चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

बच्चों के साथ क्या “न” करें : कुछ मजेदार कार्टून (भाग २) फ़रवरी 24, 2009

Filed under: हास्य-व्यंग्य — Satish Chandra Satyarthi @ 11:12 पूर्वाह्न
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पिछली पोस्ट की तस्वीरें भी देखें

 

बच्चों के साथ क्या “न” करें : कुछ मजेदार कार्टून फ़रवरी 23, 2009

Filed under: हास्य-व्यंग्य — Satish Chandra Satyarthi @ 7:53 अपराह्न
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कुछ और रोचक तस्वीरें आप कल की पोस्ट में देख सकते हैं। The fun contd………………….

आभार: ये सारी तस्वीरें David और Kelly Sopp की किताब
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भागी हुई लड़कियां फ़रवरी 20, 2009

Filed under: आलोक धन्वा — Satish Chandra Satyarthi @ 11:50 अपराह्न
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एक

घर की जंजीरें
कितना ज्यादा दिखाई पड़ती हैं
जब घर से कोई लड़की भागती है

क्या उस रात की याद आ रही है
जो पुरानी फिल्मों में बार-बार आती थी
जब भी कोई लड़की घर से भगती थी?
बारिश से घिरे वे पत्थर के लैम्पपोस्ट
महज आंखों की बेचैनी दिखाने भर उनकी रोशनी?

और वे तमाम गाने रजतपरदों पर दीवानगी के
आज अपने ही घर में सच निकले!

क्या तुम यह सोचते थे
कि वे गाने महज अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए
रचे गए?
और वह खतरनाक अभिनय
लैला के ध्वंस का
जो मंच से अटूट उठता हुआ
दर्शकों की निजी जिन्दगियों में फैल जाता था?

दो

तुम तो पढ कर सुनाओगे नहीं
कभी वह खत
जिसे भागने से पहले
वह अपनी मेज पर रख गई
तुम तो छुपाओगे पूरे जमाने से
उसका संवाद
चुराओगे उसका शीशा उसका पारा
उसका आबनूस
उसकी सात पालों वाली नाव
लेकिन कैसे चुराओगे
एक भागी हुई लड़की की उम्र
जो अभी काफी बची हो सकती है
उसके दुपट्टे के झुटपुटे में?

उसकी बची-खुची चीजों को
जला डालोगे?
उसकी अनुपस्थिति को भी जला डालोगे?
जो गूंज रही है उसकी उपस्थिति से
बहुत अधिक
सन्तूर की तरह
केश में

तीन

उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा !

लेकिन उसके भागने की बात
याद से नहीं जाएगी
पुरानी पवनचिक्कयों की तरह

वह कोई पहली लड़की नहीं है
जो भागी है
और न वह अन्तिम लड़की होगी
अभी और भी लड़के होंगे
और भी लड़कियां होंगी
जो भागेंगे मार्च के महीने में

लड़की भागती है
जैसे फूलों गुम होती हुई
तारों में गुम होती हुई
तैराकी की पोशाक में दौड़ती हुई
खचाखच भरे जगरमगर स्टेडियम में

चार

अगर एक लड़की भागती है
तो यह हमेशा जरूरी नहीं है
कि कोई लड़का भी भागा होगा

कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं
जिनके साथ वह जा सकती है
कुछ भी कर सकती है
महज जन्म देना ही स्त्री होना नहीं है

तुम्हारे उस टैंक जैसे बंद और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियां काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इजाजत नहीं दूंगा
कि तुम उसकी सम्भावना की भी तस्करी करो

वह कहीं भी हो सकती है
गिर सकती है
बिखर सकती है
लेकिन वह खुद शामिल होगी सब में
गलतियां भी खुद ही करेगी
सब कुछ देखेगी शुरू से अंत तक
अपना अंत भी देखती हुई जाएगी
किसी दूसरे की मृत्यु नहीं मरेगी

पांच

लड़की भागती है
जैसे सफेद घोड़े पर सवार
लालच और जुए के आरपार
जर्जर दूल्हों से
कितनी धूल उठती है

तुम
जो
पत्नियों को अलग रखते हो
वेश्याओं से
और प्रेमिकाओं को अलग रखते हो
पत्नियों से
कितना आतंकित होते हो
जब स्त्री बेखौफ भटकती है
ढूंढती हुई अपना व्यक्तित्व
एक ही साथ वेश्याओं और पत्नियों
और प्रमिकाओं में !

