चौपाल

आए हो तो थोड़ी देर रुक जाओ भई !!!!

मेरा गृहजिला – नालंदा अक्टूबर 25, 2008

नालंदा के खंडहर
नालंदा बिहार में पटना से ९० किमी दक्षिण और गया से ६२ किमी की दूरी पर स्थित है। यह विश्व में शिक्षा और संस्कृति के प्राचीनतम केन्द्रनालंदा विश्वविद्यालयके लिए प्रसिद्ध है। अब इस महानतम विश्वविद्यालय के सिर्फ़ खंडहर बचे हैं जो १४ हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हैं। संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता हैज्ञान देने वाला” (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना) बुद्ध अपने जीवनकाल में कई बार नालंदा आए और लंबे समय तक ठहरे। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान महावीर निर्वाण भी नालंदा में ही पावापुरी नामक स्थान पर हुआ।
नालंदा के खंडहर
नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना ४७० . में गुप्त साम्राज्य के कुमारगुप्त ने की थी। यह विश्व के प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहां १०,००० शिक्षक और ,००० छात्र रहते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य का एक शानदार नमूना था। आज भी इसके अवशेषों के बीच से होकर गुजरने पर आप इसके गौरवशाली अतीत को अनुभव कर सकते हैं। यहां कुल आठ परिसर और दस मन्दिर थे। इसके अलावा कई पूजाघर, झीलें, उद्यान और नौ मंजिल का एक विशाल पुस्तकालय भी था। नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय बौद्ध ग्रन्थों का विश्व में सबसे बड़ा संग्रह था। कहा जाता है कि जब बख्तियार खिलज़ी ने इसमें आग लगवा दी थी तो यह लगातार छः महीने तक जलता रहा था। नालंदा विश्वविद्यालय में विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। यहां अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, इरान और तुर्की आदि देशो से विद्यार्थी आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतान्तों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है। ११९३ में बख्तियार खिलज़ी ने बिहार पर आक्रमण किया। जब वह नालंदा पहुंचा तो उसने नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षकों से पूछा कि यहां पवित्र ग्रन्थ कुरान है नहीं। जवाब नहीं में मिलने पर उसने नालंदा विश्वविद्यालय को तहस नहस कर दिया और पुस्तकालय में आग लगा दी। इरानी विद्वान मिन्हाज लिखता है कि कई विद्वान शिक्षकों को ज़िन्दा जला दिया गया और कईयों के सर काट लिये गए। इस घटना को कई विद्वानों द्वारा बौद्ध धर्म के पतन के एक कारण के रूप में देखा जाता है। कई विद्वान यह भी कहते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों के नष्ट हो जाने से भारत आने वाले समय में विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और गणित जैसे क्षेत्रों मे पिछड़ गया।
नालंदा के खंडहर

यहां घूमने लायक स्थान हैंनालंदा विश्वविद्यालय खंडहर परिसर मे चैत्यों, विहारों आदि के अवशेष, नव नालंदा महाविहार, नालंदा संग्रहालय , और बड़गांव। बड़गांव नालंदा का निकटतम गांव है जहां एक तालाब के किनारे प्राचीन सूर्य मन्दिर है। यह स्थान छठ के लिए प्रसिद्ध है। नालंदा से थोड़ी दूर पर सिलाव स्थित है जो स्वादिष्टखाज़ाके लिए प्रसिद्ध है) सिलाव से थोड़ा और आगे चलने पर एक और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हैराजगृह (रजगीर) इसकी बारे में जानकारी मैं एक अलग पोस्ट में दूंगा।

नालंदा के खंडहर
नालंदा के खंडहर

नालंदा के बारे में और जानकारी के लिए कुछ उपयोगी लिंक

नालंदा विकिपीडिया पर
बीबीसी पर नालंदा की तस्वीरें

नालंदा बिहार पर्यटन विभाग की वेबसाईट पर

 

