चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

कालिज स्टूडैंट – काका हाथरसी नवम्बर 14, 2008

Filed under: काका हाथरसी — Satish Chandra Satyarthi @ 2:10 अपराह्न
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फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸

लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।

कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸

दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।

कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸

मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ  घिसते फादर।
पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸

होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।

फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸

साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।

कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸

मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।
प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸

लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।

मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸

शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें ‘काका कवि’ राय¸ भयंकर तुमको देता¸

बन सकते हो इसी तरह ‘बिगड़े दिल नेता।’

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3 Responses to “कालिज स्टूडैंट – काका हाथरसी”

  1. वाह वाह कितना अच्छा लीखे हैं एक
    दम फीट बैठता है।

    “दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती”
    🙂

  2. ashwani kumar rai Says:

    aaj ke samay par ekadam sahi vyang hai ……

  3. vaibhav Says:

    kya bat kahi apne
    dil ko chu gai
    yeh sab mat karna
    yeh bat keh gai


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