चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

गाँव – सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ फ़रवरी 1, 2009

गाँव

मूत और गोबर की सारी गंध उठाए
हवा बैल के सूजे कंधे से टकराए
खाल उतारी हुई भेड़-सी
पसरी छाया नीम पेड़ की।
डॉय-डॉय करते डॉगर के सींगों में
आकाश फँसा है।

दरवाज़े पर बँधी बुढ़िया
ताला जैसी लटक रही है।
(कोई था जो चला गया है)
किसी बाज पंजों से छूटा ज़मीन पर
पड़ा झोपड़ा जैसे सहमा हुआ कबूतर
दीवारों पर आएँ-जाएँ
चमड़ा जलने की नीली, निर्जल छायाएँ।

चीखों के दायरे समेटे
ये अकाल के चिह्न अकेले
मनहूसी के साथ खड़े हैं
खेतों में चाकू के ढेले।
अब क्या हो, जैसी लाचारी
अंदर ही अंदर घुन कर दे वह बीमारी।

इस उदास गुमशुदा जगह में
जो सफ़ेद है, मृत्युग्रस्त है

जो छाया है, सिर्फ़ रात है
जीवित है वह – जो बूढ़ा है या अधेड़ है
और हरा है – हरा यहाँ पर सिर्फ़ पेड़ है

चेहरा-चेहरा डर लगता है
घर बाहर अवसाद है
लगता है यह गाँव नरक का
भोजपुरी अनुवाद है।

 

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट

: ——– सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

आम आदमी पर अक्सर जागरूक न होने और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होने के आरोप लगाए जाते हैं .
इन तमाम आरोपों का जवाब देती है यह छोटी सी कविता .


गोली खाकर
एक के मुँह से निकला-
‘राम’।

दूसरे के मुँह से निकला-
‘माओ’।

लेकिन
तीसरे के मुँह से निकला-
‘आलू’।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
कि पहले दो के पेट
भरे हुए थे।

 

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

Filed under: गुलज़ार — Satish Chandra Satyarthi @ 7:29 अपराह्न
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::————————  गुलज़ार

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं

एक है जिसका सर नवें बादल में है

दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है

एक है जो सतरंगी थाम के उठता है

दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है

फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा

एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है

‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है

हिंदुस्तान उम्मीद से है!

आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है

सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है

साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है

अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!

हिन्दोस्तान उम्मीद से है..

 

हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

Filed under: Uncategorized — Satish Chandra Satyarthi @ 4:24 अपराह्न
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यह भोजपुरी लोकगीत एक समय में बिहार के हर गाँव में बच्चे से लेकर बूढों तक के बीच में बहुत ही लोकप्रिय हुआ करता था.
आज गाँव गाँव तक सीडी और टीवी की पहुँच के कारण लोग इसे भूल से गए हैं .
पुरानी यादों को एक बार फ़िर से ताज़ा करने की कोशिश कर रहा हूँ .

रचनाकार: अज्ञात

हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

बर्बाद कजरवा हो गइले

बाहरे बलम बिना नींद ना आवे

बाहरे बलम बिना नींद ना आवे

उलझन में सवेरवा हो गइले


बिजुरी चमके देवा गर्जे घनघोर बदरवा हो गइले

पापी पपीहा बोलियाँ बोले पापी पपीहा बोलियाँ बोले

दिल धड़के सुवेरवा हो गइले

बाहरे बलम बिन नींद न आवे

उलझन में सुवेरवा हो गइले

आ……………………………..


अरे पहिले पहिले जब अइलीं गवनवा

सासू से झगड़ा हो गइले

बाकें बलम पर…अहा अहा

बांके बलम परदेसवा विराजें

उलझन में सुवेरवा हो गइले


हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

बर्बाद कजरवा हो गइले

 

नागार्जुन के दोहे – अन्नपचीसी से

सीधे सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़।
अन्नपचीसी खोल ले, अर्थ जान ले मूढ़।

कबिरा खड़ा बज़ार में लिए लुकाठी हाथ।
बंदा क्या घबराएगा जनता देगी साथ।

छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट।
मिल सकती कैसे भला अन्न चोर को छूट।

आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाश।
कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफाश।

नागार्जुन मुख से कढ़े साखी के ये बोल।
साथी को समझाइए रचना है अनमोल।

अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़ करोड़।
सचमुच ही लग जाएगी, आँख कान में होड़।

अन्न ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच।
औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच।

 

जरा छींक ही दो तुम – गुलज़ार

Filed under: गुलज़ार — Satish Chandra Satyarthi @ 2:33 अपराह्न
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Shivling.jpg

चिपचिपे दूध से नहलाते हैं

आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।

शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या

घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलसियाँ भर के


औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर

पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो

इक पथराई सी मुस्कान लिए

बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।


जब धुआँ देता, लगातार पुजारी

घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर

इक जरा छींक ही दो तुम,

तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

 

तोड़ती पत्थर – “निराला”

Filed under: निराला — Satish Chandra Satyarthi @ 12:36 अपराह्न
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वह तोड़ती पत्थर
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर –
वह तोड़ती पत्थर।

नहीं छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार बार प्रहार –
सामने तरु मालिका अट्टलिका, प्राकार।
चढ़ रही थी धूप,
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू,
रूई ज्यों जलती हुई भू
गर्द चिंदी छा गई
प्राय: हुई दोपहर –
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा, मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्न तार,
देख कर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से,
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहम सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक छन के बाद वह काँपी सुघर
ढुलक माथे से गिरे सीकर
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा –
“मैं तोड़ती पत्थर।”