चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

वीरों का हो कैसा वसन्त / सुभद्राकुमारी चौहान जनवरी 31, 2009

आ रही हिमालय से पुकार

है उदधि गरजता बार बार

प्राची पश्चिम भू नभ अपार;

सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त

वीरों का हो कैसा वसन्त

फूली सरसों ने दिया रंग

मधु लेकर आ पहुंचा अनंग

वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;

है वीर देश में किन्तु कंत

वीरों का हो कैसा वसन्त

भर रही कोकिला इधर तान

मारू बाजे पर उधर गान

है रंग और रण का विधान;

मिलने को आए आदि अंत

वीरों का हो कैसा वसन्त

गलबाहें हों या कृपाण

चलचितवन हो या धनुषबाण

हो रसविलास या दलितत्राण;

अब यही समस्या है दुरंत

वीरों का हो कैसा वसन्त

कह दे अतीत अब मौन त्याग

लंके तुझमें क्यों लगी आग

ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;

बतला अपने अनुभव अनंत

वीरों का हो कैसा वसन्त

हल्दीघाटी के शिला खण्ड

ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड

राणा ताना का कर घमंड;

दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत

वीरों का हो कैसा वसन्त

भूषण अथवा कवि चंद नहीं

बिजली भर दे वह छन्द नहीं

है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;

फिर हमें बताए कौन हन्त

वीरों का हो कैसा वसन्त

 

अग्निबीज – नागार्जुन

Filed under: नागार्जुन — Satish Chandra Satyarthi @ 8:15 अपराह्न
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अग्निबीज
तुमने बोए थे
रमे जूझते,
युग के बहु आयामी
सपनों में, प्रिय
खोए थे!
अग्निबीज
तुमने बोए थे

तब के वे साथी
क्या से क्या हो गए,
कर दिया क्या से क्या तो,
देख-देख
प्रतिरूपी छवियाँ
पहले खीझे
फिर रोए थे
अग्निबीज
तुमने बोए थे

ऋषि की दृष्टि
मिली थी सचमुच
भारतीय आत्मा थे तुम तो
लाभ-लोभ की हीन भावना
पास न फटकी
अपनों की यह ओछी नीयत
प्रतिपल ही
काँटों-सी खटकी
स्वेच्छावश तुम
शरशैया पर लेट गए थे
लेकिन उन पतले होठों पर
मुस्कानों की आभा भी तो
कभी-कभी खेला करती थी!
यही फूल की अभिलाषा थी
निश्चय, तुम तो
इस ‘जन-युग’ के
बोधिसत्व थे,
पारमिता में त्याग तत्व थे।

 

सन् ४७ को याद करते हुए – केदारनाथ सिंह

Filed under: केदारनाथ सिंह — Satish Chandra Satyarthi @ 5:29 अपराह्न
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तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदाननाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियाँ
ठिगने नूर मियाँ
रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियाँ
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियाँ?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदाननाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

 

पंथ होने दो अपरिचित – महादेवी वर्मा

Filed under: महादेवी वर्मा — Satish Chandra Satyarthi @ 3:22 अपराह्न
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काव्य संग्रह दीपशिखा से

पंथ होने दो अपरिचित
प्राण रहने दो अकेला!

और होंगे चरण हारे,
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;
दुखव्रती निर्माण-उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमिर में स्वर्ण बेला!

दूसरी होगी कहानी
शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;
आज जिसपर प्यार विस्मृत ,
मैं लगाती चल रही नित,
मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!

हास का मधु-दूत भेजो,
रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;
ले मिलेगा उर अचंचल
वेदना-जल स्वप्न-शतदल,
जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!

 

जे एन यू में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू जनवरी 30, 2009

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू  हो गयी है | आवेदन पत्र प्राप्त करने की अन्तिम तिथि १६ मार्च है | डाक द्वारा आवेदन पत्र मार्च तक प्राप्त किए जा सकते हैं | आवेदन पत्र जमा करने की अन्तिम तिथि भी १६ मार्च, २००९ हैविभिन्न कोर्सेज के लिए प्रवेश परीक्षा देश भर में १५ मई से १८ मई तक आयोजित की जायेगी।  विशेष जानकारी के लिए जे एन यू की आधिकारिक वेबसाईट देखें

जे एन यू की परीक्षा अथवा प्रवेश प्रवेश प्रकिया के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप निसंकोच मुझे लिख सकते हैंमुझे आपकी मदद करने में खुशी होगीविशेष रूप से School of Language, Literature and Culture Studies में BA (Foreign Language), फर्स्ट या सेकंड ईयर के लिए आवेदन करने वाले छात्र किसी भी समस्या के लिए लिखेंउनकी मैं विशेष मदद कर पाऊँगा क्योंकि मैं इसी केन्द्र का छात्र हूँ

 

न होने की गंध – केदारनाथ सिंह

[ “अकाल में सारस” कविता संग्रह से ]

अब कुछ नहीं था
सिर्फ़ हम लौट रहे थे
इतने सारे लोग सिर झुकाए हुए
चुपचाप लौट रहे थे
उसे नदी को सौंपकर
और नदी अंधेरे में भी
लग रही थी पहले से ज्यादा उदार और अपरम्पार
उसके लिए बहना उतना ही सरल था
उतना ही साँवला और परेशान था उसका पानी

और अब हम लौट रहे थे
क्योंकि अब हम खाली थे
सबसे अधिक खाली थे हमारे कन्धे
क्योंकि अब हमने नदी का
कर्ज़ उतार दिया था
न जाने किसके हाथ में एक लालटेन थी
धुंधली-सी
जो चल रही थी आगे-आगे
यों हमें दिख गई बस्ती
यों हम दाखिल हुए फिर से बस्ती में

उस घर के किवाड़
अब भी खुले थे
कुछ नहीं था सिर्फ़ रस्म के मुताबिक
चौखट के पास धीमे-धीमे जल रही थी
थोड़ी-सी आग
और उससे कुछ हटकर
रखा था लोहा
हम बारी-बारी
आग के पास गए और लोहे के पास गए
हमने बारी-बारी झुककर
दोनों को छुआ

यों हम हो गए शुद्ध
यों हम लौट आए
जीवितों की लम्बी उदास बिरादरी में

कुछ नहीं था
सिर्फ़ कच्ची दीवारों
और भीगी खपरैलों से
किसी एक के न होने की
गंध आ रही थी

 

शहर में रात – केदारनाथ सिंह

Filed under: केदारनाथ सिंह — Satish Chandra Satyarthi @ 1:33 अपराह्न
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बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएँ
यह शहर कि जिसकी ज़िद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आज़ादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ
जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं ज़ंजीरें