चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

गोबर छात्रों के लिए एक्जाम हॉल में करने लायक १७ रोचक काम दिसम्बर 4, 2008

Filed under: रोचक लेख,हास्य-व्यंग्य — Satish Chandra Satyarthi @ 2:10 अपराह्न
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विद्यार्थियों के सामने ऐसी नौबत कई बार आती है कि आपको पहले से पता होता है कि इस एक्जाम में आप पहले से फ़ेल हैं और उसमें अपीयर होने या होने से कई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ऐसा कई स्थितियों में हो सकता है या तो आपकी अटेंडेंस कम हो, या पिछले एक्जाम्स में फ़ेल हों या तैयारी बिलकुल ही हो। ऐसे में एक्जाम को स्किप मत करें बल्कि उसे मनोरंजन के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करें।

ऐसी स्थिति में एक्जाम हॉल में करने लायक १७ रोचक चीजें :-

. अपने साथ एक तकिया लाएं और एक्जाम हॉल में सो जाएं। एक्जाम खत्म होने के १५ मिनट पहले उठ जाएं और कहें,”अरे! अब शुरु करना चाहिये कॉपी पर कुछ कूड़ा कचड़ा लिख कर एक्जाम खत्म होने से पांच मिनट पहले कॉपी जमा कर के निकल जाएं। इससे क्लास में एक मेधावी छात्र के रूप में आपका वजन बढ़ेगा।

. अगर मैथ या साइंस का एक्जाम है तो निबंध के रूप में उत्तर दें। अगर आर्ट्स/सोशल साइंस का पेपर हो तो संख्याओं, संकेतों और फ़ार्मूलों में उत्तर दें। कुछ क्रियेटिव करें। इंटीग्रेशन और डिफ़रेन्शिएशन के सिंबल्स यूज करें।

. क्वेश्चन पेपर से हवाई जहाज बनाएं और निरीक्षक की नाक के बाएं सुराख पर निशाना लगाएं।

. साथ में चीयर करने के लिए कुछ मित्रों को भी लायें। उन्हें एक्जाम हॉल से बाहर खड़ा करें।

. क्वेश्चन्स को ज़ोर ज़ोर से पढ़ें और खुद से ही तर्क दे देकर बहस भी करें।

. पेपर मिलने के मिनट के बाद उठकर निरीक्षक को बुलाकर जोर जोर से चिल्लाने लगें, “ये पेपर है या नाटक है। कुछ भी समझ में नहीं रहा है जबकि मैंने सारी क्लासें अटेंड की है। और आप हैं कौन? वो रेगुलर वाले टीचर कहां गये जिनके कानों में बाल थे।

. कॉपी में हर सवाल के आगे कोई कारण लिखें कि आप उस सवाल का उत्तर क्यों नहीं दे सकते; जैसे कि यह सवाल मेरी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ़ है।

. वीडियो गेम्स लेकर आयें और फ़ुल वोल्युम पर खेलें। पालतू जानवर लायें तो और भी अच्छा है।

. आंसर शीट में कलर पेंसिल्स, क्रेयॉन्स, पेन्ट और खुशबूदार मार्कर्स से लिखें।

. चप्पल, पगड़ी और तौलिया पहन कर आयें।

१०. पूरा पेपर किसी और भाषा (जैसे चाइनीज कोरियन) में लिखें और अगर कोई और भाषा नहीं आती तो एक नई भाषा बना दें। गणित के एक्जाम में हमेशा रोमन नम्बर्स यूज करें।

११. निरीक्षक पर निशाना लगाकर कंकड़ फ़ेंकें और बगल वाले पर इल्ज़ाम लगाएं।

१२. जैसे ही पेपर मिले उसे चबा जाएं और हंसने लगें।

१३. एक्जाम शुरू होने के आधे घंटे बाद ही पेपर जमा करने के लिए खड़े हो जायें। एक्जामिनर के यह कहने पर कि, आधा घंटा और वेट करें, बैठ जाएं। बार बार अंगड़ाई लें और दूसरे परिक्षार्थियों को यह कहकर कोसें कि कैसे कैसे कूढ़मगज पड़े हुए हैं; इतने ईजी पेपर में इतनी देर लगा रहे हैं। ध्यान रखें: अपनी कॉपी खोलकर दिखाने से इनकार कर दें।

१४. अपने साथ एक मुकुट लेकर आयें। बीच बीच में मुकुट पहन कर खड़े हो जायें और कहें,”मैं हूं आज का अर्जुन!”

१५. एक्जाम के दौरान धीरे धीरे मह्बूबा मह्बूबा….” गुनगुनाते रहें। टीचर के कहने पर भी बन्द करें। जब आपको जबर्दस्ती बाहर निकाला जाये तो मस्त बहारों का मैं आशिक……” गाते हुए निकल जायें।

१६. अपने साथ किसी देवीदेवता की छोटी सी मूर्ति लेकर आयें और उसे अपने आगे डेस्क पर रखें। बीच बीच में उसकी पूजाप्रार्थना करें; हो सके तो अगरबत्ती और कुछ पूजन सामग्री भी लायें।

१७.आंसर शीट के साथ किसी अन्य विषय के नोट्स अटैच कर दे (जैसे हिस्ट्री के पेपर में कैल्कुलस के नोट्स) और आंसर शीट में कमेंट लिख दें,”ज़रूरत के अनुसार रिफ़रेंस के लिए अटैच्ड नोट्स देखें





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क्रांतिकारी लेखक पाब्लो नरूदा की कुछ कविताएँ दिसम्बर 3, 2008

Filed under: पाब्लो नेरूदा — Satish Chandra Satyarthi @ 7:59 पूर्वाह्न
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यहाँ २०वी शताब्दी के महान क्रांतिकारी लेखक पाब्लो नरूदा की कुछ दिल को छू लेने वाली कविताएँ यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ . पाब्लो नरूदा को १९७१ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी दिया गया था. उनकी कविताओं का दुनिया की लगभग हर भाषा में अनुवाद हो चुका है.