अब तो वह कहीं भी हो सकती है
उन आगामी देशों में
जहां प्रणय एक काम होगा पूरा का पूरा

छह

कितनी-कितनी लड़कियां
भागती हैं मन ही मन
अपने रतजगे अपनी डायरी में
सचमुच की भागी लड़कियों से
उनकी आबादी बहुत बड़ी है

क्या तुम्हारे लिए कोई लड़की भागी?

क्या तुम्हारी रातों में
एक भी लाल मोरम वाली सड़क नहीं?

क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गया?
क्या तुम उसे उठा लाए
अपनी हैसियत अपनी ताकत से?
तुम उठा लाए एक ही बार में
एक स्त्री की तमाम रातें
उसके निधन के बाद की भी रातें !

तुम नहीं रोए पृथ्वी पर एक बार भी
किसी स्त्री के सीने से लगकर

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
तुमसे नहीं कहा किसी स्त्री ने
सिर्फ आज की रात रुक जाओ
कितनी-कितनी बार कहा कितनी स्त्रियों ने दुनिया भर में
समुद्र के तमाम दरवाजों तक दौड़ती हुई आयीं वे

सिर्फ आज की रात रुक जाओ
और दुनिया जब तक रहेगी
सिर्फ आज की रात भी रहेगी

————————             ———–  आलोक धन्वा


 

कला क्या है

Filed under: रघुवीर सहाय — Satish Chandra Satyarthi @ 9:34 अपराह्न
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कितना दुःख वह शरीर जज़्ब कर सकता है ?
वह शरीर जिसके भीतर खुद शरीर की टूटन हो
मन की कितनी कचोट कुण्ठा के अर्थ समझ उनके द्वारा अमीर होता जा सकता है ?

अनुभव से समृद्ध होने की बात तुम मत करो
वह तो सिर्फ अद्वितीय जन ही हो सकते हैं
अद्वितीय याने जो मस्ती में रहते हैं चार पहर
केवल कभी चौंककर
अपने कुएँ में से झाँक लिया करते हैं
वह कुआँ जिसको हम लोग बुर्ज कहते हैं

अद्वितीय हर व्यक्ति जन्म से होता है
किन्तु जन्म के पीछे जीवन में जाने कितनों से यह
अद्वितीय होने का अधिकार
छीन लिया जाता है
और अद्वितीय फिर वे ही कहलाते हैं
जो जन के जीवन से अनजाने रहने में ही
रक्षित रहते हैं

अद्वितीय हर एक है मनुष्य
और उसका अधिकार अद्वितीय होने का छीनकर जो खुद को अद्वितीय कहते हैं
उनकी रचनाएँ हों या उनके हों विचार
पीड़ा के एक रसभीने अवलेह में लपेटकर
परसे जाते हैं तो उसे कला कहते हैं !

कला और क्या है सिवाय इस देह मन आत्मा के
बाकी समाज है
जिसको हम जानकर समझकर
बताते हैं औरो को, वे हमें बताते हैं

वे, जो प्रत्येक दिन चक्की में पिसने से करते हैं शुरू
और सोने को जाते हैं
क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें मार ड़ालना नहीं चाहती
वे तीन तकलीफ़ों को जानकर
उनका वर्णन नहीं करते हैं
वही है कला उनकी
कम से कम कला है वह
और दूसरी जो है बहुत सी कला है वह

कला बदल सकती है क्या समाज ?
नहीं, जहाँ बहुत कला होगी, परिवर्तन नहीं होगा।

———-                —         रघुवीर सहाय

 