मेरा गांव

Filed under: मेरा गांव — Satish Chandra Satyarthi @ 10:15 पूर्वाह्न
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गांव शब्द सुनते ही हम अपने मन में एक तस्वीर सी बना लेते हैंकमर पे घड़ा रखे कुँए से पानी भरकर आती औरतें, खेतों से हलबैल लेकर लौटते किसान, गांव के बहार के मैदान में गिल्लीडंडा खेलते बच्चे, दिए और लालटेन की रोशन में बच्च्चों को सुलातीं दादी मां, आँगन से उठाते चूल्हे के धुएँ की सोंधी खुशबू और दूर खेतों से आती किसी ट्यूबवेल के चलने की आवाज़॥यदि हम भी मेट्रोपोलिटन सिटीज़ में पैदा हुए होते तो शायद गावों की यही तस्वीर हमारे मन में भी रहती। और शायद यह अच्छा भी होता ? आख़िर अपना गाँव भे तो कभी ऐसा हुआ करता होगा।
मेरे गांव का नमअलावांहै लेकिन बोलने की सुविधा के लिए लोगों ने इसेअलामाबना दिया है। यह बिहार के नालंदा जिले में बसा हज़ार की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है। इसमें से तकरीबन एकडेढ़ हज़ार तो सल् से कम उम्र के बच्चे ही होंगे। सब भगवान् की देन है!! गांव आधुनिकीकरण की और अपने कदम बढ़ा चुका है। शहर या क़स्बा तो नहीं कह सकते पर ऊपर की तस्वीर के अनुसार गांव भी नहीं है। गांव से नज़दीकी बाज़ार तक पक्की सड़क, सरकारी हैंडपंप, बिजली और टेलीफोन के खम्भे, ईंट के माकन, क्रिकेट खेलते बच्चे, और गांव के बाहर के चौक पर पॉलिटिक्स पर बहस करते किसान। बीच बीच में किसी घर से मोबाइल के रिंग की आवाज़ भी जायेगी। इक्कादुक्का जींसटीशर्ट पहने लड़कियां भी दिख जायेंगी। भले ही चहरे और शरीर के हावभाव वही सलवार कुरते वाले ही होंगे।

कभीकभी लगता है की विकास की कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ रही है हम अपनी पहचान, अपनी महक, अपना अस्तित्व खो रहे हैं। मुझे सरकारी हैंडपंप के पाने में पुराने कुँए के पानी वाली मिठास कभी नहीं मिली। टाँगे पर बैठकर एक घंटे में बाज़ार पहुँचने का आनंद जीप या बस से पन्द्रह मिनट में पहुँचने में कभी नहीं मिला। और खेत से तुंरत लाई गयीतोरीऔरलौकीकी सब्जी वाला स्वाद बज़क के पनीर और मशरूम में कभी नहीं मिला।

पर कुछ चीज़ें मुझे अब भी पहले जैसी लगती हैं गांव में। जब भी छुट्टियों में गांव जाता हूँ तो कुछ चीजें ज़रूर करने की कोशिश करता हूँ। जैसेसर्दियों में पुआल जलाकर आग तापना (सेंकना), घर में चौकीपलंग वाले बिस्तर पर सोकर दालान में पुआल पर बिस्तर बिछाकर सोना। सचमुच वह आनंद आपको इम्पोर्टेड गद्दों में भी नहीं मिलेगा। गर्मियों में मैं बिजली रहने पर भी छत के ऊपर खुले में सोना पसंद करता हूँ (शुक्र है की वहां दिल्ली जितने मच्छर नहीं हैं) चांदनी रात में दूर कहीं रेडियो पर कोई पुराना गीत बज रहा हो और छत पर लेटकर तारों के अंतरजाल को देखते रहने के आनद को शब्दों में समेत पाना सचमुच मुश्किल है।

कभीकभी गाँव में तेज़ी से हो रहे बदलावों से मन क्षुब्ध तो होता है पर पता नहीं क्यों गांव के प्रति लगाव और आकर्षण दिनोंदिन और बढ़ता ही जाता है। शायद गुजरते, फिसलते पलों को ज्यादा से ज्यादा समेत लेने, जी लेने, रोक लेने की ख्वाहिश और आने वाले वक्त के प्रति मन में छुपे भय के कारण ऐसा हो।

 

