मोम सी सांधे बिछा दीं
थीं इसी अंगार पथ में
स्वर्ण हैं वे मत कहो अब क्षार में उनको सुला लूं!

अब तरी पतवार लाकर
तुम दिखा मत पार देना,
आज गर्जन में मुझे बस
एक बार पुकार लेना
ज्वार की तरिणी बना मैं इस प्रलय को पार पा लूं!
आज दीपक राग गा लूं!

 

3 Responses to “सब बुझे दीपक जला लूँ – महादेवी वर्मा”

  1. paramjitbali Says:

    बढिया रचना प्रेषित की है।

  2. Annapurna Says:

    बहुत अच्छी कविता !

  3. ranjana Says:

    कोटिशः आभार, इस अद्भुत अतिसुन्दर रचना को पढ़वाने के लिए.
    रचना की प्रशंशा में क्या कहूँ…….सूर्य को दिया दिखने वाली बात होगी.


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