चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

तोड़ती पत्थर – “निराला” फ़रवरी 1, 2009

Filed under: निराला — Satish Chandra Satyarthi @ 12:36 अपराह्न
Tags:

वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर –
वह तोड़ती पत्थर।

नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार बार प्रहार –
सामने तरु मालिका अट्टलिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप,
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिंदी छा गई
प्राय: हुई दोपहर –
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा, मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्न तार,
देख कर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से,
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहम सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक छन के बाद वह काँपी सुघर
ढुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा –
“मैं तोड़ती पत्थर।”

 

3 Responses to “तोड़ती पत्थर – “निराला””

  1. Shreedutta Tiwari Says:

    Sadabahar….

  2. निराला जी की इस कालजयी रचना के लिये आभार.

  3. shashannk Says:

    where can i get the summary of this poem??pls help soon!!

    –>is kavita ka saranksh kahaan par mila ja sakta hai??krupya kar,shighr batain.


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s