करो हमको न शर्मिंदा

करो हमको न शर्मिंदा बढ़ो आगे कहीं बाबा
हमारे पास आँसू के सिवा कुछ भी नहीं बाबा

कटोरा ही नहीं है हाथ में बस इतना अंतर है
मगर बैठे जहाँ हो तुम खड़े हम भी वहीं बाबा

तुम्हारी ही तरह हम भी रहे हैं आज तक प्यासे
न जाने दूध की नदियाँ किधर होकर बहीं बाबा

सफाई थी सचाई थी पसीने की कमाई थी
हमारे पास ऐसी ही कई कमियाँ रहीं बाबा

हमारी आबरू का प्रश्न है सबसे न कह देना
वो बातें हमने जो तुमसे अभी खुलकर कहीं बाबा

———- कुंवर बेचैन

 

हँसो हँसो जल्दी हँसो

Filed under: रघुवीर सहाय — Satish Chandra Satyarthi @ 10:30 पूर्वाह्न
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हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही जा रही है

हँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी
और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत खुश न मालूम हो
वरना शक होगा कि यह शख्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे

हँसते हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो
सब को मानने दो कि तुम सब की तरह परास्त होकर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाए

जितनी देर ऊंचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से
गूंज थमते थमते फिर हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फंसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे

हँसो पर चुटकलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हो जो किसी ने सौ साल साल पहले दिए हों

बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हों
जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार
जहां कोई कुछ कर नहीं सकता
उस ग़रीब के सिवाय
और वह भी अकसर हँसता है

हँसो हँसो जल्दी हँसो
इसके पहले कि वह चले जाएं
उनसे हाथ मिलाते हुए
नज़रें नीची किए
उसको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी हँसे थे !

—————-    रघुवीर सहाय

 

प्यासे होंठों से

Filed under: कुंवर बेचैन — Satish Chandra Satyarthi @ 8:27 पूर्वाह्न
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प्यासे होंठों से जब कोई झील न बोली बाबू जी
हमने अपने ही आँसू से आँख भिगो ली बाबू जी

भोर नहीं काला सपना था पलकों के दरवाज़े पर
हमने यों ही डर के मारे आँख न खोली बाबू जी

दिल के अंदर ज़ख्म बहुत हैं इनका भी उपचार करो
जिसने हम पर तीर चलाए मारो गोली बाबू जी

हम पर कोई वार न करना हैं कहार हम शब्द नहीं
अपने ही कंधों पर है कविता की डोली बाबू जी

यह मत पूछो हमको क्या-क्या दुनिया ने त्यौहार दिए
मिली हमें अंधी दीवाली गूँगी होली बाबू जी

सुबह सवेरे जिन हाथों को मेहनत के घर भेजा था
वही शाम को लेकर लौटे खाली झोली बाबू जी

 

दो दिलों के दरमियाँ

Filed under: कुंवर बेचैन — Satish Chandra Satyarthi @ 6:18 पूर्वाह्न
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—             कुंवर बेचैन

दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक
चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक

हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ
मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक

जो धरा से कर रही है कम गगन का फासला
उन उड़ानों पर अंधेरी आँधियों का डर न फेंक

फेंकने ही हैं अगर पत्थर तो पानी पर उछाल
तैरती मछली, मचलती नाव पर पत्थर न फेंक

यह तेरी काँवर नहीं कर्तव्य का अहसास है
अपने कंधे से श्रवण! संबंध का काँवर न फेंक

 

