चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

गाँव – सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ फ़रवरी 1, 2009

गाँव

मूत और गोबर की सारी गंध उठाए
हवा बैल के सूजे कंधे से टकराए
खाल उतारी हुई भेड़-सी
पसरी छाया नीम पेड़ की।
डॉय-डॉय करते डॉगर के सींगों में
आकाश फँसा है।

दरवाज़े पर बँधी बुढ़िया
ताला जैसी लटक रही है।
(कोई था जो चला गया है)
किसी बाज पंजों से छूटा ज़मीन पर
पड़ा झोपड़ा जैसे सहमा हुआ कबूतर
दीवारों पर आएँ-जाएँ
चमड़ा जलने की नीली, निर्जल छायाएँ।

चीखों के दायरे समेटे
ये अकाल के चिह्न अकेले
मनहूसी के साथ खड़े हैं
खेतों में चाकू के ढेले।
अब क्या हो, जैसी लाचारी
अंदर ही अंदर घुन कर दे वह बीमारी।

इस उदास गुमशुदा जगह में
जो सफ़ेद है, मृत्युग्रस्त है

जो छाया है, सिर्फ़ रात है
जीवित है वह – जो बूढ़ा है या अधेड़ है
और हरा है – हरा यहाँ पर सिर्फ़ पेड़ है

चेहरा-चेहरा डर लगता है
घर बाहर अवसाद है
लगता है यह गाँव नरक का
भोजपुरी अनुवाद है।

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4 Responses to “गाँव – सुदामा पांडेय ‘धूमिल’”

  1. सुंदर कविता है. सतीश जी आपका मेरा ब्लॉग पर सादर निमत्रण है.मैं पटना जिले के पुराने फतुहा अंचल और (वर्तमान दनियावां अंचल ) के सूदूर देहाती गाँव खरभैया का रहने वाला हूँ.यह फतुहा इस्लामपुर रेलवे लाइन के सिंगारियावान स्टेशन से ५ कम पश्चिम है.आप जेवारी हैं इसी वजह से विस्तार से बता रहा हूँ . आज से २५ साल पहले मैं भी जे एन यू , बरसता डी यू पहुंचा .५ साल के जेएनयू प्रवास का निचोड़ यह की अगर नहीं पंहुचता तो जिंदगी भर अफ़सोस में जीता . जैसे की उस महान फ्रेंच कवि ने फ्रेंच क्रांति के सन्दर्भ में कहा था की ” it was bliss to be there and divine to be young “. मैं CESP से अर्थशास्त्र से MA और एम् .फिल किया . अभी भारत सरकार की नौकरी में हूँ और तीन साल से दिल्ली में पदस्थापित हूँ . खैर जेएनयू के बारे में फिर कभी . मगध क्षेत्र के जन जीवन , भाषा , इतिहास , समाजशास्त्र और राग रंग पर ,ऐसा लगता है की बहुत कम काम हुआ है.आईये और हम सब सहभागी बने .

  2. satishji you are invited to my blog magahdes.blogspot .com

  3. धूमिल ने अपने समय में रचनाधर्मिता को नई परिभाषा दी थी. यह कविता इस बात की एक बानगी है.


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