चौपाल

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उसूलों पे जहाँ आँच आये – वसीम बरेलवी नवम्बर 19, 2008

Filed under: वसीम बरेलवी — Satish Chandra Satyarthi @ 10:39 पूर्वाह्न
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मशहूर शायर वसीम बरेलवी साहब की एक खूबसूरत ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ जो ज़माने के लिए एक आईने की तरह है:-

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है
नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है
थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटे
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है
बहुत बेबाक आँखों में त’अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है
सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है
मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

 

4 Responses to “उसूलों पे जहाँ आँच आये – वसीम बरेलवी”

  1. बहुत अच्छी गजल है वसीम बरेलवी की यह। इसे यहां पेश करने के लिये शुक्रिया।

  2. बहुत बढीया है।

    “नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
    कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है” एक दम सही लीखा है उनहोने।

    उनकी गजल हमे दिखाने के लीये बहुत बहुत ध्नयवाद।

  3. wasim chauhan Says:

    वाह! वसीम साहब, कया खूब लिखाहै!

  4. भाई कुछ नये शायर लिखो


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