मेरे बारे में

Filed under: मैं — Satish Chandra Satyarthi @ 9:22 पूर्वाह्न
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मेरा नाम सतीश चन्द्र सत्यार्थी है। बिहार के नालंदा जिले का रहने वाला हूं। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा अपने गृह जिले से पूरी की है और अभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कोरियन भाषा केंद्र में बी.. अंतिम वर्ष का छात्र हूं। मेरी रूचियां हैंसाहित्य पढना और नई नई भाषाएं सीखना। हालांकि अभी तक मुझे हिन्दी, अंग्रेजी, कोरियन, जापानी और तुर्की के अलावा और कोइ भाषा नहीं सीख पाया हूं पर मेरा प्रयास है कि जे.एन.यू. मे अपने अध्ययनकाल के दौरान कुछ और भाषाओं जैसेग्रीक, हीब्रू और जर्मन आदि की कम से कम बेसिक जानकारी प्राप्त करूं तथा संस्कृत और उर्दू का गहन अध्ययन करूं। देखते हैं हो पाता है या नहीं। खाली समय मे मैं संगीत सुनना पसंद करता हूं; खसकर पुराने हिंदी फिल्मी गीत और गज़लें। गुलाम अली और मेंहदी हसन मेरे पसंदीदा गज़ल गायक हैं। मेरी सबसे बडी कमज़ोरी यह है कि मैं बहुत बडा आलसी हूं। हर काम को कल और परसों पर डालने कि कोशिश करता हूं। और क्या बताऊं अपने बारे में …………………………………………………………..कुछ जानना हो तो लिखियेगा

 

मेरा अध्ययन केन्द्र

Filed under: मेरा अध्ययन केन्द्र ( सेन्टर ) — Satish Chandra Satyarthi @ 9:19 पूर्वाह्न
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मेरा अध्ययन केन्द्र (सेंटर)

मेरे सेंटर का नामसेंटर फ़ॉर जापानी कोरियन एण्ड नॉर्थ ईस्ट एशियन स्टडीज़ (सी.जे.के.एन...एस.)” है। लेकिन सुविधा के दृष्टिकोण से हम छात्र इसेकोरियन सेंटरकह्ते हैं। यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय केभाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन केन्द्र (एस.एल.एल.सी.एस)’ के अन्तर्गत आता है जो कि भारत में भाषा शिक्षण का अग्रणी संस्थान है। कोरियन सेंटर दक्षिण एशिया के उन गिनेचुने संस्थानों में से एक है जहां कोरियन भाषा पढाई जाती है। भारत मे यह एकमात्र संस्थान है जहां कोरियन में बी.. और एम.. पाठयक्रम उपलब्ध हैं। इसके अलावा कुछ अन्य संस्थान जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय आदि कोरियन मे सर्टिफ़िकेट और डिप्लोमा कोर्सेज़ करवाते हैं।

कोरियन सेंटर मे कुल १० शिक्षक और करीब १०० छात्र हैं। भारतीय शिक्षकों मे श्रीमती वैजयंती राघवन, श्री रविकेश मिश्रा, डॉ. नीरजा समजदार, श्री कौशल कुमार, श्रीमती पुष्पा तिवारी और श्री पी.एन.अजीता हैं तथा कोरियन शिक्षकों में डॉ किम, ली सौन्ग ग्यौन्ग, मिस छो, मिस ना आदि हैं। सभी शिक्षक अपने अपने क्षेत्र के जाने माने विद्वान हैं तथा कोरियन भाषा के शिक्षण में भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अग्रणी प्रोफ़ेसर्स कि श्रेणी में आते हैं। हमारे शिक्षक सिर्फ़ भाषा शिक्षण को सरल और रोचक बनाने के लिये हमेशा शोधरत रह्ते हैं बल्कि उन्होंने भारतीय छात्रों की ज़रूरत के अनुकूल कोरियन भाषा कि पुस्तकें भी लिखी हैं जो कि सभी छात्रों को सेंटर के द्वारा मुफ़्त वितरित की जाती हैं।

