चौपाल

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बाकी बच गया अण्डा April 10, 2009

Filed under: नागार्जुन — Satish Chandra satyarthi @ 3:21 PM
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पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया,बाकी रह गये चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गये दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झन्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा

रचनाकाल : 1950

रचनाकार : नागार्जुन


बाबा नागार्जुन के काव्य संसार का आनंद लेने के लिए जेएनयू पर चलें.

 

6 Responses to “बाकी बच गया अण्डा”

  1. दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
    चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया एक

    are kya बात है

  2. anil kant Says:

    क्या बात है गुरु छा गए
    काबिले तारीफ़ …मज़ा आ गया
    सटीक व्यंग्य

  3. cmpershad Says:

    बहुत खूब लिखते थे बाबा नागार्जुन! इस रचना को पढकर अंग्रेज़ी रचना-TEN LITTLE NIGGER BOYS… की याद ताज़ा हो गई।

  4. बाबा नागार्जुन की तो बात ही निराली है.
    बहुत अच्छा.

  5. Jitendra Says:

    अंडा ही तो बचा है हमारे देश में …
    इस कविता को प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद.

  6. याद आ गया बच्ची के स्कूल में पढाया जाने वाला राइमस

    फाईव् लिटिल मंकी जम्पिंग ओन द बेड
    वन फेल ऑफ़ एंड बम्प्ड हिज हेड

    बाबा जी ने कितनी सरलता से शब्दों का प्रयोग किया है यह अनुकरणीय है.


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