चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

पुष्प की अभिलाषा – माखनलाल चतुर्वेदी नवम्बर 5, 2008

Filed under: माखनलाल चतुर्वेदी — Satish Chandra Satyarthi @ 1:39 अपराह्न

चाह नहीं मैं सुरबाला के

गहनों में गूंथा जाऊँ,

चाह नहीं प्रेमी-माला में

बिंध प्यारी को ललचाऊँ,

चाह नहीं, सम्राटों के शव

पर, है हरि, डाला जाऊँ

चाह नहीं, देवों के शिर पर,

चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ!

मुझे तोड़ लेना वनमाली!

उस पथ पर देना तुम फेंक,

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने

जिस पथ जावें वीर अनेक।

 

One Response to “पुष्प की अभिलाषा – माखनलाल चतुर्वेदी”

  1. Yash Choudhary Says:

    Lovely poem by a great poet….


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