ग़रीबी

रचनाकार: पाब्लो नेरूदा अनुवादक: सुरेश सलिल

आह, तुम नहीं चाहतीं–

डरी हुई हो तुम

ग़रीबी से

घिसे जूतों में तुम नहीं चाहतीं बाज़ार जाना

नहीं चाहतीं उसी पुरानी पोशाक में वापस लौटना
मेरे प्यार, हमें पसन्द नहीं है,

जिस हाल में धनकुबेर हमें देखना चाहते हैं,

तंगहाली ।

हम इसे उखाड़ फेंकेंगे दुष्ट दाँत की तरह

जो अब तक इंसान के दिल को कुतरता आया है
लेकिन मैं तुम्हें

इससे भयभीत नहीं देखना चाहता ।

अगर मेरी ग़लती से

यह तुम्हारे घर में दाख़िल होती है

अगर ग़रीबी

तुम्हारे सुनहरे जूते परे खींच ले जाती है,

उसे परे न खींचने दो अपनी हँसी

जो मेरी ज़िन्दगी की रोटी है ।

अगर तुम भाड़ा नहीं चुका सकतीं

काम की तलाश में निकल पड़ो

गरबीले डग भरती,

और याद रखो, मेरे प्यार, कि

मैं तुम्हारी निगरानी पर हूँ

और इकट्ठे हम

सबसे बड़ी दौलत हैं

धरती पर जो शायद ही कभी

इकट्ठा की जा पाई हो ।

अगर तुम जीवित नहीं रहती हो

रचनाकार: पाब्लो नेरूदा अनुवादक: सुरेश सलिल

अगर अचानक तुम कूच कर जाती हो

अगर अचानक तुम जीवित नहीं रहती हो

मैं जीता रहूंगा ।
मुझ में साहस नहीं है

मुझ में साहस नहीं है लिखने का

कि अगर तुम मर जाती हो ।
मैं जीता रहूंगा ।
क्योंकि जहाँ किसी आदमी की कोई आवाज़ नहीं है

वहाँ मेरी आवाज़ है ।
जहाँ अश्वेतों पर प्रहार होते हों

मैं मरा हुआ नहीं हो सकता ।

जहाँ मेरे बिरादरान जेल जा रहे हों

मैं उनके साथ जाऊंगा ।
अब जीत

मेरी जीत नहीं,

बल्कि महान जीत

हासिल हो,
भले मैं गूंगा होऊँ, मुझे बोलना ही है :

देखूंगा मैं उसका आना, भले मैं अन्धा होऊँ ।
नहीं मुझे माफ़ कर देना

अगर तुम जीवित नहीं रहती हो

अगर तुम, प्रियतमे, मेरे प्यार, अगर…

अगर तुम मर चुकी हो

सारे के सारे पत्ते मेरे सीने पर गिरेंगे

धारासार बारिश मेरी आत्मा पर होगी रात-दिन

बर्फ़ मेरा दिल दागेगी

मैं शीत और आग और मृत्यु और बर्फ़ के साथ चलूंगा

मेरे पैर, तुम जहाँ सोई हो, उस रुख कूच करना चाहेंगे,

लेकिन मैं जीता रहूंगा

क्योंकि तुम, सब कुछ से ऊपर, मुझे अदम्य देखना चाहती थीं

और क्योंकि, मेरे प्यार, तुम्हें पता है

मैं महज एक आदमी नहीं, बल्कि समूची आदमज़ात हूँ ।

स्त्री देह

रचनाकार: पाब्लो नेरूदा अनुवादक: मधु शर्मा

स्त्री देह, सफ़ेद पहाड़ियाँ, उजली रानें
तुम बिल्कुल वैसी दिखती हो जैसी यह दुनिया
समर्पण में लेटी–
मेरी रूखी किसान देह धँसती है तुममें
और धरती की गहराई से लेती एक वंशवृक्षी उछाल ।
अकेला था मैं एक सुरंग की तरह, पक्षी भरते उड़ान मुझ में
रात मुझे जलमग्न कर देती अपने परास्त कर देने वाले हमले से
ख़ुद को बचाने के वास्ते एक हथियार की तरह गढ़ा मैंने तुम्हें,
एक तीर की तरह मेरे धनुष में, एक पत्थर जैसे गुलेल में
गिरता है प्रतिशोध का समय लेकिन, और मैं तुझे प्यार करता हूँ
चिकनी हरी काई की रपटीली त्वचा का, यह ठोस बेचैन जिस्म दुहता हूँ मैं
ओह ! ये गोलक वक्ष के, ओह ! ये कहीं खोई-सी आँखें,
ओह ! ये गुलाब तरुणाई के, ओह ! तुम्हारी आवाज़ धीमी और उदास !

ओ मेरी प्रिया-देह ! मैं तेरी कृपा में बना रहूंगा
मेरी प्यास, मेरी अन्तहीन इच्छाएँ, ये बदलते हुए राजमार्ग !
उदास नदी-तालों से बहती सतत प्यास और पीछे हो लेती थकान,
और यह असीम पीड़ा !