फॉरेन लैंगुएज में कैरियर बनाएं फ़रवरी 18, 2009

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किसी भाषा में दक्षता होना अच्छी जॉब प्राप्त करने में हमेशा सहायक होता है। पर किसी फॉरेन लैंगुएज का ज्ञान कैरियर की दौड़ में आपको भीड़ से बहुत आगे निकाल देता है वैश्वीकरण के इस दौर में, जब हर क्षेत्र में अलग अलग देशों के लोगों के बीच सम्बन्ध बन रहे हैं, एक से अधिक भाषाएँ जानने वालों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है खासकर भारत में, जो की पूरी दुनिया की कंपनियों को अपनी सेवाएँ दे रहा है, अंगरेजी के साथ ही कोई अन्य भाषा भी जानने वाले लोगों के लिए अनगिनत अवसर हैं आज केवल रोज नई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत रही हैं बल्कि भारतीय कम्पनियाँ भी विदेशों में अपनी व्यावसायिक शाखाएं खोल रही हैं ऐसे में फ्रेंच, जर्मन, इटालियन, जापानीज, चायनीज, और कोरियन जैसी भाषाओं का ज्ञान पर्यटन, मनोरंजन, जनसंपर्क और जनसंचार, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, दूतावास, पब्लिशिंग, ट्रांसलेशन और इंटरप्रेटेशन जैसे क्षेत्रों में आपके कैरियर को एक नया आयाम दे सकता है

फॉरेन लैंगुएज कोर्सेज और वांछित योग्यता

फॉरेन लैंगुएज में मुख्यतः तीन प्रकार के कोर्स उपलब्ध हैंसर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री कोर्सेज सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और एडवांस डिप्लोमा पार्ट टाइम कोर्स हैं और कई विश्विद्यालयों (जैसेजेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, विश्वभारती आदि), विभिन्न देशों के सांस्कृतिक और शैक्षिक केन्द्रों (जैसेमैक्समूलर भवन, अलायंस फ़्रैन्काइज आदि) और प्राइवेट संस्थानों द्वारा करवाए जाते हैं ये एकएक साल के कोर्स हैं जिनमें प्रयोगमूलक भाषा के शिक्षण पर जोर दिया जाता है सर्टिफिकेट कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता १२वीं होती है जबकि डिप्लोमा के लिए उस भाषा में सर्टिफिकेट ज़रूरी होता है

बी, एम , एम फिल और पी एच डी जैसे कोर्स विश्विद्यालयों द्वारा करवाए जाते हैं जिनमें एडमिशन सामान्यतः प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होता है इन कोर्सेज में सिर्फ़ भाषा नहीं बल्कि सम्बंधित देश के इतिहास, भूगोल, समाज और साहित्य की भी जानकारी दी जाती है भारत में जो विश्वविद्यालय फॉरेन लैंगुएज कोर्सेज ऑफर करते हैं उनमें मुख्य हैंजवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय , बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, हैदराबादविश्वविद्यालय, विश्वभारती विश्वविद्यालय , पुणे विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, बॉम्बे विश्वविद्यालय आदि।

जॉब प्रोस्पेक्ट्स और कैरियर ऑप्शन्स

विदेशी भाषा सीखने के बाद आप ट्रांसलेटर या इन्टरप्रेटर के रूप में फ्रीलांस तो काम कर ही सकते हैं साथ ही बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों, सरकारी विभागों, दूतावासों आदि में स्थायी नौकरी भी प्राप्त कर सकते हैं. यूएनओ, वर्ल्ड बैंक, यूनिसेफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय सगठनों में भी लैंगुएज एक्सपर्ट्स के लिए काफी जॉबस हैं.  इंडिया में एचपी, ओरेकल, जीई, एल जी, सैमसंग, ह्युन्दाई आदि कम्पनियाँ हर साल भारी तादाद में भाषा विशेषज्ञों को रिक्रूट करती है. इसके अलावा पर्यटन  और  होटल इंडस्ट्री में भी अनगिनत अवसर हैं. आप इन्टरनेशनल मीडिया हाउसेस (प्रिंट, रेडियो या टीवी) में भी काम कर सकते हैं या फ़िर फिल्मों के लिए सबटाइटल लिख सकते हैं. इसके अलावा भारत में अभी लैंगुएज टीचर्स की भारी कमी है चाहे वो प्राइवेट संस्थान हों या सरकारी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज. आने वाले समय में अधिकांश विश्वविद्यालन लैंगुएज कोर्सेज शुरू करने वाले हैं जिसके लिए भारे संख्या में शिक्षकों की आवश्यकता होगी.

