चौपाल

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क्रांतिकारी लेखक पाब्लो नरूदा की कुछ कविताएँ दिसम्बर 3, 2008

Filed under: पाब्लो नेरूदा — Satish Chandra Satyarthi @ 7:59 पूर्वाह्न
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यहाँ २०वी शताब्दी के महान क्रांतिकारी लेखक पाब्लो नरूदा की कुछ दिल को छू लेने वाली कविताएँ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ . पाब्लो नरूदा को १९७१ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था. उनकी कविताओं का दुनिया की लगभग हर भाषा में अनुवाद हो चुका है.

ग़रीबी

रचनाकार: पाब्लो नेरूदा अनुवादक: सुरेश सलिल

आह, तुम नहीं चाहतीं–

डरी हुई हो तुम

ग़रीबी से

घिसे जूतों में तुम नहीं चाहतीं बाज़ार जाना

नहीं चाहतीं उसी पुरानी पोशाक में वापस लौटना
मेरे प्यार, हमें पसन्द नहीं है,

जिस हाल में धनकुबेर हमें देखना चाहते हैं,

तंगहाली ।

हम इसे उखाड़ फेंकेंगे दुष्ट दाँत की तरह

जो अब तक इंसान के दिल को कुतरता आया है
लेकिन मैं तुम्हें

इससे भयभीत नहीं देखना चाहता ।

अगर मेरी ग़लती से

यह तुम्हारे घर में दाख़िल होती है

अगर ग़रीबी

तुम्हारे सुनहरे जूते परे खींच ले जाती है,

उसे परे न खींचने दो अपनी हँसी

जो मेरी ज़िन्दगी की रोटी है ।

अगर तुम भाड़ा नहीं चुका सकतीं

काम की तलाश में निकल पड़ो

गरबीले डग भरती,

और याद रखो, मेरे प्यार, कि

मैं तुम्हारी निगरानी पर हूँ

और इकट्ठे हम

सबसे बड़ी दौलत हैं

धरती पर जो शायद ही कभी

इकट्ठा की जा पाई हो ।

अगर तुम जीवित नहीं रहती हो

रचनाकार: पाब्लो नेरूदा अनुवादक: सुरेश सलिल

अगर अचानक तुम कूच कर जाती हो

अगर अचानक तुम जीवित नहीं रहती हो

मैं जीता रहूंगा ।
मुझ में साहस नहीं है

मुझ में साहस नहीं है लिखने का

कि अगर तुम मर जाती हो ।
मैं जीता रहूंगा ।
क्योंकि जहाँ किसी आदमी की कोई आवाज़ नहीं है

वहाँ मेरी आवाज़ है ।
जहाँ अश्वेतों पर प्रहार होते हों

मैं मरा हुआ नहीं हो सकता ।

जहाँ मेरे बिरादरान जेल जा रहे हों

मैं उनके साथ जाऊंगा ।
अब जीत

मेरी जीत नहीं,

बल्कि महान जीत

हासिल हो,
भले मैं गूंगा होऊँ, मुझे बोलना ही है :

देखूंगा मैं उसका आना, भले मैं अन्धा होऊँ ।
नहीं मुझे माफ़ कर देना

अगर तुम जीवित नहीं रहती हो

अगर तुम, प्रियतमे, मेरे प्यार, अगर…

अगर तुम मर चुकी हो

सारे के सारे पत्ते मेरे सीने पर गिरेंगे

धारासार बारिश मेरी आत्मा पर होगी रात-दिन

बर्फ़ मेरा दिल दागेगी

मैं शीत और आग और मृत्यु और बर्फ़ के साथ चलूंगा

मेरे पैर, तुम जहाँ सोई हो, उस रुख कूच करना चाहेंगे,

लेकिन मैं जीता रहूंगा

क्योंकि तुम, सब कुछ से ऊपर, मुझे अदम्य देखना चाहती थीं

और क्योंकि, मेरे प्यार, तुम्हें पता है

मैं महज एक आदमी नहीं, बल्कि समूची आदमज़ात हूँ ।

स्त्री देह

रचनाकार: पाब्लो नेरूदा अनुवादक: मधु शर्मा

स्त्री देह, सफ़ेद पहाड़ियाँ, उजली रानें
तुम बिल्कुल वैसी दिखती हो जैसी यह दुनिया
समर्पण में लेटी–
मेरी रूखी किसान देह धँसती है तुममें
और धरती की गहराई से लेती एक वंशवृक्षी उछाल ।
अकेला था मैं एक सुरंग की तरह, पक्षी भरते उड़ान मुझ में
रात मुझे जलमग्न कर देती अपने परास्त कर देने वाले हमले से
ख़ुद को बचाने के वास्ते एक हथियार की तरह गढ़ा मैंने तुम्हें,
एक तीर की तरह मेरे धनुष में, एक पत्थर जैसे गुलेल में
गिरता है प्रतिशोध का समय लेकिन, और मैं तुझे प्यार करता हूँ
चिकनी हरी काई की रपटीली त्वचा का, यह ठोस बेचैन जिस्म दुहता हूँ मैं
ओह ! ये गोलक वक्ष के, ओह ! ये कहीं खोई-सी आँखें,
ओह ! ये गुलाब तरुणाई के, ओह ! तुम्हारी आवाज़ धीमी और उदास !

ओ मेरी प्रिया-देह ! मैं तेरी कृपा में बना रहूंगा
मेरी प्यास, मेरी अन्तहीन इच्छाएँ, ये बदलते हुए राजमार्ग !
उदास नदी-तालों से बहती सतत प्यास और पीछे हो लेती थकान,
और यह असीम पीड़ा !

 

2 Responses to “क्रांतिकारी लेखक पाब्लो नरूदा की कुछ कविताएँ”

  1. अमित पाठक Says:

    हमेशा की तरह छू लेने वाली…


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