जे.एन.यू, कोरियन सेंटर के बी..(प्रथम वर्ष)और बी..(द्वितिय वर्ष) पाठयक्रमों के लिये प्रतिवर्ष प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है जिसमें पूरे भारत से हजारों प्रतिभवान छात्र शामिल होते हैं। आज से कुछ वर्ष पहले तक भारतीय छात्रों के बीच कोरियन भाषा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन पिछ्ले कुछ वर्षों में प्लेसमेंट के ऊंचे ग्राफ और बहुत सारी स्कॉलरशिप्स की वजह से करियन भाषा के लिये अप्लाई करने वाले छात्रों की संख्या मे भारी वृद्धि है। आज स्थिति यह है कि कोरियन सेंटर अधिक से अधिक मेधावी और उर्जावान छात्रों को आकर्षित कर रहा है। इस सेंटर के छात्र सिर्फ़ अपने सेंटर के कोर्सेज़ मे अव्वल ग्रेड लाते हैं बल्कि अन्य सेन्टर्स और स्कूल्स के ऑप्शनल कोर्सेज़ में भी उच्चतम अंक प्राप्त करते हैं। कई बार यह अन्य सेन्टर्स के छात्रों के लिए ईर्ष्या की वजह भी बन जाता है। लेकिन कोरियन सेंटर के छात्रों की सफ़लता का एक कारण यह है कि वे जे.एन.यू के पढने के सुअवसर तथा अपने समय का पूरा सदुपयोग करते हैं तथा व्यर्थ बात में अपना समय नष्ट करते हुए लक्ष्य पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। यही वजह है कि आज कोरियन सेंटर के कै छात्र एल.जी, सैमसंग, ह्यून्डई, ऑरेकल, विप्रो और इन्फ़ोसिस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों मे कार्यरत हैं तो कई छात्र विभिन्न स्कॉलरशिप्स पर कोरिया मे अध्ययन कर रहे हैं।

कोरियन सेंटर के विकास और विस्तार में कोरिया की सरकार के साथ साथ वहां की कंपनियां भी योगदान दे रही हैं और उम्मीद है कि आने वाले एकदो वर्षों मे यहां एम.फिल. और पी.एचडी. की पढाई भी शुरू हो जायेगी। कोरियन सेंटर सिर्फ़ कोरियन भाषा के विकास और प्रचारप्रसार में अपन योगदान दे रहा है बल्कि यह दोनों देशों के सामाजिक और संस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ करने मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत और कोरिया के रजनीतिक, आर्थिक, और संस्कृतिक संबंधों के बीच भाषा एक बडी बाधा है। ऐसे में ऐसे कुशल छात्रो की सख्त ज़रूरत है जो दोनों देशों के बीच की भाषाई दूरी को कम कर सकें। और कोरियन सेंटर इस क्षेत्र मे अपना सकारात्मक योगदान दे रहा है।

 

मेरे अध्ययन की भाषा – कोरियन

Filed under: मेरे अध्ययन की भाषा - कोरियन — Satish Chandra Satyarthi @ 9:18 पूर्वाह्न
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जैसा कि अबतक आप जान गये होंगे कि मैं जे.एन.यू के कोरियन सेंटर से कोरियन भाषा में बी.. कर रहा हूं। इस लेख में मैं आपको इस भाषा के बारे में थोडी और जानकारी देना चाहता हूं।

कोरियन दक्षिण और उत्तरी कोरिया दोनों देशों की राजभाषा है। यह दुनिया में लगभग करोड लोगों के द्वारा बोली जाती है तथा विश्व मे सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं मे १३वें स्थान पर आती है। इसके वर्गीकरण को लेकर लैंग्युएज साइंटिस्ट्स में विवाद है। कुछ लोग इसे अल्टाइक फैमिली मे रख्ते हैं तो कुछ इसे लैंगुएज आइसोलेट मानते हैं। इसकी वाक्यसंरचना हिन्दी की तरह कर्ता+कर्म+क्रिया है। इस भाषा कि लिपिहंगलहै जिसका आविष्कार १४४९ . में किंग सेजोंग के द्वारा किया गया था। इसके पहले कोरिया मे चीनी भाषा बोली जाती थी। हंगल की खोज ने कोरिया मे साक्षरता को बढाने मे बहुत योगदान दिया है क्योंकि यह चीनी भाषा कि तुलना मे अत्यंत सरल है। इसे दुनिया कि सबसे साइंटिफिक लेखन पद्धतियों मे से एक माना जाता है। हंगल में कुल २४ अक्षर है जिनमें से १० स्वर और १४ व्यंजन है.

कोरियन वर्णमाला (ध्यान रखें की इसमें कम्पाउंड  लेटर्स �ी शामिल हैं.)

कोरियन वर्णमाला (ध्यान रखें की इसमें कम्पाउंड लेटर्स भी शामिल हैं.)

कोरियन पर आज भी चीनी भाषा का प्रभाव साफ़ दिखाई पडता है। कोरियन के तकरीबन ६०% शब्द चीनी उत्पत्ति के हैं जिन्हे कोरिया मेहान्जाकहा जाता है। खासकर पारंपरिक लेखन में आज भी मुख्यतः चाइनीज़ कैरेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है। अखबारों तथा साहित्यिक रचनाओं में भीहान्जाका प्रयोग प्रचलित है। अतः कुछ महत्वपूर्ण चाइनीज़ कैरेक्टर्स को जाने बिना कोरियन भाषा मे दक्षता हासिल नहीं की जा सकती।

 

मेरा विश्वविद्यालय : जे.एन.यू.

Filed under: मेरा विश्वविद्यालय - जेएनयू — Satish Chandra Satyarthi @ 9:16 पूर्वाह्न
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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सिर्फ़ भारत बल्कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक है। यह राजधानी नई दिल्ली मे अरावली पहाडी की तराई मे 1000 एकड क्षेत्र में फैला हुआ है। यह एक पूर्णतः आवासीय केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना १९६९ में हुई थी। इसकी स्थापना के पीछे उद्देश्य एक ऐसा विश्वविद्यालय की स्थापना करना था जहां देश और समाज के हर वर्ग के छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाली शिक्षा और शैक्षिक माहौल उब्लब्ध कराया जाये। और यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जे.एन.यू. अपने इस उद्येश्य की प्राप्ति में पूरी तरह सफ़ल रहा है। आज यह सिर्फ़ भारत बल्कि एशिया के उन विशिष्ट संस्थानों में से एक है जहां विभिन्न वैग्यानिक और समजिक विषयों पर उच्च स्तर पर शोधकार्य चल रहा है।

जे.एन.यू. में करीब ६००० छात्र और करीब ५०० शिक्षक हैं। यहं कुल १० स्कूल ३ स्पेशल सेंटर्स हैं.

स्कूल

स्कूल ऑफ़ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स
स्कूल ऑफ़ सोशल साइन्सेज़
स्कूल ऑफ़ इन्टरनेशनल स्टडीज़
स्कूल ऑफ़ एन्वायरन्मेंट स्टडीज़
स्कूल ऑफ़ लैंगुएज, लिटरेचर & कल्चरल स्टडीज़
स्कूल ऑफ़ कम्प्युटर & सिस्तक साइन्सेज़
स्कूल ऑफ़ बायोटेक्नोलोजी
स्कूल ऑफ़ फिजिकल साइन्सेज़
स्कूल ऑफ़ इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी
स्कूल ऑफ़ लाइफ साइन्सेज़

स्पेशल सेंटर्स

स्पेशल सेंटर फॉर संस्कृत स्टडीज़
स्पेशल सेंटर फॉर मोलेकुलर मेडीसिन
सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ ला & गवर्नेंस

जे.एन.यू. अपने विभिन्न कोर्सेज़ मे एडमिशन के लिए प्रतिवर्ष एक कठोर प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है जिसमें देशभर से हज़ारों मेधावी छात्र शामिल होते हैं। जे.एन.यू सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछडे क्षेत्रों और वर्गों से आने वाले छात्रों तथा बालिकाओं को प्रवेश में विशेष प्राथमिकता देता है। इस कारण यहां दिल्ली, पंजाब, और महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्यों की तुलना में बिहार, बंगाल, यू.पी और उत्तरपूर्वी प्रदेशों के छात्र अधिक संख्या में हैं। वैसे जे.एन.यू मे हर वर्ग और प्रान्त के छात्र सद्भाव और भाइचारे के साथ रहते हैं। इस प्रकार यह एक छोटे भारत का रूप प्रस्तुत करता है। जे.एन.यू कैंपस को चार क्षेत्रों में बांटा गया है पूर्वांचल, पश्चिमाबाद,. दक्षिणापुरम और उत्तराखण्ड। जे.एन.यू. के छात्रावासों के नाम भी भारत की सभी नदियों के नाम पर रखे गये हैं; जैसे नर्मदा, माहीमांडवी, सतलज, झेलम, गंगा, यमुना, गोदावरी, साबरमती, ताप्ती, लोहित, चन्द्रभागा, ब्रह्मपुत्र, महानदी इत्यादि। सभी फ़ुल टाइम छात्रों को छात्रावास और मेस की सुविधा दी जाती है।

Parthasarathi Rocks (PSR) - This is the highest point on the campus. You can see how wooded it really is from this view.

 

सुनील जोगी के पंद्रह मुक्तक

Filed under: डॉ. सुनील जोगी — Satish Chandra Satyarthi @ 9:13 पूर्वाह्न
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किसी गीता से न कुरआँ से अदा होती है
न बादशाहों की दौलत से अता होती है
रहमतें सिर्फ़ बरसती हैं उन्हीं लोगों पर
जिनके दामन में बुज़ुर्गों की दुआ होती है।

हर इक मूरत ज़रूरत भर का पत्थर ढूँढ लेती है
कि जैसे नींद अपने आप बिस्तर ढूँढ लेती है
चमन में फूल खिलता है तो भौंरें जान जाते हैं
नदी खुद अपने कदमों से समंदर ढूँढ लेती है।

लगे हैं फ़ोन जब से तार भी नहीं आते
बूढ़ी आँखों के मददगार भी नहीं आते
गए हैं जब से कमाने को शहर में लड़के
हमारे गाँव में त्यौहार भी नहीं आते।

बहारें रूठ जाएँ तो मनाने कौन आता है
सवेरे रोज़ सूरज को जगाने कौन आता है
बड़े होटल में बैरे रोटियाँ गिन गिन के देते हैं
वहाँ अम्मा की तरह से खिलाने कौन आता है।

कोई श्रृंगार करता है, तो दरपन याद आता है
बियाही लड़कियों को जैसे, सावन याद आता है
वो बारिश में नहाना, धूप में नंगे बदन चलना
पुराने दोस्त मिलते हैं, तो बचपन याद आता है।

जो भी होता है वो, इस दौर में कम लगता है
हर एक चेहरे पे दहशत का भरम लगता है
घर से निकला है जो स्कूल को जाने के लिए
अब तो उस बच्चे के बस्ते में भी बम लगता है।

नए साँचे में ढलना चाहता है
गिरा है, फिर संभलना चाहता है
यहाँ दुनिया में हर इक जिस्म ‘जोगी’
पुराना घर बदलना चाहता है।

मैं बेघर हूँ, मेरा घर जानता है
बहुत जागा हूँ, बिस्तर जानता है
किसी दरिया को जाकर क्या बताऊँ
मैं प्यासा हूँ, समंदर जानता है।

मैं कलाकार हूँ, सारी कलाएँ रखता हूँ
बंद मुट्ठी में आवारा हवाएँ रखता हूँ
क्या बिगाड़ेंगी ज़माने की हवाएँ मेरा
मैं अपने साथ में माँ की दुआएँ रखता हूँ।

खुशी का बोलबाला हो गया है
अंधेरे से उजाला हो गया है
पड़े हैं पाँव जब से माँ के ‘जोगी’
मेरा घर भी शिवाला हो गया है।

छोटे से दिल में अपने अरमान कोई रखना
दुनिया की भीड़ में भी पहचान कोई रखना
चारों तरफ़ लगा है बाज़ार उदासी का
होठों पे अपने हरदम, मुस्कान बनी रखना।

जो नहीं होता है उसका ही ज़िकर होता है
हर इक सफ़र में मेरे साथ में घर होता है
मैं इक फ़कीर से मिलकर ये बात जान गया
दवा से ज़्यादा दुआओं में असर होता है।

कहाँ मिलते हैं भला साथ निभाने वाले
हमने देखे हैं बहुत छोड़ के जाने वाले
यहाँ कुछ लोग दिखावा पसंद होते हैं
दिल मिलाते ही नहीं, हाथ मिलाने वाले।

हमारे दिन की कभी, रात नहीं होती है
भरे सावन में भी बरसात नहीं होती है
यों तो हम सारे ज़माने से रोज़ मिलते हैं
हमारी खुद से मुलाक़ात नहीं होती है।

दर्द की दास्तान बाकी है
अभी इक इम्तहान बाकी है
फिर सताने के लिए आ जाओ
दिल ही टूटा है, जान बाकी है।

होठों पे मोहब्बत का तराना नहीं रहा
पहले की तरह दिल ये दीवाना नहीं रहा
मुद्दत के बाद आज ये मन फिर उदास है
लगता है कोई दोस्त पुराना नहीं रहा।