चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए फ़रवरी 2, 2009

Filed under: दुष्यन्त कुमार — Satish Chandra Satyarthi @ 9:30 पूर्वाह्न
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—–   –     दुष्यन्त कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

– दुष्यन्त कुमार

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One Response to “हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए”

  1. Ishwar Dhamu Says:

    Ye KAVITA nahi hai, ye to shabado ka jwalamukhi hai jo Dushyant Jee ke dil se VYAVASTHA ke khilaf futa hai.


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