जहाँ तक वेतनमान का प्रश्न है तो एक ट्रांसलेटर के रूप में आप ३ रु. – ६ रु. प्रति शब्द, इन्टरप्रेटर के रूप में २५०० रु. -१०००० रु. प्रतिदिन और परमानेंट प्रोफेशनल के रूप में २०००० रु. – ६०००० रु. तक की कमाई से शुरू कर सकते हैं. बाकी आपकी लैंगुएज एबिलिटी, कम्प्युटर ज्ञान आदि पर भी निर्भर करता है.

 

ससुराल गेंदा फूल फ़रवरी 16, 2009

Filed under: सम-सामयिक — Satish Chandra Satyarthi @ 1:29 अपराह्न
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मुझे याद है मैंने जब पहली बार  देहली ६ के गाने “ससुराल गेंदा फूल” को सुना था तो मैं दो मिनट तक हंसता रहा था. हुआ ऐसा था की जेएनयू के जर्मन सेंटर के मेरे एक मित्र  मेरे कमरे में बैठे हुए थे. बातें करते करते अचानक वो ये गाना गुनगुनाने लगे. कुछ तो गाने के शब्द ऐसे थे और कुछ उनका गाने का लहजा कि मुझे हंसी आ गयी. हंसी रुकने पर मैंने पूछा कि कोई नई भोजपुरी एल्बम ख़रीदी है क्या? एक्चुअली वो मित्र बिहार गया जिले से है और भोजपुरी गानों के शौकीन हैं. इसपर उनहोंने आश्चर्य से मुझसे पूछा कि आपने अभी तक ये गाना नहीं सुना है क्या? आजकल तो सभी एफएम चैनलों पर देहली ६ का यही गाना छाया हुआ है.

मैं तुंरत कम्प्युटर पर बैठा और इस गाने को डाउनलोड किया. जब सुना तो सचमुच मन खुश हो गया. गीत की लय लोकगीत जैसी है पर बीट्स क़दमों को थिरकने पर मजबूर कर देते हैं. ऐ आर रहमान साहब का संगीत सचमुच काबिले तारीफ़ है. गीत को रेखा भारद्वाज, श्रद्धा पंडित और सुजाता मजुमदार ने गाया भी बड़ी खूबसूरती से है. लेकिन सबसे अधिक प्रशंसा के पात्र हैं इस गीत के लेखक प्रसून जोशी. शब्दों के प्रयोग को देखकर गुलज़ार की याद हो आती है. प्रसून जोशी सचमुच दूर की रेस के घोडे हैं .

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं :-

सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे

ससुराल गेंदा फूल

सैंया छेड़ देवें, ननद चुटकी लेवे

ससुराल गेंदा फूल

छोड़ा बाबुल का अंगना, भावे डेरा पिया का हो

सास गारी देवे, देवर समझा लेवे

ससुराल गेंदा फूल

सैंया है व्यापारी, चले हैं परदेश

सुरतिया निहारूं, जियरा भारी होवे

ससुराल गेंदा फूल

बुशर्ट पहनके, खाइके बीडा पान

पूरे रायपुर से अलग है, सैंया जी की शान

इस गीत में “ससुराल गेंदा फूल” का मतलब मैं नहीं समझ पाया. आपलोगों को कुछ समझ आए तो बताइयेगा.

ये हो सकता है कि नायिका का व्यापारी पति उसे छोड़कर परदेश चला गया है जिससे ससुराल गेंदा फूल की तरह हो गया है जिसमें सुन्दरता तो है लेकिन खुशबू नहीं है. सैंया के बिना ससुराल बिना खुशबू के फूल की तरह है.

और क्या अर्थ हो सकते हैं? आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा.